Friday, 30 December 2016

नव वर्ष पर कविता

'' नव वर्ष मुबारक हो सबको ''

नए साल ने दस्तक दी है
नव वर्ष मुबारक हो सबको ,

बीते बरस के खट्टे-मीठे अनुभव
भेदभाव सब बैर बिसारकर  
नव वर्ष का आदर स्वागत करें हम
खुशियों का उपहार लूटाकर ,

दिलों में प्रीत की जोत जलाएं
आत्मीयता का पुष्प बिछाकर
घर,समाज,देश हर रिश्ते संग
आह्लाद,नेह का घन बरसाकर ,

हम सब मिल यह संकल्प करें
नव वर्ष विश्व का मंगलमय हो
बहे जीवन सबके ज़ाफ़रानी बयार
दुःख,दर्द,रोग,शत्रुओं का क्षय हो ,

उमंग,तरंग से पुलकित अन्तर्मन  
हर्ष उल्लास से जीवन सुखमय हो
कल्पनाएं,अभिलाषाएं,आशाओं की
कभी ना राह किसी की कंटकमय हो ,

नव वर्ष नई स्फूर्ति नव किरण बिखेरे
खुशियों के फूल खिले घर आँगन में
हर सुबह सुहानी शुभ संदेशों की
ध्वजा फहराये हर प्रांगण में,

दैन्य,दरिद्रता,दुःख,कष्ट तमस मिटे
नाचे मोरनी कूके कोयल कानन में
साहस,सुयश,सद्ज्ञान,विज्ञान का
परचम लहराये हिन्द के दामन में,

नए साल ने दस्तक दी है
नव वर्ष मुबारक हो सबको ,

जय हिन्द ,जय भारत

                             शैल सिंह 




  

Tuesday, 27 December 2016

'' ग़ज़ल '' दोस्त की बेवफाई पर





दोस्ती के तक़ाजे क्या उसने ना जाना
सरेआम रूसवा हुई दास्ताँ दोस्ती की ,

वफा करते-करते चोट खाई ना होती
मलाल इतना ना होता दिल के नासूर का
तिल-तिल जलते ना यूँ बेवफ़ाई की आग में
ख़ुदगर्ज को गर आया होता उल्फ़त का सलीका ,

दिले-खंजर बेवफ़ा के गर जानी होती
करीब दिल के कभी इतनी आने ना देती
न गैर को अपना महसूसने की नादानी होती
ऐसी वफ़ाई के एवज में जग में रुसवाई ना होती ,

खुद कुसूरवार वही खार व्यवहार में
बेबुनियाद इल्ज़ाम लगा किया है घायल
ख़ुश हूँ उसकी बेरंग दुनिया से आज़ाद हो
मेरे तो बिंदास शख़्सियत की दुनिया है क़ायल ,

मुझे तनहा सफर में ना समझे कभी
मेरे साथ राहों पे भीड़ सदा चलती रहेगी
हाथ मलेगी अकेली वो ऐसी नाचीज़ खोकर
मग़रूर ख़यालों में तस्वीर मेरी अखरती रहेगी ,

लब पे मेरे तबस्सुम खिले फूलों सा
उसकी जिंदगी में मुबारक़ हों तन्हाईयाँ 
हवा-ए-गुलिस्ताँ मेरे महके संदल की खुश्बू
क़हर ढाएं एहसान फ़रामोश मेरी मेहरबानियाँ ,

गरूर इत्ता बेग़ैरत को किस बात का
खुदाया बरबाद चमन उसका गुलचीं करे
गुलों के आब की रौनाई हो मेरे पतझड़ में भी
गन्दी फ़ितरत के अहंकार में रब वो सुलगती रहे ,

दर्द सीने में संगदिल के जब भी उठेगा
बेचैन वो सारी रात करवट बदलती रहेगी
वक़्त की अनमोल पूँजी जो मैंने उसपे लुटाई
उसकी बेकद्री उसे तन्हाईयों में भी डंसती रहेगी ,

मुझे हासिल जहाँ की मुक़म्मल ख़ुशी
मनहूस की डवांडोल तूफां में कश्ती रहे
फिर मुमक़िन नहीं दिल से दिल का मिलन
आफ़ताब से भी बढ़कर मेरी हस्ती औ मस्ती रहे ।

