Saturday, 2 July 2016

भले मैं नन्हा दीपक



कहाँ दीपक की दीपशिखा में दंभ तनिक भी बोलो तो
कहाँ दीपक के प्रज्वलन में है अहं तनिक भी बोलो तो ,

पर्व ज्योति का आया दीप बाल करें सिंगार तिमिर का
अन्तर्मन के तज विकार आओ करें सिंगार तिमिर का ,

मावस की काली रजनी जगमग वर्तिका की ज्योति से
आलस्य,कुंठा,भय,निद्रा मिटे दीप की अमर ज्योति से ,

चेतना का द्वार खोलता माटी का दीप जला अपना तन
अज्ञानता का तिमिर मिटाता दीप लुटा कर अपना धन ,

आकाश जुगनूओं से जगमग दीपों से झिलमिल धरती
साहित्य ,कला,संस्कृति ,ज्ञान दीपशिखा उरों में भरती ,

निज की आहुति दे नित दीपक पथ आलोकित करता
स्वर्ण शिखा सी ज्योति बिखेर संसार सम्मोहित करता ,

दीप जलाएं शिक्षा का मानवता का ऊर्जा भाईचारे का
नेह के घृत में चेतना की बाती तम मिटाऐं अंतर्मन का ,

अन्तर्मन की भावनाएं,संवेदनाएं प्रज्वलित करें प्रकाश
अभिव्यंजना दीप की तब सार्थक जब हिय भरें उजास ,

हमारी संस्कृति के रंग-रंग रचा-बसा दीपों का त्यौहार
आत्म ज्योति दीपित कर मनुज घर मन्दिर दियना बार ।

                                                    शैल सिंह 

महा नगर की एक झलक

महा नगर की एक झलक 

कैसा  ये महानगर  अजीब   इसकी दास्ताँ
ना  किसी  से  दोस्ती ना  किसी  से  वास्ता
ना  किसी से गल्प कोई ना  किसी से वार्ता
अजब सी आपाधापी बस पैसा रिश्ता नाता ,

बहुमंजिली  इमारतों  में  दुनिया  सिमट  गई
कबाट बन्द खिड़कियों में जिंदगी अटक गई
कोंतड़े सी बालकोनी में क्या क्या लटक गया
बित्ते भर के बारजे पर  सब कुछ ठिठक गया ,

कहते शान से बी.एच.के.महंगा है बड़ा दाम
महल  लगे ना हवेली अपार्टमेंट  फ्लैट  नाम
इससे इतर तो  मुर्गी का दड़बा  कहीं बेहतर
फ़ितरत तेरी इंसान कबूतर से भी बदतर ,

अंगना नहीं कि तुलसी का चौरा बना सकें
फुदक   रही   हों  गौरैयें  दाना  चुगा  सकें
दूध भात का कटोरा ले  लालच से बुला के
छज्जा  नहीं  मुंडेर  कि  कागा  उड़ा  सकें ,

कोठा नहीं अटारी निशां मोनियाँ काश का
हिफाजत से रखें आजी का संदूक काठ का
इतने  सहन  में  घूरों का  साम्राज्य  गाँव  में
यहाँ संम्हल के चलूँ ठोकर लगते है पाँव में ,

रिश्तों भरा परिवार है पल पल दरक रहा
न्यूक्लियर परिवार  का  चलन है  बढ़ रहा
पुस्तैनी बाप-दादा की विरासतें है ढह रहीं
वक्त की आंधियों में पंगु  इन्सान बह रहा ,

अजनवी  लगें  यहाँ  जाने-पहचाने  लोग भी
त्यौहार ,पर्व  बेमाने , बेमानी  लगे  सोच  भी
कहाँ वे छप्पन भोग कहाँ व्यंजनों की खुश्बू
फास्टफूड,मैगी.पास्ता पे  स्वाद हुआ लडडू

फर्नीचरों में तब्दील जंगल और बाग़ हो गए
उजड़ रही हैं बस्तियां शहर आबाद हो गए
बुलबुलों की वाटिका लानों की शान हो गयीं
पक्षियों का कलरव वाहनों की खान हो गयीं ,

चित्रों में  दिखती बस महादेवी की गिलहरी
कहाँ खेत औ खलिहान जहाँ बोले टिटहरी
उंगलियाँ जो पकड़ती थीं तितलियाँ जुलाहे
अब वो माउसों से खेलतीं टी.वी, पर निगाहें ,

अब पपिहरा की पिक कहाँ चाँद की चकोरी
सखी से कहाँ पाती  अब लिखाती कोई गोरी
अब कहाँ विरहन कोई जो छुप के चोरी चोरी
डाकियों की झरोखों से देखें साँझ भोरे खोरी ,

कभी झुरमुटों के पीछे  पिछवाड़े का ठिकाना
प्रिय से मनचली के मिलने का होता हो बहाना
यहाँ शर्मोंहाया का परदा निग़ाहों से गिर जाना
रास कैसे होता खुलेयाम  बेशरम हुआ जमाना,

कैसा है ये महानगर ……।

मोनियां काश का --सरपत,मूंज का बना हुआ ढक्कन वाला मोना ,
                                        सिंगार का  रखने का पिटारा
घूरों का साम्राज्य --कूड़ा कचरा फेंकने की जगह

                                                       शैल सिंह 

Wednesday, 29 June 2016

तुम याद बहुत आए

जब-जब कोकिल ने गान सुनाए
और चटक चांदनी उतरी आँगन 
जब-जब रंग बिखेरा इन्द्रधनुष ने
और जब आया पतझड़ में सावन 
         तब-तब प्रियतम तुम याद बहुत आए ,

जब-जब जग ने तंज कसा मुझपे 
मन के सन्तापों पर किया प्रहार 
माथे की शिकन पर गौर ना कर 
दुःखती रेखाओं को दिया झंकार 
         तब-तब प्रियतम तुम याद बहुत आए ,

उन्मद यौवन की प्यासी आँखों ने
कभी उर में तेरा अक्स उतारा था
ख्वामखाह हुई बदनाम निगोड़ी रे
जब देख के चढ़ा जग का पारा था
        तब-तब प्रियतम तुम याद बहुत आए ,

हर जीवन की होती एक कहानी
किसी के छंट जाते बादल बेपरवा
जबकि यहाँ धुला दूध का ना कोई
जब आईना मुझको दिखाया गया
        तब-तब प्रियतम तुम याद बहुत आए ,

जब-जब दामन पर कीच उछला
मेरे  पाप-पुण्यों  पर उठा  सवाल
औरों की करतूतें तो गुमनाम रहीं
जब मन के ठोकर पर मचा बवाल
         तब-तब प्रियतम तुम याद बहुत आए ।

                                         शैल सिंह