Friday, 28 July 2017

मैं नेह की शीतल समीर हूँ

मैं नदी हूँ मन की नदी, 
बहुत कुछ अपने अतल अंतर में समेटे हुए, 
मुझमें भी समुद्र सी लहरें हैं उफान और तरंगें हैं,
मैं समन्दर की तरह भीतर के अबोध रेत को ,
किनारों पर उगल ऊंची-ऊंची छलांगें नहीं लगाती। 
मैं नदी हूँ मन की नदी शान्त, चिर स्निग्ध ,
अपने विस्तार को, मन के परिसर में ,
चुप्पी की चादर में ओढ़ाकर ,
बाह्य जगत से दूर रखती हूँ।
जब कोई शरारती कंकड़ ,
मेरी सतह से छेड़खानी करता है ,
मैं एक बुलबुला छोड़ उस परिदृश्य को ,
जज्ब कर लेती हूँ ,अपने मन के भूगर्भ में ,
पर उस शरारती तत्व को पथरी के रुप में,
वही पथरी जब अतिशय बड़ी हो ,
असहनीय दर्द का आकार लेती है ,
तब कहीं मैं फूटकर टेढ़ा-मेढ़ा राह बनाती हूँ ,
और कर देती हूँ नदी को छिछला ,
मैं नदी हूँ ,मुझमें रहस्य है ,मर्म है,संयम है ,
एक सीमा तक स्थिरता और सहनशीलता भी
मैं बावड़ी हूँ, बावली नहीं, उतावली नहीं
प्रात में मेरे मन के विशाल प्रांगण में
सूर्य किरणों संग अठखेलियां करता है
सांध्य में चाँद मेरी गहराई में समां
तारे सितारों संग रंगरेलियां करता है
मैं नेह की शीतल समीर हूँ
मैं खारी नहीं, मैं सूखी कछार भी नहीं,
मैं समंदर की तरह उफनाती चिंघाड़ती भी नहीं
बस बिचलित होती हूँ ,जब आहत होती हूँ ,
मैं नदी हूँ, मन की मौन नदी ,मुझे नदी रहने दो 
मुझमें समा समझने की कोशिश करो या ना करो ,
मैं नदी हूंँ , स्थिरता मेरी परिपाटी मेरी विरासत ।

                                शैल सिंह

Tuesday, 25 July 2017

तक़दीर टमाटर की

आसमान इंसान ही नहीं छू रहे,सब्जियां भी आसमान छू रही हैं
टमाटर नासा पहुँच अध्ययन कर रहा है लोग विश्लेषण कर रहे
आश्चर्यजनक उछाल भरे सब्जियों में रंग बघारने वाले टमाटर जी
तक़दीर जब संवरती है ना तो शीर्ष पर बैठा देती है किसी को भी
कभी लहसुन तो कभी प्याज को,तो कभी अरहर की दाल को भी ।
     
                                                                शैल सिंह


घूँघट जरा उलटने दो

    '' घूँघट जरा उलटने दो ''


आयेंगे मेरे प्रियतम आज आँख में अंजन भरने दो
संग मेरे प्रतिक्षित संगी-साथी आज मुझे संवरने दो ,

घर की ड्योढ़ी साजन को पल भर जरा ठहरने दो
दिवस कटे दर्पण सम्मुख नयन में उनके बसने दो ,

जी भर किया सिंगार उन्हें जी भर जरा निरखने दो
वो हों थोड़ा बेजार उर उनका भी जरा करकने दो ,

देखें चांदनी का शरमाना वो घूँघट जरा उलटने दो
संग खेलूं सावनी कजरी बांहें डाल गले लिपटने दो ,

अपलक देखूं उन्हें मुझे वो थोड़ा आज बहकने दो
देखूं चन्दा की भाव-भंगिमा थोड़ा आज परखने दो।

                                               शैल सिंह 

सम्पूर्ण जगत में बस एक ही भगवान हैं

एक ही हैं भगवान मगर हैं नाम अनेकों गढ़े गए
नाम के चलते ही हृदय बहुत हैं विष भी भरे गए,

अरे प्रकट हो त्रिशूलधारी भटकों को समझाओ
परब्रम्हपरमेश्वर,एकाकार एक ही हम बतलाओ,

बाँटते तुझे निज स्वार्थ लिए विभिन्न धर्मों-पंन्थों में
अशांति मचा रखे दहशत फैला मुल्कों-मुल्कों में,

गर नहींं समझें अपना रौद्र ता्डव रूप दिखाओ
जिनके उत्पात से त्रस्त सभी गह के वज्र गिराओ,

बड़ा लिया तूने इम्तिहान और देखा खून खराबा
मची नाम पे तेरे मारकाट तूं बैठा है कौन दुवाबा,

आस्था पे तेरी हम मरते जो मांगें जन्नत का प्यार
बस राम मंदिर बनवा दे उनका प्राण हूरों पे वार ।

                                                 शैल सिंह

ये शब्द



जितने भाव उमड़ते उर में
शब्द  जुबां बन  जाते  हैं
जहाँ अधर नहीं खुल पाते
झट सहगामी बन जाते हैं 
खुद में ढाल जज्बातों को 
मन का सब कह जाते हैं | 

                      शैल सिंह 

Sunday, 23 July 2017

कई दिनों की बारिश से आजिज होने पर


कई दिनों की बारिश से आजिज होने पर,

बन्द करो अब रोना बरखा रानी
बहुत हो गया जल बरसानी
भर गया कोना-कोना पानी ,

नाला उफन घर घुसने को आतुर,
जल भरे खेत लगें भयातुर,
रोमांचित बस मोर,पपिहा,दादुर ,

कितने दिन हो गए घर से निकले
पथ जम गई काई पग हैं फिसले
बन्द करो प्रलाप क्या दूं इसके बदले ,

कितने दिन हो गए सूरज दर्शन
तरसे धूप लिए मन मधुवन
कपड़े ओदे,घर भरा सीलन ,

रस्ता दलदल किचकिच कर दी
मक्खी, मच्छर से घर भर दी
गुमसाईन महके सब हद कर दी ,

जलावतन से बिलें भरीं यकायक
जीव घूम रहे खुलेआम भयानक
जाने कब क्या हो जाए अचानक ,

बहुत हो गई तेरी अति वृष्टि की
बरसो कहीं और जगहें भी सृष्टि की
काबिलियत दिखाओ ऐसी कृति की ।

                          शैल सिंह