                                             शैल सिंह


                                       

Thursday, 15 December 2016

''ना मुझ में मेरा कुछ प्रियतम ,ना तुझमें कुछ तेरा” 
 कुछ मायावी जादू तेरा ,कुछ चंचल चितवन मेरा 
 कहाँ ले गए प्रियतम निर्मोही तोड़ कर मन का घेरा
 मेरा ले मेरे मधुबन में प्रिय तुम डाल के अपना डेरा | 

                                               शैल सिंह 



Sunday, 27 November 2016

ख़िजाँ में फूल खिले ऐसा किया है दंगा

ख़िजाँ में फूल खिले ऐसा किया है दंगा


सबके साथ सबके विकास का
सुर में सुर मिला चलने का
ना खाऊँगा ना खाने दूँगा
इस तर्ज़ पर आगे बढ़ते रहने का ,

उसने वीणा उठा लिया है
समूचा भारतवर्ष  बदलने  का
जन-जन से आह्वान किया है
साथ-साथ संग चलने  का ,

दृढ़ संकल्प है उसने ठान लिया
घर-घर नया सवेरा लाने को
मन को जिद पर अड़ा लिया है
घना अँधियारा दूर भगाने को  ,

वर्षों से कोने-कोने विष जो
वातावरण में घुला हुआ था
जिन संग हवाओं का दल भी
आकण्ठों  डूबा  हुआ  था ,

इक देशभक्त फकीर दीवाना
चला है इन विषधरों से टकराने
क़दमों में परिवर्तन का निश्चय ले
कंकरों ,पत्थरों को पिघलाने ,

उलझा चल रहा काँटों से दामन
काँटे भी पग उसके चूमने लगे हैं
सत्तर सालों का मंजर देखीं ऑंखें
नये भारत के सपने बुनने लगे हैं ,

कद्रदान अनेकों इस सच्चे हीरे के
बड़े-बड़े धुरंधर हाथ मिलाने लगे हैं
उसके हर फ़ैसले की कर सराहना
देश के नागरिक सभी मुस्काने लगे हैं ,

इक प्रण उसने है हठ से लहराया
जड़ से समूल भ्रष्टाचार मिटाने का
कूटनीतिक हाथ मिला सूरज से
लक्ष्यों को मंजिल तक ले जाने का ,

बेशकीमती मोती पहचानो
अरे सुनो ओ देशद्रोहियों गद्दारों
जनमानस के तख़्त का शहंशाह वो
विष वमन करो या तुम फुफ़कारो ,

युग स्वर्णिम होगा आने वाला
इसी कद्दावर महापुरुष के हाथों
इस वैरागी के जीवन का सपना मात्र
विश्व हिन्द को देखे भर-भर आँखों,

देश लिए यह बहुमूल्य शख़्स है
ऐसे धरोहर को संजोये रखना है
इस युगान्तकारी कर्मवीर का
आत्मबल देश वालों बनाये रखना है

धैर्य,सहयोग,समर्पण की अलख
हम सबको मिल के जगानी होंगी
अभी,जो झेल रहे हम सब परेशानी
उसका निकलेगा नतीजा भी दूरगामी ,

आपके बलबूते ही इस जीवट ने
भृष्टाचारियों से लिया है पंगा
मत छोड़ना शीर्ष पर उसे अकेला
ख़िजाँ में फूल खिले ऐसा किया है दंगा ,

मत करो सियासत सस्ती घटिया
विरोध के लिए विरोधी तेवरों          
देखो नज़र उठा भविष्य देश का
गन्दी राजनीति से ऊपर उठो बेवड़ों ,

देख वजूद हाशिये परअपना
दिन-रात पप्पू फेंकर रहा है
मोदी मारक अचूक अस्त्र-शस्त्र
ममता की आँतें कुतर रहा है ,

गजगामिनी जी अवसाद में
पूर्जा-पूर्जा साईकिल का कोमा में
मस्तिष्क दिवालिया हुआ 'आपका'
भूक-भूक लालटेन कराहे कोना में ,

