Tuesday, 5 December 2017

कविता '' मुझे सहज कर देती हो ''

        कविता ---

तुम  हो मेरी आत्मबोध  
तुमसे करके आत्म विलाप 
मैं सहज हो लेती हूँ।
आत्मलोचना तुम हो मेरी,
आत्मवृतान्त तुझे सुना 
मैं सहज हो लेती हूँ। 
अस्मिता का बोध कराती 
हँसि,खुशी,दुःख तुझसे बाँट 
मैं सहज हो लेती हूँ। 
तुम मेरे हर रंगों की पहचान 
तेरा स्वागत कर 
निजी जिन्दगी के दरवाजों से 
मैं सहज हो लेती हूँ। 
तूं मेरी चुलबुली सखि 
बेझिझक अक्सर कर 
तन्हाई में तुझसे बातें  
मैं सहज हो लेती हूँ। 
आत्मविस्मृति की परिचायक
तेरी पनाहगाह में आकर 
मैं सहज हो लेती हूँ।
अन्तर के छटपटाहट को भाँप 
मुझे सहज कर देती हो। 
कभी वजूद को ढंक लेती हो 
कभी उजागर कर देती हो। 
कभी तो भटकाती हो 
शब्दों के अभयारण्य में 
कभी शब्दों के लच्छों के 
सुन्दर,विराट वितान में 
मेरी अवधारणाओं को 
अपने सम्बल का देकर पनाह 
मुझे सहज कर देती हो।
सपनों के उदास कैनवास पर  
उम्मीदों के बहुविध रंग बिखेर 
मुझे सहज कर देती हो 
विचलित जब भी मन होता 
तुम स्वच्छंद,मुक़्त,मुखर हो 
मेरे स्वभावानुकूल शब्दों में 
कविता की लड़ियाँ गूंथकर 
मुझे सहज कर देती हो। 
मेरे जीवन संघर्ष की
परिचारिका या सेविका 
आख़िर वो है कौन,
मेरी रचना मेरी कविता, 
मेरी सुर साधना 
मेरी क्रिया,प्रतिक्रिया 
मेरी विश्वशनीय सहचरी
मेरी रचनाधर्मिता कविता। 
                       शैल सिंह 

Saturday, 18 November 2017

शेरों को दहाड़ने पर मजबूर जो कर दिया

भंसाली का बहुत-बहुत शुक्रिया,
राजपूतों के ज़मीर को जगा दिया,सदियों से सो रहे थे, राजपूतों के चरित्र को जितना गन्दा से गन्दा हो सके उतना सीरीयल्स फिल्म,मन गढ़न्त कहानियों के माध्यम से दर्शाया गया पर कभी किसी राजपूत ने अपनी कम्युनिटी के लिए आवाज नहीं उठाई, लेकिन जब एक माँ की अस्मिता पर एक क्षत्राणी की आन-बान पर आँच आई तो राजपूती लहू ने अपने क्षत्रिय होने का प्रमाण दिखा दिया ,शमशीरों को म्यानों से निकाल लिया, नहीं बहुत हो चुका अब बर्दाश्त नहीं, हमारे बलिदान और योगदान की क्या यही कीमत कि चन्द बिगड़ैल लोगों के चरित्र को पूरी राजपूत लावी पर चरितार्थ कर दिखा दिया जाता रहा, देश याद करें राजपूतों के त्याग को उनकी दानशीलता को जो और किसी में नहीं। हर समुदाय में अच्छे बुरे लोग हैं ,पर क्षत्रियों का ही किरदार क्यो  अत्याचारी,अनाचारी,व्यभिचारी, दुर्दांत,अक्खड़ पर्दे पर उतारा जाता रहा ,उसी का नतीजा है कि आज क्षत्राणियाँ भी कमर कस लीं कि अब राजपूत के मुंह में कोई उंगली डाल कर गुस्ताख़ी तो करें , ये होती है वर्चस्व की लड़ाई ।लीला भंसाली को धन्यवाद , शेरों को दहाड़ने पर मजबूर जो कर दिया

शैल सिंह

Friday, 17 November 2017

बेटियों की महत्ता पर कविता '' सुराख आस्मां में कर दें इतनी ताब हैं रखते हम ''

     '' बेटियों की महत्ता पर कविता ''

'' सुराख आस्मां में कर दें इतनी ताब हैं रखते हम ''


गर हम बेटियां ना होतीं विपुल संसार नहीं होता
गर ये बेटियां ना होतीं ललित घर-बार नहीं होता
गर बेटियां ना होतीं भुवन पर अवतार नहीं होता
गर हम बेटियां न होतीं रिश्ता-परिवार नहीं होता ।

हमने तोड़ के सारे बन्धन अपनी जमीं तलाशा है
दृढ़ इरादों के पैनी धार से अपना हुनर तराशा है
फहरा दिया अंतरिक्ष में हमने अस्तित्व का झंडा
सूरज के शहर डालें बसेरा मन की अभिलाषा है ।

झिझक,संकोच शर्म के बेड़ियों की तोड़ सीमाएं
हौसले को पंख लगा निडर उड़ने को मिल जाएं
सुराख आस्मां में कर दें इतनी ताब हैं रखते हम
बदलकर सोचों का पर्दा हमारी शक्ति आजमाएं ।

मूर्ख से कालिदास बने विद्वान् दुत्कार हमारी थी 
तुलसी रामचरित लिख डाले फटकार हमारी थी 
विरांगनाओं के शौर्य की गाथा जानता जग सारा 
अनुपम सृष्टि की रचना भी अवनि पर हमारी थी ।

इक वो भी जमाना था के इक नारी ही नारी पर
सितम करती थी घर आई नवोढ़ाओं बेचारी पर
संकीर्ण मानसिकता से उबार उन्हें भी संवारा है
पलकों पर बैठा सासूओं ने बहुओं को दुलारा है ।

क़ातर कण्ठों से करती निवेदन माँओं सुन लेना
मार भ्रूण हमारा कोंख में यूँ अपमान मत करना
क्यों हो गईं निर्मम तूं माँ अपने अंश की क़ातिल
हमें बेटों से कमतर आँकने की सोच मत रखना ।

हम जैसे ख़जानों को पराये हृदय खोलकर मांगें
हमारे लिए कभी रोयेंगे आँगन,दीवार ये दरवाज़े
हम परिन्दा हैं बागों के तेरे आँगन की विरवा माँ
रिश्तों की वो संदल हैं खुश्बू से दो घर महका दें ।

करें मुकाम हर हासिल गर अवसर मिले हमको
कर स्वीकार चुनौतियाँ हमने चौंकाया है सबको
अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पे फ़हरा दिया राष्ट्र का ग़ौरव
बेहतर कर दिखायें गर जगत में आने दो हमको ।

विपुल---विशाल , ललित---सुन्दर ,
भुवन---- जगत , अवनि----पृथ्वी ।

                                                       शैल सिंह 




Monday, 6 November 2017

'' वजह दिलक़श शह से तेरा मुझे बेज़ार कर देना ''

हिंदी ग़ज़ल '' वजह दिलक़श शह से तेरा मुझे बेज़ार कर देना ''


संदल सी महकती चलती पहलू से मतवाला कर
मदिरालय में निगाहों के निमंत्रण से दीवाना कर ,

तेरी आँखों के सागर में भी देखा इश्क़ की लहरें
सफ़ीना दिल का उतराये तेरे सागर में इस गहरे
आशिक़ाना मिज़ाज देखे इन उफनाती लहरों के 
साहिलों पर मिलें चल ज़माने के तोड़ सभी पहरे ,

गर अल्फाज़ मुकर जाएं हृदय का हाल बताने से
झुका पलकें बता देना अन्तर का राज निग़ाहों से
अंतर की नदी का कल-कल नाद दिल सुन लेगा
हटा घूँघट हया की चाँद निकल आना घटाओं से ,

बसा गेसुओं के झुरमट में दिल आबाद कर देना
नज़राना आरजू को मेरी दिल में उतार कर देना
गुम मदहोश अदायें कीं आजकल नींद रातों की
वजह दिलक़श शह से तेरा मुझे बेज़ार कर देना ,

हमदर्द बनकर नब्ज मुक़म्मल टटोल लिये होतीं
मौन हसरतों,अहसासों का कुछ मोल दिये होतीं
छोड़ निकम्में लफ़्जों को बंदिशें तोड़ संशयों की
दिल बोझिल न यूँ रहता फ़ख्र से बोल दिये होतीं ।

                                             शैल सिंह



Saturday, 21 October 2017


सुना है आजकल लोगों की जुबान पर मेरे चर्चे बहुत हैं
मेरे चर्चों के पीछे लोगों की जुबान के बढ़े खर्चे बहुत हैं
क्या मैं इतनी अच्छी हूँ या कि इतनी बुरी हूँ
जो भी हो कसौटियों पर हमेशा उतरी खरी हूँ
                                                    शैल सिंह



Wednesday, 18 October 2017

दीवाली पर कविता '' आना हंसा पे सवार मेरे घर आँगना ''

