Saturday, 12 August 2017

पन्द्रह अगस्त पर्व मनायें हम प्रण प्यार से

बोली-भाषा से इतर,जाति-धर्म से ऊपर
दिल में राष्ट्रभक्ति अभिमान देश की भू पर
भले शीश कट जाये कभी शीश नहीं झुकायेंगे
चाहे जो देनी क़ुरबानी मातृभूमि पर प्राण लुटायेंगे 
देश की अस्मिता लिए हम आपसी भेदभाव मिटायेंगे  
अखंडता,एकता की जला मशालें विकसित राष्ट्र बनायेंगे  
भारत के उज्जवल भविष्य हेतु नौनिहालों को हमें जगाना है    
हिन्दवासियों को बाँध एक सूत्र में हिन्दुस्तान को स्वर्ग बनाना है
सकुशल जन-जन,अमन,चैन हो भारत माँ पर सर्वस्व लूटायेंगे हम 
वीर शहीदों के शौर्य की गाथायें गाकर उरों-उरों में क्रांति लायेंगे हम 
नमन तुम्हें वतन पे मिटने वालों सरहदों पे रहने वालों तुझे मेरा सलाम 
वतन महबूब मेरा,करते जी-जान से मोहब्बत माँ भारती तुझे मेरा सलाम 

                                                               शैल सिंह

Wednesday, 2 August 2017

सावन पर कविता

सावन पर कविता, मेरी 

है सावन के महीने की अजी बात निराली
मन्त्रमुग्ध कर देता क्षिति बिखेर हरियाली ,

तोड़ संयम बूँद-बूँद बरसे सावन झमाझम
उसर,बंजर,परती धरती का करे सीना नम ,

बाढ़,आपदा, भूकम्प से करता छलनी मन
धानी चूनर में जगत को बनाता नई दुल्हन ,

इन्द्रदेव करते सावन में हर्षित हो जल वर्षा
गाते मोर ,दादुर,पपिहा मोरनी नाचती हर्षा ,

घटा कारी नभ से गरज बिजलियां गिराती
इतरा क्षुद्र नाले,नदियां,नौले उफ़ान मारतीं 

कजरी,तीज,झूला,मेघ,मल्हारों भरा मौसम
नजारा देख हरा-भरा लगा मन को मनोरम ,

विरहन का तन जलाता विरह की अगन में
सावन प्रेम का अंकुर उगाता युवा जहन में ,

मस्तानी धूप बदली की,सुहानी लगती भोर
माटी की महक सोंधी पवन शोख करे शोर ,

नागपंचमी,जन्माष्टमी,रक्षाबंधन के त्योहार
सब मौसमों में लगे सावन सबसे खुशगवार ।

   क्षिति---धरती                                शैल सिंह






Tuesday, 1 August 2017

उमड़े-घुमड़े उद्गारों की


खो न जाएँ भाव कहीं
कलम हाथ ने गह ली 
दर्द, खुशी, गम ,तन्हाई,
उदासी शब्दों ने पढ़ ली
उमड़े-घुमड़े उद्गारों की
लेखनी नब्ज़ पकड़ ली
अनकही अभिव्यक्ति मेरी
काव्य कड़ी में गढ़ दी
मन की मौन कथा व्यथा
पन्नों पे हमने जड़ दी ।

                    शैल सिंह


Friday, 28 July 2017

मैं नेह की शीतल समीर हूँ

मैं नदी हूँ मन की नदी, 
बहुत कुछ अपने अतल अंतर में समेटे हुए, 
मुझमें भी समुद्र सी लहरें हैं उफान और तरंगें हैं,
मैं समन्दर की तरह भीतर के अबोध रेत को ,
किनारों पर उगल ऊंची-ऊंची छलांगें नहीं लगाती। 
मैं नदी हूँ मन की नदी शान्त, चिर स्निग्ध ,
अपने विस्तार को, मन के परिसर में ,
चुप्पी की चादर में ओढ़ाकर ,
बाह्य जगत से दूर रखती हूँ।
जब कोई शरारती कंकड़ ,
मेरी सतह से छेड़खानी करता है ,
मैं एक बुलबुला छोड़ उस परिदृश्य को ,
जज्ब कर लेती हूँ ,अपने मन के भूगर्भ में ,
पर उस शरारती तत्व को पथरी के रुप में,
वही पथरी जब अतिशय बड़ी हो ,
असहनीय दर्द का आकार लेती है ,
तब कहीं मैं फूटकर टेढ़ा-मेढ़ा राह बनाती हूँ ,
और कर देती हूँ नदी को छिछला ,
मैं नदी हूँ ,मुझमें रहस्य है ,मर्म है,संयम है ,
एक सीमा तक स्थिरता और सहनशीलता भी
मैं बावड़ी हूँ, बावली नहीं, उतावली नहीं
प्रात में मेरे मन के विशाल प्रांगण में
सूर्य किरणों संग अठखेलियां करता है
सांध्य में चाँद मेरी गहराई में समां
तारे सितारों संग रंगरेलियां करता है
मैं नेह की शीतल समीर हूँ
मैं खारी नहीं, मैं सूखी कछार भी नहीं,
मैं समंदर की तरह उफनाती चिंघाड़ती भी नहीं
बस बिचलित होती हूँ ,जब आहत होती हूँ ,
मैं नदी हूँ, मन की मौन नदी ,मुझे नदी रहने दो 
मुझमें समा समझने की कोशिश करो या ना करो ,
मैं नदी हूंँ , स्थिरता मेरी परिपाटी मेरी विरासत ।

                                शैल सिंह

Tuesday, 25 July 2017

तक़दीर टमाटर की

आसमान इंसान ही नहीं छू रहे,सब्जियां भी आसमान छू रही हैं
टमाटर नासा पहुँच अध्ययन कर रहा है लोग विश्लेषण कर रहे
आश्चर्यजनक उछाल भरे सब्जियों में रंग बघारने वाले टमाटर जी
तक़दीर जब संवरती है ना तो शीर्ष पर बैठा देती है किसी को भी
कभी लहसुन तो कभी प्याज को,तो कभी अरहर की दाल को भी ।
     
                                                                शैल सिंह


घूँघट जरा उलटने दो

    '' घूँघट जरा उलटने दो ''


आयेंगे मेरे प्रियतम आज आँख में अंजन भरने दो
संग मेरे प्रतिक्षित संगी-साथी आज मुझे संवरने दो ,

घर की ड्योढ़ी साजन को पल भर जरा ठहरने दो
दिवस कटे दर्पण सम्मुख नयन में उनके बसने दो ,

जी भर किया सिंगार उन्हें जी भर जरा निरखने दो
वो हों थोड़ा बेजार उर उनका भी जरा करकने दो ,

देखें चांदनी का शरमाना वो घूँघट जरा उलटने दो
संग खेलूं सावनी कजरी बांहें डाल गले लिपटने दो ,

अपलक देखूं उन्हें मुझे वो थोड़ा आज बहकने दो
देखूं चन्दा की भाव-भंगिमा थोड़ा आज परखने दो।

                                               शैल सिंह 

सम्पूर्ण जगत में बस एक ही भगवान हैं

एक ही हैं भगवान मगर हैं नाम अनेकों गढ़े गए
नाम के चलते ही हृदय बहुत हैं विष भी भरे गए,

अरे प्रकट हो त्रिशूलधारी भटकों को समझाओ
परब्रम्हपरमेश्वर,एकाकार एक ही हम बतलाओ,

बाँटते तुझे निज स्वार्थ लिए विभिन्न धर्मों-पंन्थों में
अशांति मचा रखे दहशत फैला मुल्कों-मुल्कों में,

गर नहींं समझें अपना रौद्र ता्डव रूप दिखाओ
जिनके उत्पात से त्रस्त सभी गह के वज्र गिराओ,

बड़ा लिया तूने इम्तिहान और देखा खून खराबा
मची नाम पे तेरे मारकाट तूं बैठा है कौन दुवाबा,

