Wednesday, 7 September 2016


सूना कदम्ब सूना जमुना किनारा
सूखकर देह राधा की हुई छुहारा
गोपी,गाय,ग्वालों की हालत बुरी

तेरी बेरुखी पे तुझको कभी सदा न दूँगी
तेरे लिए इस दिल को कभी सजा न दूंगी

जान पर आ बनी है धरम की सियासत
कैसे चाँदनी रात भी अब डराने लगी है
भय आतंक से दहलता शहर दर शहर
ऑंख पूर्णिमा की भी रात चुराने लगी है ,

                                     शैल सिंह