      दीवाली पर कविता 


शत-शत अभिनन्दन माँ लक्ष्मी तेरा
आना हंसा पे सवार मेरे घर आँगना

हर्ष और उल्लास का पर्व दीवाली 
रिश्तों में खूब गर्माहट लाना
अंधेरा दूर भगा स्नेह लूटाना 
नभ तारे शरमायें हो पावन तेरा आना
शत-शत अभिनन्दन माँ लक्ष्मी तेरा
आना हंसा पे सवार मेरे घर आँगना

धवल ज्योति से उजियारा कर
नफ़रत की दीवार ढहाना
ईर्ष्या,द्वेष मिटा प्रेम,सौहार्द्र बरसाना 
रौनकता से शान्ति का साम्राज्य बिछाना
शत-शत अभिनन्दन माँ लक्ष्मी तेरा
आना हंसा पे सवार मेरे घर आँगना

काली रात अमावस की
कर आसुरी वृत्तियों का प्रतिकार
कण-कण प्रकाश बिखराना
अनन्त काल तक जग रहे तेरा दीवाना
शत-शत अभिनन्दन माँ लक्ष्मी तेरा
आना हंसा पे सवार मेरे घर आँगना

मन का भाव बतासे सा मीठा 
अन्तस्तल खील सा खिलाना  
खुशियों की सौगात लुटाकर
शुभागमन से पर्व ये परमानन्द बनाना 
शत-शत अभिनन्दन माँ लक्ष्मी तेरा
आना हंसा पे सवार मेरे घर आँगना ।

                             शैल सिंह 

Friday, 13 October 2017

गांव पर कविता '' भोजपुरी की मिठास में गांव बसता जहाँ है ''

            गांव पर कविता 


बासी-बासी  सी लगती  शहर की  फिज़ां है
मेरे गांव सी कहाँ मिलती यहाँ ताज़ी हवा है ,

सर्दी,गर्मी,वर्षा,वसंत भी अनूठे मेरे गांव के 
शहर के कोलाहल में दिन गुजरता कहाँ है
खुले आसमां के छत के तले दूर-सुदूर तक
लहलहाते खेतों में हरियाली दिखता जहाँ है ,

वो गाँव की रुखी रोटी का स्वादिष्ट निवाला
पिज्जा,बर्गर में तृप्ति का बोध होता कहाँ है
लगता रोज इतवार है देख गांवों की रौनक़ 
शिद्दत से इतवार का इन्तज़ार होता यहाँ है ,

कुटुम्ब-कुनबे संग गूँजता हँसी का ठहाका
चौपाल जगत पर इनारों की लगता जहाँ है
सड़कें,बिजली,मकां,पार्क फिर भी वीरानी 
दीयों के रौशनी में मेरा गांव हँसता जहाँ है ,

जहाँ चहचहा अगवानी पाँखी करें भोर की
महकते पुष्पों से वन-उपवन हर्षता जहाँ है
है भाईचारा जहाँ रेशमी डोरियाँ रिश्तों की
भोजपुरी की मिठास में गांव बसता जहाँ है ,

नीम,बरगद,पीपल की जहाँ छाँव का मज़ा  
शहरी प्रदुषण में दम हरदम घुटता जहाँ है
न चौबारे आंगन,सहन,यहाँ की इमारतों में
गांव प्रकृति की मुग्धता में विहंसता जहाँ है ,

रसीला सावन  नशीला फागुन मेरे गांव का
बेख़बर मज़हबी द्वेषों से गांव रहता जहाँ है
त्यौहारों का उल्लास शुद्ध स्वच्छ पर्यावरण
विपत्ति में करुणा का सिन्धु बरसता जहाँ है ।

इनारों --कुआं
                                         शैल सिंह


Wednesday, 20 September 2017

क्षणिका

कुछ लोगों ने महफिलों में
ये आभास कराया
जैसे पहचानते नहीं ,
मैंने भी जता दिया
जैसे मै उन्हें जानती नहीं ,
                 शैल सिंह

Monday, 18 September 2017

क्षणिका

क्यूँ इतना वक्त ली ज़िन्दगी
खुद को समझने औ समझाने में
समझ के इतने फ़लक पे ला
छोड़ दी किस मोड़ पे ला विराने में
बोलो अब उम्र कहाँ है वक्त लिए
वक्त बचा जो खर्च कर रही तुझे बहलाने में।
                               शैल सिंह

तन्हाई पर कविता , " गुजरे मौसम की याद दिलाती "

यादों के शुष्क बिछौने पर
भीगीं-भीगीं सिमसिम रात
तन्हाई से करती बातें
नैनों की रिमझिम बरसात 
जाने कहाँ-कहांँ भटकाती रात ,

पलकों की सरहद तक आ
नींद काफूर हो जाती है
बेचैन रात की आलम का
सिलवट दस्तूर बताती है
उन्नीदी आंँखों में बीति सारी रात ,

हठ करती बचपन की क्रिड़ायें
अबोध अल्ह़ड़पन यौनापन का 
काश कि मुट्ठी में बंद कर रखती
कुछ हसीं पलों के छितरेपन का
कभी बावफा ना होती इतनी रात ,

हर पहर रैन की कातिल होकर 
गुजरे मौसम की याद दिलाती 
बेदर्द वीरानी हमदर्द बन   
रख पहलू में हँसाती और रुलाती
तन्हा और बनाती तन्हाई की रात ,

ना जाने क्यूँ तन्हाई में यादें
ज़िक्र करती हैं पुराने मंजर का
तल्खी और उदासी भर देतीं
काम करती हैं जादू-मंतर का
ख़्यालों में डूबी,उतराई सारी रात
                                 शैल सिंह







Sunday, 17 September 2017

'' तिरंगा तन सजा सोचा न था तेरा मन दुखा दूं माँ ''

 '' एक शहीद की अन्तर्व्यथा माँ के लिए ''


ऐ मेरे मित्रों मेरे गांव तुझसे मेरे हिन्द ये कहना है
शहीदों के मज़ारों पर दीये‌ नित जलाये रखना है ,

याद आए मेरी दिल को जरा समझा लिया करना
लगा सीने से तस्वीरों को मन बहला लिया करना
हर्गिज़ कोसना मत देश को ऐ त्यागमयी माताओं
लाल देश का था तेरा मन को बतला दिया करना ,

समझना गहरी नींद सोया हूँ तेरी लोरी सुन के माँ
जां कुर्बान वतन पर की कि तेरा कर्ज़ चुका दूँ माँ
आँसू अच्छे नहीं लगते वीरों की माँ की आँखों में
तिरंगा तन सजा सोचा न था तेरा मन दुखा दूं माँ ,

माँ तेरे कोंख का मैं ऋण चुका पाया नहीं तो क्या
प्रिये का साथ जीवन भर निभा पाया नहीं तो क्या
भारत माँ के चरणों में थी चाहत वीरगति हो प्राप्त 
अमर बलिदान की गाथा लिख सोया नहीं तो क्या ,

राष्ट्र के ग़ौरव लिए तेरा लाड़ल़ा माँ प्राण गंवाया है
नमन कर लो उन्हें जिनने तुझे आजादी दिलाया है
कायर आँसुओं से क्यों भिगोती दामन धरा का माँ
जंगे-मैदां ने रण-बांकुरों को तेरे फौलादी बनाया है ,

राजगुरु,सुखदेव,भगत भी किसी के लाल थे न माँ
जिनके शौर्य की गाथायें सुन हम बेहाल हुए थे माँ
वतन की गोद में सोने का गौरव जो मिला है आज
वही आशीष दो जो फ़ौज़ में जाते वक्त दिए थे माँ।

                                             शैल सिंह




Thursday, 14 September 2017

मंच पर कविता आरम्भ करने से पहले,समां बांधने के लिए

मेरी आंँखों का पीके मय
सभी मदहोश बैठे हैं
नशा नस-नस तरल कर दी
सभी खामोश बैठे हैं,

पलकें हो गईं शोहदा
झपकना भूल बैठी हैं
जब से आई हूँ महफ़िल में
सभी खो होश बैठे हैं,

गर हो तालियों की गूँज
तो भंग तन्द्रा सभी की हो
महफ़िल हो उठे जीवन्त
करतल ध्वनि सभी की हो,

बंधन खोल हथेली का
सुर साजों से नवाजें गर
हो अन्दाजे-बयां माहौल
वाह-वाह धुन सुना दें गर,

शब्दों से करूं सराबोर
महफ़िल हो जाए गदगद
गर दें हौसला रंच भी
मन के तार छेड़ूं अनहद,

गणमान्य अतिथियों का
करूं भरपूर मनोरंजन
दर्शक दीर्घा में बैठे सज्जनों
करुं शत-शत नमन बन्दन ‌।
                     शैल सिंह

हिंदी पर कविता '' हिंदी का हो राज्याभिषेक '

हिंदी पर कविता '' हिंदी का हो राज्याभिषेक ''


हिंदी की ख़्याति बढ़ाने को
इसे सशक्त,समृद्ध करना है
सहर्ष अपना इसे प्रतिष्ठित कर
विश्वपटल पर प्रसिद्द करना है ,