आस्था पे तेरी हम मरते जो मांगें जन्नत का प्यार
बस राम मंदिर बनवा दे उनका प्राण हूरों पे वार ।

                                                 शैल सिंह

ये शब्द



जितने भाव उमड़ते उर में
शब्द  जुबां बन  जाते  हैं
जहाँ अधर नहीं खुल पाते
झट सहगामी बन जाते हैं 
खुद में ढाल जज्बातों को 
मन का सब कह जाते हैं | 

                      शैल सिंह 

Sunday, 23 July 2017

कई दिनों की बारिश से आजिज होने पर


कई दिनों की बारिश से आजिज होने पर,

बन्द करो अब रोना बरखा रानी
बहुत हो गया जल बरसानी
भर गया कोना-कोना पानी ,

नाला उफन घर घुसने को आतुर,
जल भरे खेत लगें भयातुर,
रोमांचित बस मोर,पपिहा,दादुर ,

कितने दिन हो गए घर से निकले
पथ जम गई काई पग हैं फिसले
बन्द करो प्रलाप क्या दूं इसके बदले ,

कितने दिन हो गए सूरज दर्शन
तरसे धूप लिए मन मधुवन
कपड़े ओदे,घर भरा सीलन ,

रस्ता दलदल किचकिच कर दी
मक्खी, मच्छर से घर भर दी
गुमसाईन महके सब हद कर दी ,

जलावतन से बिलें भरीं यकायक
जीव घूम रहे खुलेआम भयानक
जाने कब क्या हो जाए अचानक ,

बहुत हो गई तेरी अति वृष्टि की
बरसो कहीं और जगहें भी सृष्टि की
काबिलियत दिखाओ ऐसी कृति की ।

                          शैल सिंह

Thursday, 20 July 2017

क्रान्तिकारी कविता '' शब्दों की परिमिति लांघी रे बहती स्याही की धार ''

क्रान्तिकारी कविता 

हस्त कलम गहते ही भक-भक लगी उगलने छार
शब्दों की परिमिति लांघी रे बहती स्याही की धार ,
तोड़ के बंधन विविध भीति के की द्विजिहा ने वार 
चल गई खंजर कागज पे दिल ने जो उगली उद्गार |

परिमिति--सीमा      
 भीति--भय,डर                                        
                      शैल सिंह 

क्रमशः--

जब-जब सांप-सपोलों के,फन हमको फुफकारेंगे
ताल ठोंककर कहते जी,हम मौत के घाट उतारेंगे ,

कबतक मलते रहेंगे हाथ वो घात के पांव पसारेंगे
दूध पिलाया ठर्रा तो जूतमपैजारम से भूत उतारेंगे ,

क्या समझे हो मरदूदों जो जी में आएगा बक दोगे
अभिव्यक्ति की आजादी पे थोबड़ा तोड़ भोथारेंगे ,

संपोला शरण में रहने वाला गर ऐसे आँख तरेरेगा
ज़रा ना होगी देर आँख से आग उगल  भक्ष डारेंगे  ,

अगर शहीद की परिभाषा पड़ी तुम्हें समझानी तो
तत्काल स्वर्ग के रस्ते का सरजाम अनेक संवारेंगे ,

क्यों मुल्क से कर बग़ावत तूं दिखलाता तुर्रा तेवर
औक़ात तेरी बतलाने को तुझे धोधो और कचारेंगे ,

जिस थाली खा छेद उसी में पामर,पिशाच करेगा
राग जपे कृतघ्न गैरमुल्क़ का देखो खाल उधारेंगे , 

जयचंदों की मिलीभगत से आज अशान्त वतन है
गद्दार कर्त्तव्यशून्य मतिमंदों को भी खूब निथारेंगे ,

चौकसी में सेना ग्रास बने साजिश की सरहद पे 
जश्न करे तूं कुढ़कुढ़ खून भरी आँखों से निहारेंगे ,

तूने कर्णधारों,शूरवीरों के कुटुम्बों को बिलखाया 
नहीं,तड़-तड़ गोली बौछारों से भेजा तेरा बुहारेंगे ,

नरपिशाचों,भेड़ियों अम्मीयों ने क्या संस्कार दिए
हरा रंग का चढ़ा फितूर रौंद पांव तले ललकारेंगे ,

ऐ शुभचिंतकों आतंकी रहनुमाओं,सरगनाओं के 
देह नोच निर्दयता से अन्तड़ि भी खींच निकारेंगे ,

कलेजा चाक हुआ है देख क्षतविक्षत जवानों को
सर बाँधा कफ़न तेरे ख़ून से माँ का पांव पखारेंगे ,

दीप तेरा भी होगा गुल हनुमनथप्पाओं के बदले 
क्यूँ उकसाते तेरे पुरखों तक का ताबूत उखारेंगे ,

हद हो गई हद से बाहर हम रट अहिंसा त्यागेंगे
प्रण करते हैं बर्बरता से तेरा अंग-अंग चटकारेंगे ,

आहत बार-बार विश्वास हुई बहुत वंश हम खोये 
ऐसे कृत्य पे किस हर्ष से अंश को तेरे पुचकारेंगे ,

वतन लिए फाँसी एक अशफ़ाक़उल्ला झूल गए
तैमूर के ये दुर्दांत कालिख देश के मुँह पोचारेंगे ,

होते खाक तूम विश्वपटल पर देख धमक हमारी
धाक से तेरी जमीं पे जा केसरिया रंग लहकारेंगे ,

अबतक सभा मौन थी तूने देश का चीर खसोटा
चक्र सुदर्शन धार लिये कृष्णा चूलें तेरी खखारेंगे ,

ऐ नाशुक्र,नपुंसक,नाजायज औलादों गजनी की
करो अनेकों अफजल पैदा बाप को भी पछारेंगे ,

तूं कुरान के निर्देशों को कुकर्मों का ढाल बना़ले
हम गीता रामायण के पावन मन्त्रोचार उच्चारेंगे ,

तुम स्वत: जगाओ जज्बा काफिरों देशभक्ति के 
होश में आओगे तब जब रब ही तुझे धिक्कारेंगे ,

हर क्षण प्राण हदस में तुम भी बैरी से मिल जाते 
शहर सैलानि के अकाल यहाँ कैसे दिन गुजारेंगे ,

बनी अखाड़ा रण की कश्मीर की मनोहर घाटी 
कैसे केसर,इत्र की खुश्बू क्षेत्र फिजां में फुहारेंगे ,

बहुत सहे वार पीठ पे अपने दर्द भी खूब दिए हैं
ओ हूरों के आशिक़ भेजेंगे जब भी कब्र पुकारेंगे ,

                                      शैल सिंह

  









Monday, 17 July 2017

मेघ से उलाहना

'' मेघ से उलाहना ''



उमड़-घुमड़ घनघोर घटा
नखरे दिखा लौट जाती है
चाहत का उल्लंघन कर
मन भर जी को जलाती है ,

देखें कब बूंदों के सोंधेपन से
भरेंगे नथुने सरगोशी कराती है
कब रिमझिम सुरों से हर्षोन्माद
जगेंगे धरा बुदबुदाती है ,

न जाने कब अँधेरे में टिप-टुप
कुछ बूंदा-बांदी गिराती है
दूसरे ही पल तैश में आकर
ऊष्मा पुनः रौब दिखाती है ,

लगे हण्टर सी तपन सूर्य की
रेत सी धरती तड़फड़ाती है
लगी नभ पे सभी की टकटकी
छोड़ ऐंठन क्यों भाव खाती है ,

बेहाल जीव-जंतु वन्य प्राणी
आस के मंच ताजपोशी कराती है
जरूरत के मुताबिक कब
कभी नाशपीटी रंग में आती है ,

बाढ़ का कहर कहीं मार सूखे की
कभी बेढब व्यवहार दिखाती है
कभी अनहद बरस मनबढ़
सैलाबों में सब कुछ बहाती है ,

सरसा बरस सीना धरणि का 
मिटा पल में ऊष्मा क्यों सताती है
बनती हर जुबां की कोपभाजन 
कड़क-कड़ट भर अवसाद जाती है ,