इक पारदर्शी कर्मठ,कर्तव्यनिष्ठ योगी के
नेक इरादे,क्षमताएं गौर से कौशल देखो
आतंक पोषितों,भ्रष्ट नेताओं,माफियाओं के
गढ़ मची क्यों घमासान हलचल,दंगल देखो ,

देश की मजबूत बुनियाद लिए ही उसने
नोटबंदी जैसा जटिल अहम् कदम उठाया है
क्यों विपक्षी राजनीतिक गलियारों में ही
उसके अप्रत्याशित फैसले पे सियापा छाया है ,

हम भारतवंशियों को गर्व आज यह
कि नमो-नमो जी जैसा रतन मिला है
हर मर्ज का उनके पास इलाज है,इस
सर्जन के ऑपरेशन से नहीं कोई गिला है

विपक्षी,विद्रोही खेमों में हो रहा रिएक्शन
जनता हर ऐक्शन का अनुमोदन करती है
अर्थक्रान्ति के उसके साहसिक प्रस्ताव पर
बच्चा,बूढ़ा,जवान हर गली समर्थन करती है ।

  जय हिन्द ,जय भारत ,जय मोदी ।

                                  शैल सिंह



Sunday, 20 November 2016

अकेलेपन में ख़ुशी की तलाश

अकेलापन भी एक एकान्त साधना है
एकान्तमिकता की मौनता भी अबूझ है
मन को कहाँ से कहाँ भटका ले जाती है
यही एकान्तमिकता कवि मौन मन को
मुक्त रूप से कवितायेँ रचने के लिए शब्दों
की समाधि में लीन कर उदासी को कविता
कहानियों के संसार में ले जा जीवन का
सार सिखा ,जता ,बता देती है । वीतरागी
मन के लिए ,छीजती हुई जिंदगी के लिए
एकान्त किसी विलक्षण औषधि से कम नहीं ,
यही कारण है कि एकान्त वास में मैं अपने
अकेलेपन और उदासी के उत्सव को ,मन रमा
कविताओं की विभिन्न विधाओं में मना लेती हूँ ,
मन होता विराट फ़लक पर रच डालूं ,उदासी
के क्षणों में हुए चुप्पी के करुणा का सागर ,मन
की कातर विह्वलता का संसार ,विलक्षण अनुभवों
का बहाव जिसका माध्यम सारे दर्द की दवा बन
जाये। कभी-कभी तो जैसे शब्दों का अकाल सा
पड़ जाता है ,मन का उद्वेलन व्यक्त करने
के लिए भाव होते हुए भी शब्द विलीन हो
जाते हैं ,भाषा करवट ले ले उकताती है पर
शब्द साथ नहीं देते और फिर निराशा जन्म
लेकर गहन उदासी पैदा कर देती है । ये शब्द
भी क्या धूप-छाँव का खेल खेलते हैं कभी तो
उबार लेते हैं अपनी अमूल्य निधि की ताक़त से
और कभी साथ न देकर विचलित कर देते हैं
रचनाओं के धरातल से । एकान्त ,अकेलापन और
उदासी भी एक अलग ऊर्जा की जमीं तैयार
करते हैं ,जिसमें होता है विशाल सोचों का भंडार
जो देती है किसी भी चीज के विश्लेषण की
क्षमता का अकूत साधन ,कल्पनावों का आसमान ,
अकेलेपन को कोसने से बेहतर है तन्हाईयों में
जिंदगी का उत्सव मना लेना ,स्वरूप जो भी हो ।
हरा-भरा संसार बिखरा-बिखरा ,एक दूजे से दूर
परिवारों का बिखरना ,रोजी-रोटी की जुगत में
घर-गांवों से लोगों का पलायन ,सभी अपने
आप में तनहा अकेले ,आज का जीवन ऐसा ही है ,
इसी में तलाशना है जिंदगी ,जिंदगी के सारे पहलू ।

                                             शैल सिंह






Wednesday, 9 November 2016

'' काला धन ''