हिंदी है भारत का गौरव
हिंदी सुराज की धार है
भाल सजा बिंदिया हिंदी
करती हिंदुस्तान का श्रृंगार है ,

गंगाजल सी पावन हिंदी
उर्दू,संस्कृत से भी मिलनसार है ,
सीधी,सहज,सरल,मधुर
हिंदी हृदय का उद्गार है

रिश्तों की डोरी,ऊष्मा प्राणों की
हिंदी मौसमी गीतों की फुहार है
हिंदी का विस्तार करें हम
ऋषि,मुनियों की वाणी का टंकार है ,

मन से मन के तार जोड़ती 
हिंदी मधुर,मनोहर रसधार है
कण-कण में है घुली हुई
हिंदी कल-कल बहती जलधार है ,

देश,दुनिया में भी गूंज रही
आज़ हिंदी की ललकार है
बांधती सुर में गीत,ग़ज़ल को
हिंदी मीठी कर्णप्रिय झंकार है ,

भावों में करुणा,पीर पिरोने वाली 
हिंदी एकमात्र आधार है
सब भाषाओँ पर भारी पड़ती
हिंदी जब भरती हुंकार है ,

स्वतः उतरती मन के आँगन
कवि मन के कृतियों का संसार है
हिंदी का हो राज्याभिषेक
हिन्दुस्तान की पुकार है ,

भावों की प्रेयसी,प्रखर वक्ता भी 
हिंदी तेरा जय-जयकार है 
परचम हिंदी का लहर रहा
बह रही दिशा-दिशा बयार है ,

हिंदी मणि है हिंदुस्तान की 
परिष्कृत सम्प्रेषणीय उदार है
जन मानस को करती जागरूक
हिंदी हृदय से तेरा सत्कार है।

                     शैल सिंह 




Wednesday, 13 September 2017

शिद्दत से तराशें गर हम हौसलों को
कद आसमां का खुद-बख़ुद झुक जायेगा
राह कोसों हों मन्जिल की चाहे मगर
खुद मंजिलों पे सफर जाकर रुक जायेगा।

                                            शैल सिंह

Tuesday, 12 September 2017

'' देश लिए शहीद हुए एक सैनिक की भावना ''

'' देश लिए शहीद हुए एक सैनिक की भावना ''



तेरी आन लिए प्रान क़ुरबान किया प्यारे देश मेरे
मेरे प्रति तेरा भी तो देश कुछ फ़र्ज होना चाहिए ,

किस हाल में महतारी हाल क्या है प्राण प्यारी की
किस हाल में दुलारा हाल क्या जी राजकुमारी की 
जिस बूढ़े पिता ने सहारा देश तेरी आन लिए वारा
उस घर का भी तुझपे देश कुछ क़र्ज़ होना चाहिए ,

तेरे सम्मान,आन,बान लिए माता ने उजाड़ी कोख़
ज़िन्दगी भर लिए आँचल रखी जिसने समेट शोक
जिसने राखी की कलाई भेंट दी देश की भलाई पे    
दुख के पहाड़ का भी देश कुछ अर्ज़ होना चाहिए ,

जिसके गाँव का चराग बुझा मुरझाये फूल बाग़ के
ध्वजा में लपेटी आई जिस द्वारे पर अर्थी संवार के  
जिन आँसुओं की धार नहीं टूटे भाई को निहार के
दर्द बलिदानी गांव का देश कुछ दर्ज़ होना चाहिए।

                                                शैल सिंह 

Sunday, 10 September 2017

    किसी की शायरी, कविता का जवाब मेरे भाव में
                  ( १ )

यहाँ धरती की सारी वस्तु सारे मकान मेरे हैं
ये हिन्दूस्तान मेरा है बता दे जा कोई उसको
वोे किरायेदार हैं तो रहें किरायेदार की तरह 
रास्ता बाहर का भी बता दे जा कोई उसको ,   

हमारे बाप तक न पहुँचें हम तक रहें अच्छा  
भलमनसाहत यही कि इन्हें बर्दाश्त करते हैं
जो असुरक्षित यहाँ पे जिनकी सांसें है बन्दी
वो कहीं जा ठिकाना ढूंढ लें आगाह करते हैं ,

जुबां कैंची सी चलती एहसानफरामोशों की
अरे जान तो हथेली पर हमारी है ऐ क़ाफ़िरों
अलग-अलग वस्तियां हमारी और तुम्हारी हैं
न जद में हैं न रहते विश्वासघातों के क़ाफ़िरों,

सब मिल बांट रहें गर समझें देश को अपना
ना कोई दुश्मन यहाँ उनका न जान खतरे में
हमारी घर-गली में रहके,जमाते धौंस हमी पे 
शब्दों को बोलें तोल मत घोलें झाल मिसरे में ।
                                         शैल सिंह

           ‌             ( २ )

उँगलियाँ झूठी नहीं ऊठतीं,न हवा में तीर छूटता है
खिलाफत क्यों तेरे दुनिया,जरा पड़ताल तो कर ले ,

रक्त के बूँद होते मिट्टी में गर,जुबां कड़वी नहीं होती
घाती कौन किसका खौफ़,पता घड़ियाल तो कर ले ,

बासिन्दे कहाँ के तुम,कल्में किस मुल्क के हो गढ़ते 
रहते शक के दायरे में क्यूं,जिरह जल्लाद तो कर ले ,

पोंछ गर्द चश्मों की,औ देख बिरादरी का वहशीपन
आँखें अंँधी है के बहरे कान,तस्दीक हाल तो कर ले ,

गर बन्दिशें हैं तेरी सांसों पे,यहाँ महफूज नहीं गर तूं
जमीं ज़ल्द छोड़ देने का फ़ैसला,तत्काल तो कर ले ,

इक भूल का खामियाज़ा भुगत रहा देश आज तक
चला जा पाक नमक हराम वहाँ खुशहाल तो रह ले ,

जिसका दिल हिन्दूस्तानी स्वागत दिल से हम करते
काफिर कैसा हो सुलूक बिचार फिलहाल तो कर ले ।
                                                    शैल सिंह
               

Sunday, 3 September 2017

कविता '' सच्चाई ने जीती बाज़ी ''

        '' सच्चाई ने जीती बाज़ी ''


दिन भर आग उगल सूरज जला नहीं निढाल हो गया
सारी रात जला एक दीप जल कर भी निहाल हो गया ,

गम सीखा सहना मैंने नीरव रजनी के गहन अंधेरों से
नीरस ज़िंदगी करने वाला भी खुद ही कंगाल हो गया ,

रंगा नहीं कभी किसी भी रंग में मैंने अपने अंदाज को
जब छोड़ी नहीं  ख़ुद्दारी भी क़ुदरत भी बेहाल हो गया ,

देखो अपना ढलता सूरज मेरे किस्मत से खेलने वालों  
सच्चाई ने जीती बाज़ी कहने लगे लोग कमाल हो गया ,

नमन उगते सूरज को करने वालों भूला दिए भोर मेरा
देखो बुरे लम्हों का साया खुद छूमन्तर पाताल हो गया।  

                                                    शैल सिंह

                                         



Thursday, 31 August 2017

बेटियों पर कविता '' अंधेरों को न कर दें बेपरदा ख़ामोशियाँ मेरी ''

बेटियों पर कविता --
'' अंधेरों को न कर दें बेपरदा ख़ामोशियाँ मेरी ''


हमें अम्बर को छूना जी खोलो बेड़ियाँ मेरी ,

साहिल पर नज़ारा लहरों का बैठ देखें क्यों 
करें अठखेलियाँ भंवरों से दो कश्तियाँ मेरी ,  

हमें भी दे दो हक़,आजादी हमें भी मर्दों सी
गर मजलूम ना होतीं न लगतीं बोलियां मेरी ,

हवाओं में भी उड़ना हमें उन्मुक्त पाँखी सा 
अस्मत की नोंच खायें न दरिंदे बोटियाँ मेरी ,

खुल कर हमें सांसों को लेने की इजाज़त दो
करतब खूब दिखाएंगी हुनरमन्द बेटियाँ मेरी ,

उत्सर्ग नहीं होना कनक पिंजरों के वैभवों में
बगावत पे ना उतर जायें कहीं दुश्वारियां मेरी ,

खुद को जला घर के अँथेरों को किया रौशन 
किरण बाहर भी बिखरानी फैलें रश्मियाँ मेरी ,

और ना अबला बन देनी हमें अग्निपरीक्षाएँ 
अंधेरों को ना कर दें बेपरदा ख़ामोशियाँ मेरी , 

खुदी मैं चमकूँ जुगुनू सा चाँद को भी दूँ मात
गगन के तारों से करें बातें मुखर हस्तियाँ मेरी ,

खोलूं मन के परत का पूर्जा आवाज उठाने दो 
घायल मन के हंसा की दिखाऊँ झांँकियां मेरी ,

क़तर के डैनों को रखा है रस्मों की तिजोरी में
तोड़ें रस्मों-रिवाज़ के बंधन दे दो कुंजियाँ मेरी ,