सुनो गुहार मनहर मेघराज
घटा दिग्भ्रमित चक्र्व्यूह रचाती है 
छलकाओ न गागर वृष्टि की
सूखे कंठ मेंढकि टरटर्राती है,

                               शैल सिंह 










Sunday, 16 July 2017

ग़ज़ल " कभी तो ढहेंगी दरो दीवार गलतफहमियों की "

ये कैसा नशा प्यार का के बेवफाई के शहर में
टूटी उम्मीदें हैं बरकरार आज भी
भले बदल गए वो आते-जाते मौसम की तरह
इन आँखों में है इंतजार आज भी
कभी तो ढहेंगी दरो दीवार गलतफहमियों की
आस में दिल है बेक़रार आज भी 
दरमियां रिश्तों के खिले फूल से अल्फाज जो
कानों में ताज़ी है झंकार आज भी
बहा ना ले आँखों की दरिया का सैलाब कहीं
फ़िक्र यादों का है अम्बार आज भी
कैसे समझाऊँ ख़्वाबों,साजिशों के बाजार में
दिल हो रहा है शिकार आज भी
ये कैसा फलसफ़ा ज़िंदगी,मोहब्बत-दोस्ती में  
दर्द का मिले है गुब्बार आज भी | 

                                   शैल सिंह

Friday, 14 July 2017

ग़ज़ल '' कोई याद आ रहा है ''

रुमानियत भरा ये मौसम शायरी सुना रहा है
गा रहीं ग़ज़ल फ़िज़ाएं अम्बर गुनगुना रहा है ,

मुँह छिपाये घटा में बादल खिलखिला रहा है
मृदुल आह्लाद भरे इन्द्रधनुष मेघ लुभा रहा है ,

प्रफ़ुल्ल पात-पात लग गले ताली बजा रहा है
महकी हुई दिशाएं वातावरण मुस्कुरा रहा है ,

सावन का सुहाना मन्जर बांसुरी बजा रहा है
अलमस्त अलौकिक छटा माज़ी जगा रहा है ,

बीते मधु पल चपल चित्रित समां करा रहा है
पुरानी स्मृतियों का हसीं जख़ीरा गिरा रहा है ,

चाँद उतर आहिस्ता आँगन उर जला रहा है
इतना ख़ुशगवार लम्हा कोई याद आ रहा है |

                                   शैल सिंह


Tuesday, 11 July 2017

            कविता
'' हो रहे पृथक मैं-मैं से सभी ''


इक दिन पास उसी के जाना सबको
जो तीनों लोकों का स्वामी है
भले-बुरे कर्मों का लेखा-जोखा
रखता ऊपर वाला अन्तर्यामी है ,

मत तेरा-मेरा कहा करो जी
सब यहीं धरा रहा जायेगा
माटी का तन माटी में मिल
इक दिन ब्रह्मलीन हो जायेगा ,

ऐसे तत्वों का बस संग्रह करना 
जिससे सुख आनन्द मिले भरपूर
तेरी हँसी बन जाये दवा रुग्ण की
जो निःशुल्क मगर बहुमूल्य है गुर ,

बुद्धि की सम्पत्ति बाँट सभी में
धैर्य का रखना संग हथियार सदा
रक्षा कर विश्वास,संस्कार की रखना
रिश्तों में प्रीत की घोल सम्पदा ,

ऐसी मुस्कान बिखेरो मुखारबिन्दु
कि,पराये भी शामिल होके हँसे
आँसू तो आँखों के होकर भी
बहते ही पराया हो विहँसे ,

हो रहे पृथक मैं-मैं से सभी
चलो हम-हम का रिस्ता जोड़ें
इंसानियत,मानवता सबपे भारी
दम्भ हैसियत का सस्ता छोड़ें ,

श्रद्धा,ज्ञान,दया,सम्मान,नम्रता
जीवन तन के शृंगार आभूषण हैं
प्रार्थना,विश्वास अदृश्य भले पर
कर देते असम्भव को भी धूसर हैं ,

वसीयत,भोग-विलास,विरासत
मे, ना भूलें कर्मों की प्रधानता
परमपिता रखता हिसाब-किताब
जिनके कर्मों में होती महानता |

गुर---गुण

                   शैल सिंह

Saturday, 1 July 2017

कविता " एक शहीद की पत्नी की दारून व्यथा "

डाल ओहार ताबूत तिरंगे की
अर्थी आई पिया की मैं सन्न रह गई
जन सैलाव का उमड़ा हुजूम दर
देख शव संग पिया की मैं सन्न रह गई ,

ख़त का मजमून पूरा पढ़ा भी न था
शहादत की खबर यूँ बता दी गई
थे जिनके लिए बेसबर दो नयन
झट चंन्दन की चिता सजा दी गईं ,

राह तकती महावर लगी एड़ियां
सुर्ख हीना हथेली रची रह गई
गजरे की लड़ियों गूंथीं वेणियां
सेज फूलों सजी की सजी रह गई ,

तोड़ बिखरा गईं कांच की चूड़ियां
झट माथे की बिंदिया मिटा दी गई
मेरे सिंगार के सारे असवाब भी
धू-धू करती चिता में जला दी गईं ,

श्वेत वस्त्रों का अभरण पेन्हाया गया
स्वर्णाभूषण वदन से हटा दी गईं
चाँद से मुखड़े पर थी भरी माँग जो
टार घूँघट फट लाली उठा दी गईं ,

टूटा कैसा कहर मुझपे हा जिन्दगी
जिन्दगी भर को बिधवा बना दी गई
ओढ़ जाऊँ कहाँ लिबास वैधव्य का
शोक संग जब सगाई मना दी गई ।

मिली कैसी सजा मेरे जांबाज को
जवां जिन्दगी वतन पर लूटा दी गई
देशभक्त सीमा प्रहरी की ये दुर्दशा
मेरी हसीं देखो दुनिया मिटा दी गई ,

एक कतरा गिरा देश की आँख से
बूँदें श्रद्धांजलि की चढ़ा दी गईं
लूटा संसार मेरा सदा के लिए
कृति सैनिक पिया की भूला दी गई ।

ओहार--परदा , वेणियां--चोटी ,
असवाब--सामग्री ,

शैल सिंह

Sunday, 4 June 2017

गर्मी पर कविता '' हे सूरजदेव तरस खाओ ''

'' हे सूरजदेव तरस खाओ ''


अकड़ इतनी नहीं अच्छी
जरा तेवर को वश में रखो
भीषण ताप से झुलसाना
कलेवर पास अपने रखो ,

भाती भोर की शीतलता
उजाला दिन का सूरज जी
हो अग्निपिण्ड का तुम गोला 
मचाते हड़कम्प लपट से जी,

कड़कती धूप का कहर
वदन है आग सी झुलसे
हे सूरजदेव तरस खाओ
घटा रिमझिम अवनि बरसे ,

मनमौजी प्रकोप से
कब निज़ात दिलाओगे
कब बारिस की फुहारों से
दहक तन की मिटाओगे

पौधों को मार गया लकवा
खड़े निर्जीव क्यारी में
पांखी उन्मुक्त पड़े दुबके
नीड़ों की चारदीवारी में ,

लगता जान ले लेगी
असहनीय ऊफ्फ़ ये गर्मी
बता लाओगे कब मानसून
चिलचिलाती धूप में नरमी

जीना हो गया दूभर
लिसलिसाये तन पसीने से
मिले चन्दन सी शीतलता  
चढ़े तन वस्त्र झीने से ,

तेरे लू के थपेड़ों की
तीखी मार से बेहाल
तमतमाना छोड़ बिछाओ ना
घुमड़ते घन का महाजाल

तेरी ऊष्मा से सैर-सपाटे
चौपट अवकाश गर्मी की
सुबह अलसाई बड़ी होती
कड़ी दोपहरी गर्मी की ,

हे इन्द्रदेव निमन्त्रण देते
तुझे बाग़ तड़ाग पशु पक्षी
सूखे ताल,तलैया,पोखर
प्यासी मीन दरकती धरती |