मेरा देश बदल रहा है ,सरकार का यह सराहनीय कदम
सर आँखों पर ,भ्रष्टाचारियों तुम डाल-डाल मोदी जी पात-पात
गद्दे के नीचे,तकिये के नीचे,दीवान में रखी नोटों की गड्डियां मुँह
चिढ़ा रही होंगी ,५०० की १००० की गड्डियां टीसू पेपर के मुकाबले भी
नहीं रहीं,अब इनका क्या करोगे घूसखोरों आग लगाओगे या गंगा में बहाओगे
नहीं-नहीं गंगा भी अपवित्र हो जाएँगी ,ऐसा करो इसे चबा जाओ तुम लोगों की
पाचनशक्ति और हाजमा दुरुस्त हो जाएगी आगे और भी रास्ते अपनाने है काले
धन कमाने को। भ्रष्टाचारी कभी भी बाज नहीं आएंगे। फिर भी परिवर्तन की आंधी
में कुछ तो बदलाव आएंगे ही । सबका साथ सबका विकास ,
जय हिन्द ,जय भारत ,जय मोदी ,स्वच्छ भारत स्वतंत्र भारत ,हर-हर महादेव ,

                   '' काला धन '' 


मुझे कोई गम नहीं ,पास काला धन नहीं
मोदी का जवाब नहीं कितना है कदम सही
उड़ गयी होगी नींद किसी-किसी के आँख की
छीन गया होगा करार धनकुबेर हैं जो बेपनाह की
सुखानुभूति हो रही अपने उजले धन पर
ऐसी गाज गिरा दी है मोदी ने काले धन पर
वाह रे माँ लक्ष्मी तेरी कृपा भी क्या कमाल की
सर चढ़ जिनके बोली उन घर भी क्या धमाल की
अजीब हाल उगल सके ना निगल सके
रख सके न फेंक सके न गोरे में बदल सके
कल घर की लक्ष्मी आज कचरे की ढेर हो गई
शान बघारने वालों तेरे घर कैसी झट अंधेर हो गई ।

                                          शैल सिंह



Saturday, 29 October 2016

तमस मिटाऐं अंतर्मन का



कहाँ दीपक की दीपशिखा में दंभ तनिक भी बोलो तो
कहाँ दीपक के प्रज्वलन में है अहं तनिक भी बोलो तो ,

पर्व ज्योति का आया दीप बाल करें सिंगार तिमिर का
अन्तर्मन के तज विकार आओ करें सिंगार तिमिर का ,

मावस की काली रजनी जगमग वर्तिका की ज्योति से
आलस्य,कुंठा,भय,निद्रा मिटे दीप की अमर ज्योति से ,

चेतना का द्वार खोलता माटी का दीप जला अपना तन
अज्ञानता का तिमिर मिटाता दीप लुटा कर अपना धन ,

आकाश जुगनूओं से जगमग दीपों से झिलमिल धरती
साहित्य ,कला,संस्कृति ,ज्ञान दीपशिखा उरों में भरती ,

निज की आहुति दे नित दीपक पथ आलोकित करता
स्वर्ण शिखा सी ज्योति बिखेर संसार सम्मोहित करता ,

दीप जलाएं शिक्षा का मानवता का ऊर्जा भाईचारे का
नेह के घृत में चेतना की बाती तम मिटाऐं अंतर्मन का ,

अन्तर्मन की भावनाएं,संवेदनाएं प्रज्वलित करें प्रकाश
अभिव्यंजना दीप की तब सार्थक जब हिय भरें उजास ,

हमारी संस्कृति के रंग-रंग रचा-बसा दीपों का त्यौहार
आत्म ज्योति दीपित कर मनुज घर मन्दिर दियना बार ।

                                                    शैल सिंह 

Friday, 28 October 2016

जय वीरों जय माँ भारती की



तुम दुश्मन पर बम फोड़ो
हम दुआ करेंगे तेरी सलामती की
दीवाली नाम तेरे देश के रखवालों
जय वीरों जय माँ भारती की
तुम वीरों के नाम का दीप जला
सजा राखी है थाली आरती की
शीघ्र फतह कर घर लौटो
घर-घर जश्न मने खुशहाली की
ऐ सरहद पर लड़ने वालों
शत-शत नमन और शत-शत प्रणाम
तेरे ज़ज्बों और वतन परस्ती की |