अाधीन सृजन की कलियाँ हृदय में मचलती हैं 
सुलग ज़िद्दी ना उफ़नायें दबी चिनगारियाँ मेरी। 

                                         शैल सिंह 

                                   


Monday, 28 August 2017

कविता " ढोंगी बाबाओं पर व्यंग्य "

आओ बच्चों तुम्हें सिखाएं,
सम्पत्ति अर्जित करने के नायाब तरीके,

झऊवा जैसे बाल बढ़ा लेना,
छुट्टे बकरे के पूंछ सी झबरी दाढ़ी
राम-रहीम का तमग़ा लटका
खूब लीला करना बन के मदारी
देखना सारी जागीर लुटा देंगे
तेरे अनुयायी जर,जोरू,जमींदारी
बहन,बेटियों के अस्मत की भी
बाट लगा देंगे तेरे अंधभक्त ये बन्दे
साध्वियों,सन्यासिनियों पर डोरे डालना
ले लेना दो चार दस पंगे
कोई आवाज बुलन्द करेगा गर ख़िलाफ़
मुर्ख अशिक्षित लेकर लाठी डन्डे
विरोधियों,प्रशासन पर वानर सेना सा
पिल पड़ेंगे तेरे पाले ये पागल गुंडे
नागिन डांस करेंगे तेरे लिए अंधभक्त ये ,
डाल कर खुली आँखों पर पर्दे
सम्पत्तियों को तहस-नहस कर
प्रशासन के विरुद्ध रोष जताएंगे
भक्ति के मद में डूबे ओ नकली ढोंगी 
तेरे लिए मौत को भी गले लगाएंगे
नपुंसक बनाना सबसे पहले
अपने सेवकों और सेवादारों को
हैसियत और रुतबे की धौंस दिखा
धमकाकर रखना भक्त परिवारों को
खुद को ईश्वर का साक्षात् अवतार बता
छकके कुकर्मों से मस्त बनाना अंधियारों को   

आओ बच्चों तुम्हें सिखाएं,
सम्पत्ति अर्जित करने के नायाब तरीके

मन में मक्कारी बगल कटारी वाला
बन जाना नकली बाबा कारोबारी
ऐशगाह की हर रात रंगीन बनाना
द्वार बैठा इक स्वामिभक्त दरबारी
जोकर,बहुरुपिये सा तन लिबास सजा
बिछाना भड़ुवाई का मायाजाल
भक्तों पर लम्पट प्रवचनों की बौछार कर
धुऑंधार,मचाना खूब धमाल
ब्रह्मचारी का चोला पेन्हकर
लोगों को मुर्ख बना धूल झोंकना आँखों में
फिर जो होगा देखा जायेगा उल्लू सीधा करना
उलझाए मूर्खों को रखना बातों में
जादू से जल में पूड़ी तलना
अपनाना जितने भी हों ढोंगी हथकण्डे
लाखों करोड़ों भींड़ को खूब भरमाना
कि फेल हों असली पूजारी पण्डे
ईश्वर सजा मुकर्रर तभी करेगा
जब पाप का घड़ा आकण्ठ भर जायेगा
फिर जेल में तब तक चक्की पिसना जब-तक 
उम्र और ऐश का रसिक मिजाज ढल जाएगा
दादागिरी फुस्स,फिसड्डी बनकर
मौत के दिन गिनना सलाखों के पीछे
गवाहों के बयानात खुलेंगी पोल पट्टियाँ
कैसे-कैसे खूब चलाते थे काले धन्धे 
साथ चेले चपाटी भीड़ ना होगी
बूरे वक्त में जपना हर-हर गंगे।

                                     शैल सिंह

Thursday, 24 August 2017

लाईक कमेंट भर है रिश्ता बस,

मन से मन हैं सबके फटे हुए,
वाट्सएप,फेसबुक से हैं बस जुड़े हुए,
लाईक कमेंट भर है रिश्ता बस,
गूगल महाराज के कृत्रिम गिफ्टों से,
बर्थडे,एनीवर्सरी,पर्वों पर केक,फूल से
फेसबुक वॉल है पटता रहता बस,
प्रात के आरम्भ से लेकर दोपहर
सोती रात से गई रात तक
गुडमार्निंग,गुडनाईट से कुटकुट-टुकटुक
वाट्सएप है कहता रहता बस ।

               शैल सिंह

Sunday, 20 August 2017

'' ग्राम्य जीवन पर कविता ''

                     

           '' ग्राम्य जीवन पर कविता ''

किन शब्दों में बयां करुं बदरंग हुए मेरे ग्राम्य जीवन के यथार्थ दर्शन को ,


जिस माटी में बालपन बीता आँगन ओरी तले बारिश का लुत्फ़ उठाये थे 
खेले कागज की नाव में चींटे को पतवार बना कीचड़ में सने घर आये थे ,

भूला नहीं ऊख का रस,चने,मटर का होरहा,गाय-बैल,खेतों का टूटा मेढ़
नीम डाल का झूला,गंवई के मेले,घनी लटें लटकाये बरगद का बूढ़ा पेड़ ,

टूटते-बिखरते रिश्ते,पहचान खोते गांव,आधुनिकता में संलिप्त अपनापन 
ना पूर्व सा परिदृश्य दिखा ना माई,काकी भौजी नाम वाला तृप्त सम्बोधन ,

जिस माटी के परिवेश में दांव-पेंच,छल-छद्म,धोखेबाजी,मक्कारी नहीं थी
जहाँ ईर्ष्या,द्वेष,क्लेश,शोषण,बलात्कार,असामाजिक तत्व,गद्दारी नहीं थी ,

आज भौतिकवादी युग ने गुमराह कर मानवीय मूल्यों का ह्रास कर दिया
वैमनस्यता,धूर्तता,चालबाजियों ने आदर्शवादी ढांचे को है ग्रास कर लिया ,

मेल-मिलाप,वार्तालाप की कंजुस प्रवृत्ति शहर से बढ़कर गांव की हो गई
त्यौहारों की चहल-पहल,विनोद प्रियता शहर से बढ़कर गांव की खो गई ,

ना पनघट पर कोई सखी,ना कजरी,फगुवा गीत रससिक्त मल्हार गूंजती  
ना पीपरा की छाँव का लहरन ना पहले सी कोईलर की मृदु तान कूंकती ,

मेरे प्यारे बचपन का रंग-रंगीला गांव,विहंसता नहीं सूनसान विरान मिला
ना कोल्हू कोल्हूवाड़े,कुंए  की जगत,खलिहान,ना हापुड़ का मैदान मिला ,

अपना गांव मशीनीकरण हुआ,ना कोई रिश्ता सौहार्दपूर्ण व्यवहार मिला
ना हाथ के हुनर का कारीगर,मोची,बढ़ई,नाऊ,धोबी,लुहार,कुम्हार मिला ,

फीके हुए पर्व सभी मंदिर के क्रिया-कलाप से भजन-कीर्तन भी लोप हुए
मिला न बचपन का कुछ नामो-निशां मेरे प्यारे गांव कहाँ तुम अलोप हुए। 

                                                                             शैल सिंह 

Thursday, 17 August 2017

देश पर कविता '' कहीं दुर्गन्ध नाक में दम ना कर दे ''

 देश पर कविता   '' कहीं दुर्गन्ध नाक में दम ना कर दे ''


उर्दू है तहज़ीब वतन की
हिन्दी हिन्दुस्तान का है श्रृंगार
संस्कृत है सांस्कृतिक सभ्यता
बाईबल,गीता,ग्रन्थ,कुरान हैं हार,    


हिंदुस्तान की न्यारी धरती हमारी 
जहाँ भाई-चारा आपस में सौहार्द
जहाँ भिन्न बोलियां,वेश भूषा भाषाएं
विभिन्न धर्मों के समावेश का प्यार  ,

जहाँ इबादत,प्रार्थनायें गुरु ईसा के साथ   
जहाँ भोर अजान की गूंजे चालीसा का पाठ 
जिस सभ्यता ने दिखाया विश्व को आईना 
दुश्मन सेंध लगा मुल्क को रहा है बाँट  ,

भारत माँ के विस्तृत आँचल को 
सियासत की गन्दगी ने दूषित कर डाला
छल,छद्म का बिछाकर जाल चौमुखी
जनमानस की आत्मायें कुत्सित कर डाला ,

भारतीय मूल्यों को ताक पर रख      
कुछ लोग देख रहे मुल्क़ का चीरहरण 
करते किस आजादी की मांग ये काफिर 
ज़मीर बेंच करना चाहते देश का अपहरण ,

जागरुक हो दुष्परिणाम से पहले
भटकों का हृदय परिष्कार करना है
कहीं दुर्गन्ध नाक में दम ना कर दे
देश के गन्दे कीड़ों का बहिष्कार करना है ,