                      शैल सिंह

Thursday, 1 June 2017

वसंत ऋतु पर कविता

  वसंत ऋतु पर कविता 


बड़ा सुहावन मन भावन
लगे वसंत तेरा आना
थोड़ी सर्दी थोड़ी गर्मी
मौसम बड़ा सुहाना ,

इंद्रधनुष ने खींची रंगोली
सज गई मधुऋतु की डोली
बिखरा दी अम्बर ने रोली
धरती मांग सजा खुश हो ली
छितरी न्यारी सुषमा चहुँदिश
कलियाँ घूँघट के पट खोलीं
आई ठूँठों पे तरुणाई
भर गई उपहारों से झोली,

बड़ा सुहावन मन भावन
लगे वसंत तेरा आना।,

देख हरित धरणी का विजन
हुआ मन मयूर मस्ताना
पीली चूनर सरसों लहराई
उसपे तितली का मंडराना
पी मकरंद मस्त भये मधुकर
मद में मगन दीवाना
गूंजे विहंगों की किलकारी
कुञ्ज-कुटीर मलय भर जाना ,

बड़ा सुहावन मन भावन
लगे वसंत तेरा आना ,

अमराई महके बौराई
मधुकंठी तान सुनाये
देख वासन्ती मादकता नाचे
वन,वीथिक मयूरा बौराये
पछुआ-पुरवा की शीतल सुरभि
नशीला गन्ध जिया भरमाये
पापी पपीहरा पिउ-पिउ बोले
सुध विरहन को पी की सताये ,

बड़ा सुहावन मन भावन
लगे वसंत तेरा आना ,

चित चकोर तिरछी चितवन से
अपने सजन से करे निहोरा
मूक अधर और दृग से चुगली
करे दम-दम सिंगार-पटोरा
प्रकृति नटी भरे उमंग अंग औ
वाचाल कंगना हुआ छिछोरा
बूझे ना अनुभाव बलम अनाड़ी
कंचन देह अंगार दहकावे मोरा ,

बड़ा सुहावन मन भावन
लगे वसंत तेरा आना ,
`
वासन्ती दुपहरिया में गर
संग प्रियतम मेरे होते
प्रीत रंग में नहा सराबोर
हम सारा अंग भिगोते ,
धारे पीत-हरा रंग धरा वसन
चिरयौवन दिखलाये
बहे उन्मादी फागुनी हवाऐं
चाँदनी उर पे बरछी चलाये ,

बड़ा सुहावन मन भावन
लगे वसंत तेरा आना ,

लगे नववधू सी वसुधा
सूरज प्रणय निवेदन करता
इठलाये अवनि हुलास से
होंठों पे शतदल खिलता ,
टेसू,गुलाब,हरसिंगार,पलाश
मौली,कचनार पे पवन है रीझता
मनमोहक बिछा है इन्द्रजाल
दिग-दिगन्त सौन्दर्य दमकता ,

बड़ा सुहावन मन भावन
लगे वसंत तेरा आना ।

                            शैल सिंह

Monday, 29 May 2017

एक छोटी सी गजल

ऐ हवा ला कभी उनके घर की ख़बर
जबसे मिल के गए न मुड़के देखा इधर
जा पता पूछ कर आ बता कुछ इधर
क्यों बदल सी गई हमसफ़र की नजर |

ऐ बहारों कभी मेरे दर से भी गुजर
देख जा आके कैसी खिजां मैं है शज़र
जिसकी हर शाख़ पे वो मचाये ग़दर
हो गए बेखबर क्यूँ आजकल इस कदर ।
                                      शैल सिंह

'' माँ पर कविता ''

'' माँ पर कविता ''


सबसे प्यारी सबसे न्यारी
पूज्यनीया है माँ
माँ से बढ़कर दुनिया में
नहीं कोई बड़ा इन्सान
माँ के आगे सब कुछ बौना
बौना लगे भगवान
माँ दुनिया की पहली अवतरण
जिसे कहते हैं माँ
कि तेरे जैसा कोई नहीं माँ
न तेरे जैसा सुन्दर नाम ,

माँ शब्द शहद से मीठा
आत्मीयता सोम सी माँ की
माँ सृष्टि सृजन की रचईता
सारे अनुष्ठान चरण में माँ की
सबसे बड़ा तीरथ माँ का दर्शन
चारों धाम परिधि में माँ की
माँ त्याग,तपस्या करुणा की देवी
पूजा,मन्त्र है जाप जहाँ की
कि तेरे जैसा कोई नहीं माँ
न तेरे जैसा सुन्दर नाम ,

तेरे गर्भ के गहन प्रेम की
उपलब्धि मैं माँ
तेरे बिना कहाँ सम्भव था
दुनिया में मेरा आना
कितनी पीड़ा दर्द सहा के  
मैं दीदार करूँ दुनिया का 
सारी दुनिया तुझमें समाई
कभी कर्ज़ चुके ना माँ का
कि तेरे जैसा कोई नहीं माँ
न तेरे जैसा सुन्दर नाम ,

तूं ममता की पावन मूरत
तेरा आँचल सुख का सागर
रात-रात भर जाग सुलाई
मुझको लोरी गाकर
तेरे आँचल की छाँव में छलका
निस दिन स्नेह का गागर
भींच सीने में सिर सहलाई
खिली अंक में मुझे लिटाकर
कि तेरे जैसा कोई नहीं माँ
न तेरे जैसा सुन्दर नाम ,

अतुलनीय तेरी ममता,मुझपे
जीवन सहर्ष न्यौछार दिया
कर्तव्य निर्वहन की बेदी पर
वैविध्य प्यार,दुलार किया
तुझ सा नहीं बलिदानी कोई
न तुझ सा माँ कोई उदार,
रक्तकणों से निर्मित कर दी
इतना बड़ा संसार 
कि तेरे जैसा कोई नहीं माँ
न तेरे जैसा सुन्दर नाम ,

सबसे अमूल्य तोहफ़ा ईश्वर की
कैसे शब्दों में बाँधूँ माँ को
सहा ना जाने कितनी मुसीबत
कभी आंच न आने दी मुझको
सबसे सुन्दर​ माँ की रचना 
माँ से सुवासित ये संसार
सर्वस्व लूटाकर बरसाई बस
आशीषों की तरल फुहार
कि तेरे जैसा कोई नहीं माँ
न तेरे जैसा सुन्दर नाम ,

कहाँ मिले तरुवर तले रे माँ
तेरे आँचल सी मीठी छाया
बहुत से रिश्ते दुनिया में पर
निःस्वार्थ न तुझ सी माया
गीली शैय्या सोकर तूने
दिया आँचल का नरम बिछौना
तेरे अंश को नज़र लगे ना
दिया काजल का चाँद ढिठौना
कि तेरे जैसा कोई नहीं माँ
न तेरे जैसा सुन्दर नाम ,

दुनिया में लाई श्रेय तुझे माँ
तेरी उँगली पकड़ सीखा चलना
तूं ही मेरी पहली प्रशिक्षक
तुझी से सीखा बोलना हँसना
हर मुश्किल में तूं संग मेरे
हर जिद पूरी तुझसे
गलत सही का फ़र्क भी जाना
तेरी बतलाई सीख से
कि तेरे जैसा कोई नहीं माँ
न तेरे जैसा सुन्दर नाम ,

भले तूं ओझल दृग से
तेरे एहसास की ख़ुश्बू तन में  
हर पल महसूसती आज भी
तेरी मौजूदगी माँ कण-कण में
तेरे स्पर्श को तरसें बांहें
अँकवार में भरकर रोने को
ढूंढ़ रहे तुझे नैन विक्षिप्त हो
घर के कोने-कोने को
कि तेरे जैसा कोई नहीं माँ
न तेरे जैसा सुन्दर नाम |

ढिठौना --नजर न लगे इसलिए काजल का टीका

                      शैल सिंह

Tuesday, 23 May 2017

राम मन्दिर पर कविता

मुख़्यमंत्री आदित्यनाथ योगी जी से एक राम भक्त की गुज़ारिश ,

      '' राम मन्दिर पर कविता ''


