Tuesday, 25 July 2017

घूँघट जरा उलटने दो

    '' घूँघट जरा उलटने दो ''


आयेंगे मेरे प्रियतम आज आँख में अंजन भरने दो
संग मेरे प्रतिक्षित संगी-साथी आज मुझे संवरने दो ,

घर की ड्योढ़ी साजन को पल भर जरा ठहरने दो
दिवस कटे दर्पण सम्मुख नयन में उनके बसने दो ,

जी भर किया सिंगार उन्हें जी भर जरा निरखने दो
वो हों थोड़ा बेजार उर उनका भी जरा करकने दो ,

देखें चांदनी का शरमाना वो घूँघट जरा उलटने दो
संग खेलूं सावनी कजरी बांहें डाल गले लिपटने दो ,

अपलक देखूं उन्हें मुझे वो थोड़ा आज बहकने दो
देखूं चन्दा की भाव-भंगिमा थोड़ा आज परखने दो।

                                               शैल सिंह