                                       शैल सिंह

Saturday, 12 August 2017

पन्द्रह अगस्त पर्व मनायें हम प्रण प्यार से

बोली-भाषा से इतर,जाति-धर्म से ऊपर
दिल में राष्ट्रभक्ति अभिमान देश की भू पर
भले शीश कट जाये कभी शीश नहीं झुकायेंगे
चाहे जो देनी क़ुरबानी मातृभूमि पर प्राण लुटायेंगे 
देश की अस्मिता लिए हम आपसी भेदभाव मिटायेंगे  
अखंडता,एकता की जला मशालें विकसित राष्ट्र बनायेंगे  
भारत के उज्जवल भविष्य हेतु नौनिहालों को हमें जगाना है    
हिन्दवासियों को बाँध एक सूत्र में हिन्दुस्तान को स्वर्ग बनाना है
सकुशल जन-जन,अमन,चैन हो भारत माँ पर सर्वस्व लूटायेंगे हम 
वीर शहीदों के शौर्य की गाथायें गाकर उरों-उरों में क्रांति लायेंगे हम 
नमन तुम्हें वतन पे मिटने वालों सरहदों पे रहने वालों तुझे मेरा सलाम 
वतन महबूब मेरा,करते जी-जान से मोहब्बत माँ भारती तुझे मेरा सलाम 

                                                               शैल सिंह

Wednesday, 2 August 2017

सावन पर कविता

सावन पर कविता, मेरी 

है सावन के महीने की अजी बात निराली
मन्त्रमुग्ध कर देता क्षिति बिखेर हरियाली ,

तोड़ संयम बूँद-बूँद बरसे सावन झमाझम
उसर,बंजर,परती धरती का करे सीना नम ,

बाढ़,आपदा, भूकम्प से करता छलनी मन
धानी चूनर में जगत को बनाता नई दुल्हन ,

इन्द्रदेव करते सावन में हर्षित हो जल वर्षा
गाते मोर ,दादुर,पपिहा मोरनी नाचती हर्षा ,

घटा कारी नभ से गरज बिजलियां गिराती
इतरा क्षुद्र नाले,नदियां,नौले उफ़ान मारतीं 

कजरी,तीज,झूला,मेघ,मल्हारों भरा मौसम
नजारा देख हरा-भरा लगा मन को मनोरम ,

विरहन का तन जलाता विरह की अगन में
सावन प्रेम का अंकुर उगाता युवा जहन में ,

मस्तानी धूप बदली की,सुहानी लगती भोर
सोंधी महक माटी की शोख पवन करे शोर ,

नागपंचमी,जन्माष्टमी,रक्षाबंधन के त्योहार
सब मौसमों में लगे सावन सबसे खुशगवार ।

   क्षिति---धरती                                शैल सिंह






Tuesday, 1 August 2017

उमड़े-घुमड़े उद्गारों की


खो न जाएँ भाव कहीं
कलम हाथ ने गह ली 
दर्द, खुशी, गम ,तन्हाई,
उदासी शब्दों ने पढ़ ली
उमड़े-घुमड़े उद्गारों की
लेखनी नब्ज़ पकड़ ली
अनकही अभिव्यक्ति मेरी
काव्य कड़ी में गढ़ दी
मन की मौन कथा व्यथा
पन्नों पे हमने जड़ दी ।

                    शैल सिंह


Friday, 28 July 2017

मैं नेह की शीतल समीर हूँ

मैं नदी हूँ मन की नदी, 
बहुत कुछ अपने अतल अंतर में समेटे हुए, 
मुझमें भी समुद्र सी लहरें हैं उफान और तरंगें हैं,
मैं समन्दर की तरह भीतर के अबोध रेत को ,
किनारों पर उगल ऊंची-ऊंची छलांगें नहीं लगाती। 
मैं नदी हूँ मन की नदी शान्त, चिर स्निग्ध ,
अपने विस्तार को, मन के परिसर में ,
चुप्पी की चादर में ओढ़ाकर ,
बाह्य जगत से दूर रखती हूँ।
जब कोई शरारती कंकड़ ,
मेरी सतह से छेड़खानी करता है ,
मैं एक बुलबुला छोड़ उस परिदृश्य को ,
जज्ब कर लेती हूँ ,अपने मन के भूगर्भ में ,
पर उस शरारती तत्व को पथरी के रुप में,
वही पथरी जब अतिशय बड़ी हो ,
असहनीय दर्द का आकार लेती है ,
तब कहीं मैं फूटकर टेढ़ा-मेढ़ा राह बनाती हूँ ,
और कर देती हूँ नदी को छिछला ,
मैं नदी हूँ ,मुझमें रहस्य है ,मर्म है,संयम है ,
एक सीमा तक स्थिरता और सहनशीलता भी
मैं बावड़ी हूँ, बावली नहीं, उतावली नहीं
प्रात में मेरे मन के विशाल प्रांगण में
सूर्य किरणों संग अठखेलियां करता है
सांध्य में चाँद मेरी गहराई में समां
तारे सितारों संग रंगरेलियां करता है
मैं नेह की शीतल समीर हूँ
मैं खारी नहीं, मैं सूखी कछार भी नहीं,
मैं समंदर की तरह उफनाती चिंघाड़ती भी नहीं
बस बिचलित होती हूँ ,जब आहत होती हूँ ,
मैं नदी हूँ, मन की मौन नदी ,मुझे नदी रहने दो 
मुझमें समा समझने की कोशिश करो या ना करो ,
मैं नदी हूंँ , स्थिरता मेरी परिपाटी मेरी विरासत ।

                                शैल सिंह

Tuesday, 25 July 2017

तक़दीर टमाटर की

आसमान इंसान ही नहीं छू रहे,सब्जियां भी आसमान छू रही हैं
टमाटर नासा पहुँच अध्ययन कर रहा है लोग विश्लेषण कर रहे
आश्चर्यजनक उछाल भरे सब्जियों में रंग बघारने वाले टमाटर जी
तक़दीर जब संवरती है ना तो शीर्ष पर बैठा देती है किसी को भी
कभी लहसुन तो कभी प्याज को,तो कभी अरहर की दाल को भी ।
     
                                                                शैल सिंह


घूँघट जरा उलटने दो

    '' घूँघट जरा उलटने दो ''


आयेंगे मेरे प्रियतम आज आँख में अंजन भरने दो
संग मेरे प्रतिक्षित संगी-साथी आज मुझे संवरने दो ,

घर की ड्योढ़ी साजन को पल भर जरा ठहरने दो
दिवस कटे दर्पण सम्मुख नयन में उनके बसने दो ,

जी भर किया सिंगार उन्हें जी भर जरा निरखने दो
वो हों थोड़ा बेजार उर उनका भी जरा करकने दो ,

देखें चांदनी का शरमाना वो घूँघट जरा उलटने दो
संग खेलूं सावनी कजरी बांहें डाल गले लिपटने दो ,

अपलक देखूं उन्हें मुझे वो थोड़ा आज बहकने दो
देखूं चन्दा की भाव-भंगिमा थोड़ा आज परखने दो।

                                               शैल सिंह 

सम्पूर्ण जगत में बस एक ही भगवान हैं

एक ही हैं भगवान मगर हैं नाम अनेकों गढ़े गए
नाम के चलते ही हृदय बहुत हैं विष भी भरे गए,

अरे प्रकट हो त्रिशूलधारी भटकों को समझाओ
परब्रम्हपरमेश्वर,एकाकार एक ही हम बतलाओ,

बाँटते तुझे निज स्वार्थ लिए विभिन्न धर्मों-पंन्थों में
अशांति मचा रखे दहशत फैला मुल्कों-मुल्कों में,

गर नहींं समझें अपना रौद्र ता्डव रूप दिखाओ
जिनके उत्पात से त्रस्त सभी गह के वज्र गिराओ,

बड़ा लिया तूने इम्तिहान और देखा खून खराबा
मची नाम पे तेरे मारकाट तूं बैठा है कौन दुवाबा,

आस्था पे तेरी हम मरते जो मांगें जन्नत का प्यार
बस राम मंदिर बनवा दे उनका प्राण हूरों पे वार ।

                                                 शैल सिंह

ये शब्द



जितने भाव उमड़ते उर में
शब्द  जुबां बन  जाते  हैं
जहाँ अधर नहीं खुल पाते
झट सहगामी बन जाते हैं 
खुद में ढाल जज्बातों को 
मन का सब कह जाते हैं | 

                      शैल सिंह 

Sunday, 23 July 2017

कई दिनों की बारिश से आजिज होने पर


कई दिनों की बारिश से आजिज होने पर,

बन्द करो अब रोना बरखा रानी
बहुत हो गया जल बरसानी
भर गया कोना-कोना पानी ,

नाला उफन घर घुसने को आतुर,
जल भरे खेत लगें भयातुर,
रोमांचित बस मोर,पपिहा,दादुर ,

कितने दिन हो गए घर से निकले
पथ जम गई काई पग हैं फिसले
बन्द करो प्रलाप क्या दूं इसके बदले ,