भज-भज के सब राम के नाम
साध रहे बस अपने काम
राम सिया के काट रहे दिन छतरी में
बैठे तिरपाल की बखरी में ,

भिंगो रहीं बारिश की बूँदें
तपा रहा तन घाम
हवा के निर्मम आघात सहें
ठिठुर रहे सर्दी में राम
सहा न जाये राज में तेरे
राम का ये अपमान
जल्दी से करवाओ योगी जी
मन्दिर का विशाल निर्माण ,

भौंकने वाले भौंकेंगे
उन्हें भौंकने दीजिये योगी जी
इस बात पे जल्दी अमल कीजिये
साथ में लेकर मोदी जी
कहीं लक्ष्य अधूरा रह ना जाये
जल्दी खोजिये हल समाधान
असली गर्भ गृह पर मंशा
हो मन्दिर का विशाल निर्माण ,

अत्याचारी बाबर की बर्बरता
विध्वंस हुई रघुवंशी भव्यता
हिन्दुओं की आस्था का सवाल
इसपे क्यों विवाद औ मचा बवाल ,
कौशिल्या कोख़ से इसी जगह
लिए राम अद्द्भुत अवतार
अयोध्या हिन्दू धर्म का धाम ,
हो मन्दिर का विशाल निर्माण ,

कुछ से मोर्चा लेना होगा
कुछ से वार्ता का प्रावधान
दरकिनार कर काफ़िरों को
करना तर्ज़ पे सोमनाथ के काम
यही सुनहरा अवसर योगी जी
क्यों देना कोई तथ्य प्रमाण
मर्यादा पुरुषोत्तम राम महान
हो मन्दिर का विशाल निर्माण ,

जिद छोड़ बाबरी मस्जिद की
छोड़ आक्रांता बाबर का गुणगान
सहभागिता निभाएं कर उदार उर
हिन्दुस्तान के सारे मुसलमान
इक अत्याचारी की कारगुजारी पे
हो बंद अब तो क़त्लेआम
राम भक्तों का सुनो फरमान
हो मन्दिर का विशाल निर्माण |

                           शैल सिंह



Saturday, 6 May 2017

योगी जी पर कविता

यह कविता मैंने भाजपा की जीत पर तीन माह पहले लिखी थी पर पोस्ट आज कर रही हूँ ,मोदी जी से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिए जन-जन की मांग थे योगी जी ,जौहरी साबित हुए मोदी जी | योगी जी के अकाट्य कार्य का स्वरूप देखते हुए आज मन में आया कि योगी जी के लिए जो भाव उमड़े थे उसे आज दर्शा ही दूँ | 


      योगी जी पर कविता 


महर्षि रूपी मोती लाये मोदी जी खंगाल के
यू.पी.वालों कद्र करना योगी जी कमाल के
मशक़्क़त से ख़ोज लाये यह हीरा तराश के
रखना कीमती नगीना ये पलकों बिठाल के ,

गरजता जो सिंह सा औ दहाड़ता है शेर सा
खुद के लिए न जिसका कुछ क्षुद्र स्वार्थ सा
जो ऐसा कर्मयोगी करता हिन्दुत्व की पैरवी
उसपे जनता हुई न्यौछावर मुग्ध राग भैरवी ,

ऐसा कोहिनूर जाँच-परख़ ला सौंपा जौहरी
तख़्त पे यू.पी.के बैठा दिया दमदार चौधरी
ये निष्पक्ष द्वेषरहित करता निःस्वार्थ सेवाएं
स्वधर्म का हिमायती फ़िदा जिसपे फिजाएं ,

विरोधी तत्व लगाते ठप्पा सम्प्रदायवाद की
राष्ट्र चिंतन इनके भाव अलख राष्ट्रवाद की
भगवा है आत्मरूप हुंकार हिन्दुत्ववाद की
काट फेंक दिया जनता ने जड़ वंशवाद की ,

सर्वोपरि हो राष्ट्र निर्माण उन्नत समाज का
निजहित परे कामना समुन्नत कल्याण​ का
जो सुख,विलास त्याग धरा पथ निर्वाण का
वो सन्यासी बना चहेता विस्तृत अवाम का | 

                                     शैल सिंह 

Wednesday, 3 May 2017

'' कविता '' , '' वीर शहीदों के खूँ का बदला ''

        पाक की बार-बार नापाक हरकतों से आजिज़ एक सैनिक की मोदी सरकार से याचना ,हाल ही में सीमा पर हुए वीभत्स कांड से सारा देश आहत है और मोदी जी से सैनिकों के बंधे हाथ को खुली छूट देने की गुज़ारिश तथा कवायद में लगा है ,इसी परिप्रेक्ष्य में मेरी ये सामायिक रचना जो शायद अवलोकन करने वाले का भी दिल खौला दे और शहीदों के प्रति तथा देश के प्रति उन्माद जगा दे | 

        '' कविता ''


अब सही न जाये हानि जी
थोड़ा करने दो मनमानी जी  
जल्द खुली छूट दो मोदी जी
सर ऊपर हो गया पानी जी
सेनाओं का बढ़ा मनोबल
करने दो उत्पात तूफानी जी ,

कड़ी धूप के भीषण ताप में भी
डटा रहूँगा असह बरसात में भी
चाहे सर्दी की हो जैसी ठिठुरन
तूफांन,बवंडर की रात में भी
डिगा रहूँगा सीमा पर सीना ताने
दुश्मन बैठा हो चाहे घात में भी ,

डर नहीं बम,गोली बौछारों से
वतन की ख़ातिर मक्कारों से
चाहे भूख बिलबिला दे आहारों से
दर्द सह लैस रहूँगा औज़ारों से
जब तक तन आख़िरी सांस रहेगी
दहलाऊँगा खंग की टंकारों से ,

कभी पग पीछे नहीं हटाऊँगा
चाहे कितनी भी हों दुर्गम राहें
चप्पा-चप्पा आखों की गिरफ़्त में
रखूँगा दुश्मनों पर पैनी निगाहें
वीर शहीदों के खूँ का बदला
लूंगा आस्तीन चढ़ाकर दोनों बाँहें ,

हद कर दी पाक ने बर्बरता की
हमने मानवता की सजा ये पाई है
हमारे निर्दोष प्रहरियों की मोदी जी
देखो सिर कटी लाश घर आई है
हमें भी सर काट शत्रु के गेंद खेलना
जिद से भारत माँ की कसम खाई है ,

खौल रहा ख़ून बेसब्र धमनियों में
गर इक बार ईशारा मिल जाये
तबाही का ऐसा दिखलाऊँगा तांडव
कि पाकिस्तान की धरती थर्रा जाये
फिर पिशाच का पिल्ला तरेरकर
मजाल आँख उठाने की जुर्रत कर जाये  |

                                   शैल सिंह





Thursday, 27 April 2017

'' हम प्रेम का वृक्ष लगाएं ''

                     कविता 


विनम्रता और सहजता लाएं हम सब अपने जीवन में
क्यों तोड़ते जा रहे नित हम मानवता की परिपाटी को
अभिव्यक्ति की आज़ादी का प्रहार संवेदना के ढाँचे पर
उष्ण होती हृदय की तरलता,सामंजस्य का होता ह्रास
उदारता,सहिष्णुता,त्याग,दया का ,उर मरुस्थल होता आज
प्रेम स्वरूपा प्रकृति से कुछ नहीं सीखा हम सबने
निःस्वार्थ भाव से वृक्ष सदा हमें फल-फूल दिया करते हैं
फलों से लदी डालियाँ सदा झुकी शालीन क्यों रहती हैं
बिना शुल्क नदियां हमें सदा जल देती रहती हैं
फिर भी नहीं कभी कोई उलाहनें देती हैं
इनकी मौन प्रवृति से प्रेरित हो हम प्रेम का वृक्ष लगाएं
नदी की देख दानशीलता हम प्रेम की नदी बहायें
सबसे कठिन है प्रेम सभी से कर पाना और निभाना
पर प्रेम जरुरी जीवन में,हम समरसता की पौध उगाएं
अभिमान,घमंड,अहंकार से जीवन नरक बन जाता है
करुणा,संवेदना,परमार्थ,सौहार्द्र से हम जीवन स्वर्ग बनायें |