कितने दिन हो गए सूरज दर्शन
तरसे धूप लिए मन मधुवन
कपड़े ओदे,घर भरा सीलन ,

रस्ता दलदल किचकिच कर दी
मक्खी, मच्छर से घर भर दी
गुमसाईन महके सब हद कर दी ,

जलावतन से बिलें भरीं यकायक
जीव घूम रहे खुलेआम भयानक
जाने कब क्या हो जाए अचानक ,

बहुत हो गई तेरी अति वृष्टि की
बरसो कहीं और जगहें भी सृष्टि की
काबिलियत दिखाओ ऐसी कृति की ।

                          शैल सिंह

Thursday, 20 July 2017

क्रान्तिकारी कविता '' शब्दों की परिमिति लांघी रे बहती स्याही की धार ''

क्रान्तिकारी कविता 

हस्त कलम गहते ही भक-भक लगी उगलने छार
शब्दों की परिमिति लांघी रे बहती स्याही की धार ,
तोड़ के बंधन विविध भीति के की द्विजिहा ने वार 
चल गई खंजर कागज पे दिल ने जो उगली उद्गार |

परिमिति--सीमा      
 भीति--भय,डर                                        
                      शैल सिंह 

क्रमशः--

जब-जब सांप-सपोलों के,फन हमको फुफकारेंगे
ताल ठोंककर कहते जी,हम मौत के घाट उतारेंगे ,

कबतक मलते रहेंगे हाथ वो घात के पांव पसारेंगे
दूध पिलाया ठर्रा तो जूतमपैजारम से भूत उतारेंगे ,

क्या समझे हो मरदूदों जो जी में आएगा बक दोगे
अभिव्यक्ति की आजादी पे थोबड़ा तोड़ भोथारेंगे ,

संपोला शरण में रहने वाला गर ऐसे आँख तरेरेगा
ज़रा ना होगी देर आँख से आग उगल  भक्ष डारेंगे  ,

अगर शहीद की परिभाषा पड़ी तुम्हें समझानी तो
तत्काल स्वर्ग के रस्ते का सरजाम अनेक संवारेंगे ,

क्यों मुल्क से कर बग़ावत तूं दिखलाता तुर्रा तेवर
औक़ात तेरी बतलाने को तुझे धोधो और कचारेंगे ,

जिस थाली खा छेद उसी में पामर,पिशाच करेगा
राग जपे कृतघ्न गैरमुल्क़ का देखो खाल उधारेंगे , 

जयचंदों की मिलीभगत से आज अशान्त वतन है
गद्दार कर्त्तव्यशून्य मतिमंदों को भी खूब निथारेंगे ,

चौकसी में सेना ग्रास बने साजिश की सरहद पे 
जश्न करे तूं कुढ़कुढ़ खून भरी आँखों से निहारेंगे ,

तूने कर्णधारों,शूरवीरों के कुटुम्बों को बिलखाया 
नहीं,तड़-तड़ गोली बौछारों से भेजा तेरा बुहारेंगे ,

नरपिशाचों,भेड़ियों अम्मीयों ने क्या संस्कार दिए
हरा रंग का चढ़ा फितूर रौंद पांव तले ललकारेंगे ,

ऐ शुभचिंतकों आतंकी रहनुमाओं,सरगनाओं के 
देह नोच निर्दयता से अन्तड़ि भी खींच निकारेंगे ,

कलेजा चाक हुआ है देख क्षतविक्षत जवानों को
सर बाँधा कफ़न तेरे ख़ून से माँ का पांव पखारेंगे ,

दीप तेरा भी होगा गुल हनुमनथप्पाओं के बदले 
क्यूँ उकसाते तेरे पुरखों तक का ताबूत उखारेंगे ,

हद हो गई हद से बाहर हम रट अहिंसा त्यागेंगे
प्रण करते हैं बर्बरता से तेरा अंग-अंग चटकारेंगे ,

आहत बार-बार विश्वास हुई बहुत वंश हम खोये 
ऐसे कृत्य पे किस हर्ष से अंश को तेरे पुचकारेंगे ,

वतन लिए फाँसी एक अशफ़ाक़उल्ला झूल गए
तैमूर के ये दुर्दांत कालिख देश के मुँह पोचारेंगे ,

होते खाक तूम विश्वपटल पर देख धमक हमारी
धाक से तेरी जमीं पे जा केसरिया रंग लहकारेंगे ,

अबतक सभा मौन थी तूने देश का चीर खसोटा
चक्र सुदर्शन धार लिये कृष्णा चूलें तेरी खखारेंगे ,

ऐ नाशुक्र,नपुंसक,नाजायज औलादों गजनी की
करो अनेकों अफजल पैदा बाप को भी पछारेंगे ,

तूं कुरान के निर्देशों को कुकर्मों का ढाल बना़ले
हम गीता रामायण के पावन मन्त्रोचार उच्चारेंगे ,

तुम स्वत: जगाओ जज्बा काफिरों देशभक्ति के 
होश में आओगे तब जब रब ही तुझे धिक्कारेंगे ,

हर क्षण प्राण हदस में तुम भी बैरी से मिल जाते 
शहर सैलानि के अकाल यहाँ कैसे दिन गुजारेंगे ,

बनी अखाड़ा रण की कश्मीर की मनोहर घाटी 
कैसे केसर,इत्र की खुश्बू क्षेत्र फिजां में फुहारेंगे ,

बहुत सहे वार पीठ पे अपने दर्द भी खूब दिए हैं
ओ हूरों के आशिक़ भेजेंगे जब भी कब्र पुकारेंगे ,

                                      शैल सिंह

  









Monday, 17 July 2017

मेघ से उलाहना

'' मेघ से उलाहना ''



उमड़-घुमड़ घनघोर घटा
नखरे दिखा लौट जाती है
चाहत का उल्लंघन कर
मन भर जी को जलाती है ,

देखें कब बूंदों के सोंधेपन से
भरेंगे नथुने सरगोशी कराती है
कब रिमझिम सुरों से हर्षोन्माद
जगेंगे धरा बुदबुदाती है ,

न जाने कब अँधेरे में टिप-टुप
कुछ बूंदा-बांदी गिराती है
दूसरे ही पल तैश में आकर
ऊष्मा पुनः रौब दिखाती है ,

लगे हण्टर सी तपन सूर्य की
रेत सी धरती तड़फड़ाती है
लगी नभ पे सभी की टकटकी
छोड़ ऐंठन क्यों भाव खाती है ,

बेहाल जीव-जंतु वन्य प्राणी
आस के मंच ताजपोशी कराती है
जरूरत के मुताबिक कब
कभी नाशपीटी रंग में आती है ,

बाढ़ का कहर कहीं मार सूखे की
कभी बेढब व्यवहार दिखाती है
कभी अनहद बरस मनबढ़
सैलाबों में सब कुछ बहाती है ,

सरसा बरस सीना धरणि का 
मिटा पल में ऊष्मा क्यों सताती है
बनती हर जुबां की कोपभाजन 
कड़क-कड़ट भर अवसाद जाती है ,

सुनो गुहार मनहर मेघराज
घटा दिग्भ्रमित चक्र्व्यूह रचाती है 
छलकाओ न गागर वृष्टि की
सूखे कंठ मेंढकि टरटर्राती है,

                               शैल सिंह 










Sunday, 16 July 2017

ग़ज़ल " कभी तो ढहेंगी दरो दीवार गलतफहमियों की "

ये कैसा नशा प्यार का के बेवफाई के शहर में
टूटी उम्मीदें हैं बरकरार आज भी
भले बदल गए वो आते-जाते मौसम की तरह
इन आँखों में है इंतजार आज भी
कभी तो ढहेंगी दरो दीवार गलतफहमियों की
आस में दिल है बेक़रार आज भी 
दरमियां रिश्तों के खिले फूल से अल्फाज जो
कानों में ताज़ी है झंकार आज भी
बहा ना ले आँखों की दरिया का सैलाब कहीं
फ़िक्र यादों का है अम्बार आज भी
कैसे समझाऊँ ख़्वाबों,साजिशों के बाजार में
दिल हो रहा है शिकार आज भी
ये कैसा फलसफ़ा ज़िंदगी,मोहब्बत-दोस्ती में  
दर्द का मिले है गुब्बार आज भी | 

                                   शैल सिंह

Friday, 14 July 2017

ग़ज़ल '' कोई याद आ रहा है ''

  ग़ज़ल

          '' कोई याद आ रहा है ''


रुमानियत भरा ये मौसम शायरी सुना रहा है
गा रहीं ग़ज़ल फ़िज़ाएं अम्बर गुनगुना रहा है ,

घटा में मुँह छिपाये बादल खिलखिला रहा है
मृदुल आह्लाद भरे इन्द्रधनुष घन लुभा रहा है ,

गले प्रफ़ुल्ल पात-पात लग ताली बजा रहा है
महकी हुई दिशाएं वातावरण मुस्कुरा रहा है ,

मन्जर सुहाना सावन का बांसुरी बजा रहा है
छटा अलौकिक अलमस्त माज़ी जगा रहा है ,

बीते मधुर पलों को चित्रित समां करा रहा है
हसीं यादगार का पुराना जख़ीरा गिरा रहा है ,

आहिस्ता चाँद उतर आँगन उर जला रहा है
इतना ख़ुशगवार लम्हा कोई याद आ रहा है |

                                   शैल सिंह





Tuesday, 11 July 2017

            कविता
'' हो रहे पृथक मैं-मैं से सभी ''


इक दिन पास उसी के जाना सबको
जो तीनों लोकों का स्वामी है
भले-बुरे कर्मों का लेखा-जोखा
रखता ऊपर वाला अन्तर्यामी है ,

मत तेरा-मेरा कहा करो जी
सब यहीं धरा रहा जायेगा
माटी का तन माटी में मिल
इक दिन ब्रह्मलीन हो जायेगा ,

ऐसे तत्वों का बस संग्रह करना 
जिससे सुख आनन्द मिले भरपूर
तेरी हँसी बन जाये दवा रुग्ण की
जो निःशुल्क मगर बहुमूल्य है गुर ,

बुद्धि की सम्पत्ति बाँट सभी में
धैर्य का रखना संग हथियार सदा
रक्षा कर विश्वास,संस्कार की रखना
रिश्तों में प्रीत की घोल सम्पदा ,

ऐसी मुस्कान बिखेरो मुखारबिन्दु
कि,पराये भी शामिल होके हँसे
आँसू तो आँखों के होकर भी
बहते ही पराया हो विहँसे ,

हो रहे पृथक मैं-मैं से सभी
चलो हम-हम का रिस्ता जोड़ें
इंसानियत,मानवता सबपे भारी
दम्भ हैसियत का सस्ता छोड़ें ,

श्रद्धा,ज्ञान,दया,सम्मान,नम्रता
जीवन तन के शृंगार आभूषण हैं
प्रार्थना,विश्वास अदृश्य भले पर
कर देते असम्भव को भी धूसर हैं ,

वसीयत,भोग-विलास,विरासत
मे, ना भूलें कर्मों की प्रधानता
परमपिता रखता हिसाब-किताब
जिनके कर्मों में होती महानता |

गुर---गुण

                   शैल सिंह

Saturday, 1 July 2017

कविता " एक शहीद की पत्नी की दारून व्यथा "

डाल ओहार ताबूत तिरंगे की
अर्थी आई पिया की मैं सन्न रह गई
जन सैलाव का उमड़ा हुजूम दर
देख शव संग पिया की मैं सन्न रह गई ,

ख़त का मजमून पूरा पढ़ा भी न था
शहादत की खबर यूँ बता दी गई
थे जिनके लिए बेसबर दो नयन
झट चंन्दन की चिता सजा दी गईं ,

राह तकती महावर लगी एड़ियां
सुर्ख हीना हथेली रची रह गई
गजरे की लड़ियों गूंथीं वेणियां
सेज फूलों सजी की सजी रह गई ,

तोड़ बिखरा गईं कांच की चूड़ियां
झट माथे की बिंदिया मिटा दी गई
मेरे सिंगार के सारे असवाब भी
धू-धू करती चिता में जला दी गईं ,

श्वेत वस्त्रों का अभरण पेन्हाया गया
स्वर्णाभूषण वदन से हटा दी गईं
चाँद से मुखड़े पर थी भरी माँग जो
टार घूँघट फट लाली उठा दी गईं ,

टूटा कैसा कहर मुझपे हा जिन्दगी
जिन्दगी भर को बिधवा बना दी गई
ओढ़ जाऊँ कहाँ लिबास वैधव्य का
शोक संग जब सगाई मना दी गई ।

मिली कैसी सजा मेरे जांबाज को
जवां जिन्दगी वतन पर लूटा दी गई
देशभक्त सीमा प्रहरी की ये दुर्दशा
मेरी हसीं देखो दुनिया मिटा दी गई ,

एक कतरा गिरा देश की आँख से
बूँदें श्रद्धांजलि की चढ़ा दी गईं
लूटा संसार मेरा सदा के लिए
कृति सैनिक पिया की भूला दी गई ।

ओहार--परदा , वेणियां--चोटी ,
असवाब--सामग्री ,

शैल सिंह

Sunday, 4 June 2017

गर्मी पर कविता '' हे सूरजदेव तरस खाओ ''

'' हे सूरजदेव तरस खाओ ''


अकड़ इतनी नहीं अच्छी
जरा तेवर को वश में रखो
भीषण ताप से झुलसाना
कलेवर पास अपने रखो ,

भाती भोर की शीतलता
उजाला दिन का सूरज जी
हो अग्निपिण्ड का तुम गोला 
मचाते हड़कम्प लपट से जी,

कड़कती धूप का कहर
वदन है आग सी झुलसे
हे सूरजदेव तरस खाओ
घटा रिमझिम अवनि बरसे ,

मनमौजी प्रकोप से
कब निज़ात दिलाओगे
कब बारिस की फुहारों से
दहक तन की मिटाओगे

पौधों को मार गया लकवा
खड़े निर्जीव क्यारी में
पांखी उन्मुक्त पड़े दुबके
नीड़ों की चारदीवारी में ,

लगता जान ले लेगी
असहनीय ऊफ्फ़ ये गर्मी
बता लाओगे कब मानसून
चिलचिलाती धूप में नरमी

जीना हो गया दूभर
लिसलिसाये तन पसीने से
मिले चन्दन सी शीतलता  
चढ़े तन वस्त्र झीने से ,

तेरे लू के थपेड़ों की
तीखी मार से बेहाल
तमतमाना छोड़ बिछाओ ना
घुमड़ते घन का महाजाल

तेरी ऊष्मा से सैर-सपाटे
चौपट अवकाश गर्मी की
सुबह अलसाई बड़ी होती
कड़ी दोपहरी गर्मी की ,

हे इन्द्रदेव निमन्त्रण देते
तुझे बाग़ तड़ाग पशु पक्षी
सूखे ताल,तलैया,पोखर
प्यासी मीन दरकती धरती |

                      शैल सिंह

Thursday, 1 June 2017

वसंत ऋतु पर कविता

  वसंत ऋतु पर कविता 


बड़ा सुहावन मन भावन
लगे वसंत तेरा आना
थोड़ी सर्दी थोड़ी गर्मी
मौसम बड़ा सुहाना ,

इंद्रधनुष ने खींची रंगोली
सज गई मधुऋतु की डोली
बिखरा दी अम्बर ने रोली
धरती मांग सजा खुश हो ली
छितरी न्यारी सुषमा चहुँदिश
कलियाँ घूँघट के पट खोलीं
आई ठूँठों पे तरुणाई
भर गई उपहारों से झोली,

बड़ा सुहावन मन भावन
लगे वसंत तेरा आना।,

देख हरित धरणी का विजन
हुआ मन मयूर मस्ताना
पीली चूनर सरसों लहराई
उसपे तितली का मंडराना
पी मकरंद मस्त भये मधुकर
मद में मगन दीवाना
गूंजे विहंगों की किलकारी
कुञ्ज-कुटीर मलय भर जाना ,

बड़ा सुहावन मन भावन
लगे वसंत तेरा आना ,

अमराई महके बौराई
मधुकंठी तान सुनाये
देख वासन्ती मादकता नाचे
वन,वीथिक मयूरा बौराये
पछुआ-पुरवा की शीतल सुरभि
नशीला गन्ध जिया भरमाये
पापी पपीहरा पिउ-पिउ बोले
सुध विरहन को पी की सताये ,

बड़ा सुहावन मन भावन
लगे वसंत तेरा आना ,

चित चकोर तिरछी चितवन से
अपने सजन से करे निहोरा
मूक अधर और दृग से चुगली
करे दम-दम सिंगार-पटोरा
प्रकृति नटी भरे उमंग अंग औ
वाचाल कंगना हुआ छिछोरा
बूझे ना अनुभाव बलम अनाड़ी
कंचन देह अंगार दहकावे मोरा ,

बड़ा सुहावन मन भावन
लगे वसंत तेरा आना ,
`
वासन्ती दुपहरिया में गर
संग प्रियतम मेरे होते
प्रीत रंग में नहा सराबोर
हम सारा अंग भिगोते ,
धारे पीत-हरा रंग धरा वसन
चिरयौवन दिखलाये
बहे उन्मादी फागुनी हवाऐं
चाँदनी उर पे बरछी चलाये ,

बड़ा सुहावन मन भावन
लगे वसंत तेरा आना ,

लगे नववधू सी वसुधा
सूरज प्रणय निवेदन करता
इठलाये अवनि हुलास से
होंठों पे शतदल खिलता ,
टेसू,गुलाब,हरसिंगार,पलाश
मौली,कचनार पे पवन है रीझता
मनमोहक बिछा है इन्द्रजाल
दिग-दिगन्त सौन्दर्य दमकता ,

बड़ा सुहावन मन भावन
लगे वसंत तेरा आना ।

                            शैल सिंह

Monday, 29 May 2017

एक छोटी सी गजल

ऐ हवा ला कभी उनके घर की ख़बर
जबसे मिल के गए न मुड़के देखा इधर
जा पता पूछ कर आ बता कुछ इधर
क्यों बदल सी गई हमसफ़र की नजर |