                                                   शैल सिंह


Saturday, 15 April 2017

अन्तर्चेतना की दृष्टि तो खोलो

सुख-दुःख किससे बाँटे प्राणी
हर हाल में दोनों ही देते संत्रास
सुख में ईर्ष्या दुःख में उपहास,

ऐसी हुई अवधारणा आज की
सम्बन्धों में आ रही ख़टास
अन्तर्चेतना की दृष्टि तो खोलो
जग वालों ना यूँ रहो उदास ,

निश्छल मन से सम्बन्धों को
जोड़-जोड़ करो हास-परिहास
समानता के पथ पर चल कर
मानवीय उदारता का दो आभाष  ,

सर्वमंगल की करो कामना
रखो परोपकार का मन में वास
स्वहित से तुम ऊपर उठकर
स्वार्थ,संकीर्णता को दो वनवास,

इसी में सबका सुख निहित है
व्यापक भावनाओं से भरें उजास
जीवन दो दिन का ना विषम बनाएं
जाना सभी को परमात्मा के पास ।

                                 शैल सिंह


Friday, 14 April 2017

एक कतरा तो देखें; गज़़ल

दर्द का लावा फूटता जब जख्में-ज़िगर से
आंखों से दरिया बन बहता है बरसात सी ,

इस बरसात में तुम भी कभी भींगो अगर
तो जानोगे होती मजा क्या है बरसात की ,

घड़ियाली आंसू जो कहते हैं इस नीर को
एक कतरा तो देखें क्या इसमें बरसात सी ,

घटा के खामोश रौब का तो अन्दाज होगा
प्रलय मचा देता जब फटता है बरसात सी ,

जिस दिन अना मेरी मुझको ललकार देगी
फिर ना कहना कैसी बला की बरसात थी।
                                          शैल सिंह

Tuesday, 11 April 2017

'' हर शब स्याही चांद की भी रोशनाई में ''. एक मधुर गीत


कैसे कटे दिन-रैन तेरी जुदाई में
नैना भरे बरसात झरें तन्हाई में,

जबसे गये तुम छोड़ नगर
लगे वीरां-वीरां मुझे शहर
हवा गुलिस्तां से भी रूठ गयी
अजनवी लगे हर गली डगर
फब़े न जिस्म लिबास भरी तरूनाई में
अब वो आबोहवा रूवाब नहीं अरूनाई में,

कैसे कटे दिन-रैन तेरी जुदाई में
नैना भरे बरसात झरें तन्हाई में,

तुझे जबसे नज़र में कैद किया
कभी ख्वाब ना देखा और कोई
तेरी याद में गुजरी शामों-सहर
दूजा शौक ना पाला और कोई
खनखन बोले ना चूडी़ सूनी कलाई में
रूनझुन पैंजनी भी ना झनकी अंगनाई में,

कैसे कटे दिन-रैन तेरी जुदाई में
नैना भरे बरसात झरें तन्हाई में,

इस कदर हुआ बदनाम इश्क
हमें दर्द का तोहफा मुफ्त मिला
ख्वाहिशों पे पहरे लगे दहर के
मौसम भी रंग बदला यही गिला
हर शब स्याही चांद की भी रोशनाई में
जहर लगे है कूक कोईल की अमराई में,

कैसे कटे दिन-रैन तेरी जुदाई में
नैना भरे बरसात झरें तन्हाई में,

इक दिन खिले थे हम गुंचोंं की तरह
किरनों की तरह बिखरा जलवा
तेरे शुष्क मिजाज से हैरां दिल 
गुजरी क्या इस दौरां तूं बेपरवा
आनंद नहीं महफिलों की रंगों रूबाई में
थिरकन में भी लोच न जो धुन हो शहनाई में ,

कैसे कटे दिन-रैन तेरी जुदाई में
नैना भरे बरसात झरें तन्हाई में ।
                                               शैल सिंह

Thursday, 6 April 2017

भजन

   '' भजन ''   


भगवन तुम तो बसे हो मन-मन्दिर
ईंट-पत्थरों के शिवाले क्यूँ जाऊँ
जब मन के नगर में तेरा महल
क्यूँ चौखट-चौखट सर टकराऊँ ,

तेरा रूप धार ली काया मेरी
प्रतिदिन अंग भभूत लगाऊँ
रच-बस गए हो प्रभु तुम मुझमें
नख-शिख रोम-रोम सुख पाऊँ ,

याचनाओं का अर्ध्य भेंट दी
दु:ख का मृगछाल बिछाऊं
निशि-वासर हूँ लीन भजन में
दीन-दशा का भोग चढ़ाऊँ ,

तेरे पांव पखारें नीर नयन के
दुःख की गागर छलकाऊँ
कहीं छवि ओझल ना जाये
डर से पलकें ना झपकाऊँ ,

तुम ध्यान मग्न मेरे उर गह्वर में
क्यूँ गुफ़ा कंदरा मन भटकाऊँ
जब मुझमें समाहित तुम प्रभुवर
क्यूँ दर-दर की जा ठोकर खाऊँ ,

एक बार नज़र तूं फेरे इधर
क्यूँ मन्दिरों की घण्टी खटकाऊँ
जब नज़रबन्द कर लिया तुझे
दिन रात दरश तेरा पाऊँ ,

                      शैल सिंह



Tuesday, 28 March 2017

अहोभाग्य उत्तर प्रदेश का

मेरी कविता

अब मेरे प्रदेश का होगा उन्नयन
फूल खिला जन-मन के उपवन ,

इक संत की हुई ताज़पोशी
कितनी हनक,धमक के साथ
अहोभाग्य उत्तर प्रदेश का
जनमत ने रच डाला इतिहास ,

हाथी का मद चूर हुआ
चारों खाने चित पड़ी निढाल
खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे
ईवीएम को बना के रोष की ढाल ,

घोंचू पंजा ने साईकिल का
कितना बुरा कर दिया हाल
इतनी गहरी खाई में ढकेला
उलटा दिया बिसात का जाल ,

खतरे में अस्तित्व झाड़ू का
खुजलीवाल से खा के खार
इक-इक सींका बिखर रहा
रामा क्या होगा अगली बार ,

लालटेन मत चहको इतना
इस बार की आंधी नहीं बख़्शेगी
बाती पे रखना कस के लग़ाम [ ज़ुबान पे ]
जनाधार की कैंची ही कतरेगी

राष्ट्रवादी ताक़तों से टकरा
चहुंदिशा की गईं हवाएं हार
गले लिपट गईं आकर सहर्ष
योगी जी के बन फूलों का हार ,

जो साहूकार बन लूट रहे थे
खूब अपने ही घर का माल
उनकी अकल ठिकाने लगा दिए
उनके अपने ही सियासी चाल ,

कितने दिन और अँधेरों में रखते
साम्प्रदायिकता का छ्द्म पाठ पढ़ा के
ऐसा जड़ा तमाचा बड़बोले गालों पर
जनता ने गढ़-गढ़ पत्ता साफ़ करा के ,

वर्षों से डराकर जिन भौकालों से
स्वार्थियों ने जाति-धर्म का किया व्यापर
आज़ योगी,मोदी जी के क़द्रदानों ने
उन्हें धूल चटा दी ऐसी बही बयार ।

                                      शैल सिंह




Thursday, 16 March 2017

होली अबकी बार


मोदी लहर लील गई सबके सियासी चाल
बेदाग छवि पे मेहरबान जनता हुई निहाल

उन्मत्त उमंगों की होगी,होली अबकी बार
क्योंकि बनेगी यूपी में बीजेपी की सरकार

नाना नवरंगों के उड़ेंगे,गुलाल अबकी बार
सभी ने किया है दिल से मोदी को स्वीकार

हुंकार भरेगा शेर,दुबकेंगे रंगे सभी सियार
क्योंकि धरती,नदिया,हुए अम्बर एकाकार

नमो-नमो जयकार में चित हैं सब भौकाल
किसी की बम्पर हार तो कोई हुआ बीमार

रंग अबीर पिचकारी ख़ुशी से गाल हैं लाल
कितने वर्षों बाद देश में आया ऐसा भूचाल

सात समंदर पार चर्चा नाम मोदी बेमिसाल
विरोधी सुरों की अटकलें कैसे हुआ कमाल ।

                                           शैल सिंह 

Wednesday, 8 March 2017

नारी दिवस पर

नारी दिवस पर 

मैं शक्तिस्वरूपा नारी जननी सम्पूर्ण जगत की
त्याग,दया,ममता की मूरत गौरव निज संस्कृति की
मैं लक्ष्मी,दुर्गा,सरस्वती हूँ अवतार अनवरत शक्ति की
युग निर्मात्री लिए सीमाएं,लक्ष्मण रेखाएं क्यूँ बनीं प्रकृति की
सीता,द्रौपदी,गंगा,कुन्ती को कीं कलुषित मानसिकता कुत्सित की
वही सबल बन अबला निष्ठुर जग की निर्मम अवरोधों को खंडित की
सह समाज के विषम थपेड़े नियति से लड़ खुद लिए उसने नव राह सृजित की
उड़ रही गगन में,हर क्षेत्र में बढ़-चढ़ हिस्सा स्वयं स्वरूपा ख़ुद को महिमामंडित की ।

                                                                                 शैल सिंह   

Saturday, 4 March 2017

वसंत ऋतु पर कविता

   वसंत ऋतु पर कविता 


बड़ा सुहावन मन भावन
लगे वसंत तेरा आना
थोड़ी सर्दी थोड़ी गर्मी
मौसम बड़ा सुहाना ,

इंद्रधनुष ने खींची रंगोली
सज गई मधुऋतु की डोली
बिखरा दी अम्बर ने रोली
धरती मांग सजा खुश हो ली
छितरी न्यारी सुषमा चहुँदिश
कलियाँ घूँघट के पट खोलीं
आई ठूँठों पे तरुणाई
भर गई उपहारों से झोली,

बड़ा सुहावन मन भावन
लगे वसंत तेरा आना।,

देख हरित धरणी का विजन
हुआ मन मयूर मस्ताना
पीली चूनर सरसों लहराई
उसपे तितली का मंडराना
पी मकरंद मस्त भये मधुकर
मद में मगन दीवाना
गूंजे विहंगों की किलकारी
कुञ्ज-कुटीर मलय भर जाना ,

बड़ा सुहावन मन भावन
लगे वसंत तेरा आना ,

अमराई महके बौराई
मधुकंठी तान सुनाये
देख वासन्ती मादकता नाचे
वन,वीथिक मयूरा बौराये
पछुआ-पुरवा की शीतल सुरभि
नशीला गन्ध जिया भरमाये
पापी पपीहरा पिउ-पिउ बोले
सुध विरहन को पी की सताये ,

बड़ा सुहावन मन भावन
लगे वसंत तेरा आना ,

चित चकोर तिरछी चितवन से
अपने सजन से करे निहोरा
मूक अधर और दृग से चुगली
करे दम-दम सिंगार-पटोरा
प्रकृति नटी भरे उमंग अंग औ
वाचाल कंगना हुआ छिछोरा
बूझे ना अनुभाव बलम अनाड़ी
कंचन देह अंगार दहकावे मोरा ,

बड़ा सुहावन मन भावन
लगे वसंत तेरा आना ,
`
वासन्ती दुपहरिया में गर
संग प्रियतम मेरे होते
प्रीत रंग में नहा सराबोर
हम सारा अंग भिगोते ,
धारे पीत-हरा रंग धरा वसन
चिरयौवन दिखलाये
बहे उन्मादी फागुनी हवाऐं
चाँदनी उर पे बरछी चलाये ,

बड़ा सुहावन मन भावन
लगे वसंत तेरा आना ,

लगे नववधू सी वसुधा
सूरज प्रणय निवेदन करता
अवनि हुलास से इठलाये
होंठों पे शतदल खिलता ,
टेसू,गुलाब,हरसिंगार,पलाश
मौली,कचनार पे पवन है रीझता
मनमोहक बिछा है इन्द्रजाल
दिग-दिगन्त सौन्दर्य दमकता ,

बड़ा सुहावन मन भावन
लगे वसंत तेरा आना ।

                            शैल सिंह

Tuesday, 28 February 2017

चुनावों की बेला में ,मेरी ये कविता

 

'' एक विनम्र निवेदन देश की जनता से ''

हमें विश्व गुरु है बनना हर मन सपना ये बुनवाना होगा
अराजकता,अत्याचार,अनाचार का कोढ़ दूर भागना होगा
राष्ट्रीय पुष्प का कर अभिनन्दन बहुमत का अर्ध्य चढ़ाना होगा
ईमानदारी,नैतिकता,जनसेवा हित कमल का फूल खिलाना होगा ,

हिंदुस्तान के हिन्दुओं को अकल तभी अब आएगी
जब उसकी ही सरजमीं पर दूजी क़ौम फसल उगायेगी
सपा,बसपा,काँग्रेस को तो नफ़रत अयोध्या नगरी के राम से
गर नहीं चेता अब भी हिन्दू मिट जायेंगे हम अपने ही चारों धाम से ,

गढ़-गढ़ में कमल खिला दे जनता गर यूपी के कीचड़ में
चोर,उचक्के सारे माफ़िया बंद हो जायेंगे जेलों के सीकड़ में
ना गुंडागर्दी हत्या,बलात्कार ना होगा कैराना,दादरी जैसा काण्ड
ना एक मंच पर साथ सांठ-गांठ कर फिर खड़े होंगे सारे भड़ुवे भांड़ ,

हाथी,पंजा,साईकिल ने बना दिया जैसे यूपी को चम्बल
मज़हब की दीवार खड़ी कर करवाते रहे आपस में दंगल
इक थैली के चट्टे-बट्टे बन गए सियासत कर इक दूजे के संबल
मेधावों को कर दरक़िनार सदा वर्ग विशेष का ये करते रहे सुमंगल ,

कितना जाति,धर्म के दाँवपेंच का देना होगा प्रमाण
सर्वधर्म,समभाव,सर्वांगीण विकास का तभी होगा निर्माण
जब सभी तबके मोदीमय होंगे हर धर्मों,वर्णों का होगा कल्याण
भगवा धारियों से द्वेष रखने वाले भी करेंगे दिल से मोदी का गुणगान ,

लोकतंत्र के इस महापर्व को विवेक के रंग से रंगना होगा
राष्ट्रहित के लिए जन-मन को यूपी का भविष्य नया रचना होगा
हर मज़हब के हिंदुस्तानी बाशिन्दों तुम्हें भारत माता कहना होगा
कश्मीर से कन्याकुमारी के दुर्ग को केसरिया भगवा रंग से भरना होगा ,

सोने की चिड़िया गुमसुम बैठी राजनीति की शाख़ पर
धधक रही हिन्द धरित्री ज़हरीली जाति,मज़हब की आँच पर
तिलमिला विष उगलते सदा विरोधी आग क्यों लग जाती साँच पर
सिरफिरे बेंच खायेंगे देश की आबरू जश्न मनाएंगे वतन की खाक पर ,

देशद्रोहियों,गद्दारों के मनसूबों के महल गिराने होंगे
जाति,धर्म का जहर उतार गुमराहों को सिरे से समझाने होंगे
लाना अमन-चैन गर रामराज्य हम सबको सारे मतभेद मिटाने होंगे
मनभेद कराने वाले चालबाजों को इस चुनावी संग्राम में धूल चटाने होंगे।