ऐ बहारों कभी मेरे दर से भी गुजर
देख जा आके कैसी खिजां मैं है शज़र
जिसकी हर शाख़ पे वो मचाये ग़दर
हो गए बेखबर क्यूँ आजकल इस कदर ।
                                      शैल सिंह

'' माँ पर कविता ''

'' माँ पर कविता ''


सबसे प्यारी सबसे न्यारी
पूज्यनीया है माँ
माँ से बढ़कर दुनिया में
नहीं कोई बड़ा इन्सान
माँ के आगे सब कुछ बौना
बौना लगे भगवान
माँ दुनिया की पहली अवतरण
जिसे कहते हैं माँ
कि तेरे जैसा कोई नहीं माँ
न तेरे जैसा सुन्दर नाम ,

माँ शब्द शहद से मीठा
आत्मीयता सोम सी माँ की
माँ सृष्टि सृजन की रचईता
सारे अनुष्ठान चरण में माँ की
सबसे बड़ा तीरथ माँ का दर्शन
चारों धाम परिधि में माँ की
माँ त्याग,तपस्या करुणा की देवी
पूजा,मन्त्र है जाप जहाँ की
कि तेरे जैसा कोई नहीं माँ
न तेरे जैसा सुन्दर नाम ,

तेरे गर्भ के गहन प्रेम की
उपलब्धि मैं माँ
तेरे बिना कहाँ सम्भव था
दुनिया में मेरा आना
कितनी पीड़ा दर्द सहा के  
मैं दीदार करूँ दुनिया का 
सारी दुनिया तुझमें समाई
कभी कर्ज़ चुके ना माँ का
कि तेरे जैसा कोई नहीं माँ
न तेरे जैसा सुन्दर नाम ,

तूं ममता की पावन मूरत
तेरा आँचल सुख का सागर
रात-रात भर जाग सुलाई
मुझको लोरी गाकर
तेरे आँचल की छाँव में छलका
निस दिन स्नेह का गागर
भींच सीने में सिर सहलाई
खिली अंक में मुझे लिटाकर
कि तेरे जैसा कोई नहीं माँ
न तेरे जैसा सुन्दर नाम ,

अतुलनीय तेरी ममता,मुझपे
जीवन सहर्ष न्यौछार दिया
कर्तव्य निर्वहन की बेदी पर
वैविध्य प्यार,दुलार किया
तुझ सा नहीं बलिदानी कोई
न तुझ सा माँ कोई उदार,
रक्तकणों से निर्मित कर दी
इतना बड़ा संसार 
कि तेरे जैसा कोई नहीं माँ
न तेरे जैसा सुन्दर नाम ,

सबसे अमूल्य तोहफ़ा ईश्वर की
कैसे शब्दों में बाँधूँ माँ को
सहा ना जाने कितनी मुसीबत
कभी आंच न आने दी मुझको
सबसे सुन्दर​ माँ की रचना 
माँ से सुवासित ये संसार
सर्वस्व लूटाकर बरसाई बस
आशीषों की तरल फुहार
कि तेरे जैसा कोई नहीं माँ
न तेरे जैसा सुन्दर नाम ,

कहाँ मिले तरुवर तले रे माँ
तेरे आँचल सी मीठी छाया
बहुत से रिश्ते दुनिया में पर
निःस्वार्थ न तुझ सी माया
गीली शैय्या सोकर तूने
दिया आँचल का नरम बिछौना
तेरे अंश को नज़र लगे ना
दिया काजल का चाँद ढिठौना
कि तेरे जैसा कोई नहीं माँ
न तेरे जैसा सुन्दर नाम ,

दुनिया में लाई श्रेय तुझे माँ
तेरी उँगली पकड़ सीखा चलना
तूं ही मेरी पहली प्रशिक्षक
तुझी से सीखा बोलना हँसना
हर मुश्किल में तूं संग मेरे
हर जिद पूरी तुझसे
गलत सही का फ़र्क भी जाना
तेरी बतलाई सीख से
कि तेरे जैसा कोई नहीं माँ
न तेरे जैसा सुन्दर नाम ,

भले तूं ओझल दृग से
तेरे एहसास की ख़ुश्बू तन में  
हर पल महसूसती आज भी
तेरी मौजूदगी माँ कण-कण में
तेरे स्पर्श को तरसें बांहें
अँकवार में भरकर रोने को
ढूंढ़ रहे तुझे नैन विक्षिप्त हो
घर के कोने-कोने को
कि तेरे जैसा कोई नहीं माँ
न तेरे जैसा सुन्दर नाम |

ढिठौना --नजर न लगे इसलिए काजल का टीका

                      शैल सिंह

Tuesday, 23 May 2017

राम मन्दिर पर कविता

मुख़्यमंत्री आदित्यनाथ योगी जी से एक राम भक्त की गुज़ारिश ,

      '' राम मन्दिर पर कविता ''


भज-भज के सब राम के नाम
साध रहे बस अपने काम
राम सिया के काट रहे दिन छतरी में
बैठे तिरपाल की बखरी में ,

भिंगो रहीं बारिश की बूँदें
तपा रहा तन घाम
हवा के निर्मम आघात सहें
ठिठुर रहे सर्दी में राम
सहा न जाये राज में तेरे
राम का ये अपमान
जल्दी से करवाओ योगी जी
मन्दिर का विशाल निर्माण ,

भौंकने वाले भौंकेंगे
उन्हें भौंकने दीजिये योगी जी
इस बात पे जल्दी अमल कीजिये
साथ में लेकर मोदी जी
कहीं लक्ष्य अधूरा रह ना जाये
जल्दी खोजिये हल समाधान
असली गर्भ गृह पर मंशा
हो मन्दिर का विशाल निर्माण ,

अत्याचारी बाबर की बर्बरता
विध्वंस हुई रघुवंशी भव्यता
हिन्दुओं की आस्था का सवाल
इसपे क्यों विवाद औ मचा बवाल ,
कौशिल्या कोख़ से इसी जगह
लिए राम अद्द्भुत अवतार
अयोध्या हिन्दू धर्म का धाम ,
हो मन्दिर का विशाल निर्माण ,

कुछ से मोर्चा लेना होगा
कुछ से वार्ता का प्रावधान
दरकिनार कर काफ़िरों को
करना तर्ज़ पे सोमनाथ के काम
यही सुनहरा अवसर योगी जी
क्यों देना कोई तथ्य प्रमाण
मर्यादा पुरुषोत्तम राम महान
हो मन्दिर का विशाल निर्माण ,

जिद छोड़ बाबरी मस्जिद की
छोड़ आक्रांता बाबर का गुणगान
सहभागिता निभाएं कर उदार उर
हिन्दुस्तान के सारे मुसलमान
इक अत्याचारी की कारगुजारी पे
हो बंद अब तो क़त्लेआम
राम भक्तों का सुनो फरमान
हो मन्दिर का विशाल निर्माण |

                           शैल सिंह



Saturday, 6 May 2017

योगी जी पर कविता

यह कविता मैंने भाजपा की जीत पर तीन माह पहले लिखी थी पर पोस्ट आज कर रही हूँ ,मोदी जी से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिए जन-जन की मांग थे योगी जी ,जौहरी साबित हुए मोदी जी | योगी जी के अकाट्य कार्य का स्वरूप देखते हुए आज मन में आया कि योगी जी के लिए जो भाव उमड़े थे उसे आज दर्शा ही दूँ | 


      योगी जी पर कविता 


महर्षि रूपी मोती लाये मोदी जी खंगाल के
यू.पी.वालों कद्र करना योगी जी कमाल के
मशक़्क़त से ख़ोज लाये यह हीरा तराश के
रखना कीमती नगीना ये पलकों बिठाल के ,

गरजता जो सिंह सा औ दहाड़ता है शेर सा
खुद के लिए न जिसका कुछ क्षुद्र स्वार्थ सा
जो ऐसा कर्मयोगी करता हिन्दुत्व की पैरवी
उसपे जनता हुई न्यौछावर मुग्ध राग भैरवी ,

ऐसा कोहिनूर जाँच-परख़ ला सौंपा जौहरी
तख़्त पे यू.पी.के बैठा दिया दमदार चौधरी
ये निष्पक्ष द्वेषरहित करता निःस्वार्थ सेवाएं
स्वधर्म का हिमायती फ़िदा जिसपे फिजाएं ,

विरोधी तत्व लगाते ठप्पा सम्प्रदायवाद की
राष्ट्र चिंतन इनके भाव अलख राष्ट्रवाद की
भगवा है आत्मरूप हुंकार हिन्दुत्ववाद की
काट फेंक दिया जनता ने जड़ वंशवाद की ,

सर्वोपरि हो राष्ट्र निर्माण उन्नत समाज का
निजहित परे कामना समुन्नत कल्याण​ का
जो सुख,विलास त्याग धरा पथ निर्वाण का
वो सन्यासी बना चहेता विस्तृत अवाम का | 

                                     शैल सिंह