जय हिन्द ,जय भारत

                                                                      शैल सिंह ,आज़मगढ़ 

Saturday, 21 January 2017

तुम कहाँ हो बोलते

सर्प दंश से भी बढ़ कर
घातक तुम्हारा मौन है ,

तुम कहाँ हो बोलते
बोलती तुम्हारी चुप्पियाँ हैं
मौन की भाषा अबोली
कह देतीं मन की सूक्तियां हैं ,

इतनी विधा के भाव समेटे
अधर विराम चिन्ह क्यों हैं
शब्दों को रखते मापकर
स्वभाव इतना भिन्न क्यों है,

क्या-क्या उधेड़ बुनकर
दिन रात तुम हो जी रहे
कौन सा ऐसा गरल जो
मौन घोंट कर हो पी रहे,

मौन तो हो तुम मगर
बोलती देह की भित्तियां हैं
किस खता पे सौगंध तुमको
बन रही कड़वी पित्तियाँ हैं,

किताब भर ब्यौरा समेटे
क्यूँ रखते अधर के बंद पट
अंदाज की चंठ झाँकियाँ
झाँकतीं नैन के पनघट,

जब कभी गर खोलते हो
भानुमति का बंद पिटारा
बस गोल मोल बोल करते
चन्द सा अस्फुट निपटारा,

जीने लिए इस किरदार को
मजबूर क्यों हो बोल दो
चुपचाप की इन खिड़कियों को
भड़भड़ाकर खोल दो,

मूल्यवान मेरे हजारों शब्द से
मौन की कुपित दृष्टियां  हैं
आत्मज्ञान की तुम खोज में
मगर रहतीं तनी भृकुटियां हैं ,

वास्ता मुझसे अगर है
मैं वजह हूँ मौन की
तो ओ विरागी पूछती हूँ
ढीठ बन मैं कौन हूँ,

तुम बंद सीपी की तरह
मैं प्रश्नों का बादल हूँ बस
ग्रीवा के हाँ,ना उत्तरों से
छीज-खीझ घायल हूँ बस,

कभी मौन कड़के बिजलियों सी
अन्तर्द्वन्द की कुण्डी तोड़कर
जलजला इक छोड़ मौन
फिर चुप की चुन्नी ओढ़कर,

देख नयन की घन घटा भी
फर्क नहीं पड़ता कोई
गुम रहते तुम अपनी घुन में
इस ढंग पे मैं कितना हूँ रोई,

जिंदगी के लघु मंच पर
मन में कितनी गुत्थियाँ हैं
मन के तल का शोर झंकृत
कर देतीं भाव वृत्तियाँ हैं,

अब नहीं मोहताज हूँ मैं
कि हँस के जरा तुम बोल दो
कर ली ख़ुशी के औज़ार ईज़ाद
मत कहना कि इसकी पोल दो,

इस मौन से भली कविता मेरी
इस चुप से सुन्दर लेखनी
कोरे कागज़ों से मेल कर
फूंक-फाँक ली मन की धौंकनी ,

चंठ --बदमाश
मेल -- दोस्ती
                         शैल सिंह


Monday, 16 January 2017

देशभक्ति गीत

       एक देशभक्त सिपाही के उद्वेग का वर्णन गीत वद्ध कविता में ,

बाँधा सर पे कफ़न हम वतन के लिए
जांनिसार करना मादरे चमन के लिए ,

मत प्रिये राह रोको कर दो ख़ुशी से विदा  
भाल पर मातृ भूमि का रज-कण दो सजा
दिल पे खंजर चलातीं हरकतें दुश्मनों की
लेना सरहद पे बदला हर बलिदानियों का ,

है पिता का आशीष गर दुआ साथ माँ की
प्रिये होगी विजय मुश्किले हर हालात की
रखना इंतजार का दीया दिल में जलाकर
सलामत रहा होगी बरसात मुलाक़ात की ,

अश्कों के बाल दीप ना बुज़दिल बनाओ 
ना कजरे की धार की ये बिजली गिराओ  
पिघल न जाये कहीं मोम सा दिल ये मेरा 
विघ्न के इस प्रलय की ना बदली बिछाओ ,

महबूब ये वतन तेरा वतन से प्यार करना 

वतन की आबरू लिए सुहाग वार करना 
माँग अपनी संवारो संकल्प के सामान से
कंगना कुंकुम ना रोको न मनुहार करना ,

कायराना कमानों का न आयुद्ध जुटाओ 
आरती के थाल आज़ सम्मान से सजाओ
धरा पलकें बिछा पथ निहारती सपूत का 
फर्ज़ का यह कटघरा न मुज़रिम बनाओ ,

है ललकारता नसों में नशा इन्क़लाब का 
तूफां से लड़ते देखना कश्ती के ताब का 
व्यर्थ ये जनम जो वतन के काम आये ना 
व्यर्थ रक्त शिराएं जिसमें उबाल आये ना , 

मक्कारियों से दुश्मनों के आजिज़ हैं हम 
बार-बार क्यूँ हुए शिकार साज़िश के हम
हौसलों के आग से तबाह करना शत्रु को 
भेंजो रणसमर न नैन कर ख़ारिश में नम , 

जीना मरना राष्ट्र हित लिए आरजू है मेरी 
कर्ज़ माँ का फ़र्ज निभाऊँ जुस्तजू है मेरी 
मौत आये ग़र अर्थी पर कफ़न हो तिरंगा 
शहादत पे सुनना आख़िरी गुफ़्तगू ये मेरी , 

ये तन समर्पित सरज़मीं पे देश प्राण मेरा 
ऐसा बनूँ मैं प्रहरी लगे सारा आवाम मेरा 
रखूँ अखण्ड देश को मैं लाल भारती का 
माँ भारती की आन पर कुर्बान जान मेरा ,

वतन पे मिटने वालों दिल से तुम्हें सलाम 
मिटना हमें क़ुबूल ज़िन्दगी वतन के नाम 
वफ़ा की मेरे खुश्बू सने माटी में वतन के 
शौर्य,शूरवीरता पे मिले हमें बस ये इनाम।   

                                     शैल सिंह 


   

Sunday, 8 January 2017

नव वर्ष पर कविता

भय,आतंक से मुक्त हो नया साल ये



सन सोलह ने कहा अलविदा
नव वर्ष तेरा अभिनन्दन कर
किया जग बेसब्री से इन्तज़ार
नव वर्ष तेरा शत वन्दन कर ,

ठसक से नवागत साल ले आना
नेमतें नई खुशियों की नियामतें
पर्यावरण,देश,समाज का विकास
है नवीन श्रृंखला में हमें तराशने ,

तुझसे उम्मीदें ख़ुशियों के सौगातों की
मंशा कारनामों के नए-नए आयामों की
पुलकित मन उल्लसित हर्षित जीवन हो
महकें दसों दिशाएँ नूतन निर्मित कन हो

ठहरे हुए वक्त को पर लग जाये
नवागत वर्ष में जन-जन का उत्कर्ष हो
धर्म,मज़हब की पट जाये गहरी खाई
फिर ना सियासत,नफ़रत सा संघर्ष हो  ,

भ्र्ष्टाचार,ग़रीबी,फ़रेब,अन्याय का
प्रेम,सौहार्द,स्नेह भाव से हो निष्कर्ष
हिंसा,द्वेष,घृणा,निराशा,दुर्घटना को
नव प्रभा निगल ले ऐसा हो नव वर्ष

भय,आतंक से मुक्त हो नया साल ये
दंगा,फ़साद,क़त्ल ना कोई बवाल हो
नया साल हो तेरा ऐसा पूण्य आगमन
बढ़े प्रभुत्व देश का हर का ख़याल हो ,

नित नव रंग भरो जीवन के उपवन में
नवीन चेतना,ईमान का करो जागरण
विमल हृदय,मनोवृत्ति हो सकारात्मक
श्रम,निष्ठा,परोपकार का भरो आचरण ,

दुःख-दर्द,पीड़ा,कटुता,कलेश हर लेना
भाईचारे,सद्दभाव की चादर फहराकर
अनसुलझी सुलझाना पिछली पहेलियाँ
सुख समृद्धि बरसा देना नीहार हटाकर।

नीहार--धुंध,कुहासा
                                    शैल सिंह