                                       shail singh

Monday, 17 October 2016

तलाक और शरिया

तलाक तलाक तलाक के मसले को ना तो कानून सही कर सकता और ना ही शरीयत ,सिर्फ बहस और वाद प्रतिवाद के दौर में असली मुद्दा ही दबकर रह जायेगा । इस मसले का हल सारी मुस्लिम महिलाओं के हाथ में है यदि वह अपने साथ सदियों से हो रहे अन्याय के प्रति बगावत पर उत्तर जाएँ तो ,पर वो डरती हैं इस लड़ाई से कहीं अलग-थलग न पड़ जाएं ऐसी घड़ी में साथ देना होगा समाज को ,सभी वर्ग के लोगों को तथा हिंदुस्तान के सभी मानवीय संवेदनाओं को,मुस्लिम महिलाओं की सहनशक्ति ने ही बढ़ावा दिया मुस्लिम मर्दों को क्रूर से क्रूरतम अत्याचार और व्यवहार करने को सर से एड़ी तक बुर्का ,खुलकर साँस लेने की भी आजादी नहीं ,फैशन के अनुसार तथा बदलते हुए ज़माने साथ कितनों ने कुरीतियों को छोड़ ज़माने के साथ कदम मिलाया पर मुस्लिम धर्म में कोई बदलाव कभी नहीं आया न आएगा जब तक विचारों में आमूल परिवर्तन नहीं होगा जब तक सोच के फलक पर नई सोच हॉबी नहीं होगी ।  
                                                            shail singh  


                                                     

Friday, 14 October 2016

मन इतना आद्र है की बस .... मत पूछिये

     मन इतना आद्र है की बस  ....  मत पूछिये


उरी में शहीद हुए हैं अपने वीर जवान जो उनकी श्रद्धांजलि में
अभी शपथ लो हिंदुस्तान के नौजवानों डटकर इंतकाम लेने का
सिलसिला तभी थमेगा जब घुसकर तुम भी पाकिस्तान के गढ़ में
ऐसा हश्र करोगे मुँहतोड़ जवाब दे बेगैरत छिनालों के छैले ख़ेमे का ।

मच्छर,मक्खी सी माँऐं पैदा करतीं तादातों में वाहियात औलादें
न तहजीब सीखातीं न कोई संस्कार बस जनती रहतीं हरामजादे
न अफ़सोस उन्हें ना फर्क कोई गोजरों की एक टांग टूट जाने का
गर महसूसती वज्र का पहाड़ टूटना मलाल होता कुछ खो जाने का ।

पर तेरी बहना तो थाल सजा बैठी थी इकलौते भाई की राहों में
मेंहदी रचे हाथ भरी चूड़ियाँ जहाँ सिंगार तब्दील हो गए आहों में
हसरत से देखती रस्ता जिन माँओं के आँखों से निर्झर आँसू उमड़े
उन वीर सिपाहियों की शहादत पे नौनिहालों लेने होंगे फैसले तगड़े ।

                                                              शैल सिंह

Monday, 10 October 2016

वीर रस की कविता --ओए शुरू हो जा उलटे दिन गिनना

वीर रस की कविता --ओए शुरू हो जा उलटे दिन गिनना 



क्यूँ पापों में निर्लिप्त निर्बाध बह रहे अनिर्दिष्ट दिशा में पाकिस्तान ,

क्यों सत्य,अहिंसा की पावन वेदी को हिंसात्मक बनाने पर हो तूले
कश्मीर का तो सवाल नहीं पीओके पर नजर हमारी क्यूँ तुम भूले ,

छोड़िये नवाज़ शरीफ बुरहान वानी की तोतिये रट का सिलसिला
मेरे घर का मामला था वो ग़द्दार,उसे उसके करनी का फल मिला ,

गर कुछ लेहाज बाकी तो पहले निज घर की बिगड़ी तस्वीर संवार
तेरी व्यर्थ कोशिशें काश्मीरियों लिए शाख़ की ढहती दीवार निहार ,

छोड़ दो वानी का कल्ट खड़ा कर कश्मीरी युवाओं को भड़काना
अन्तर्राष्ट्रीय मानकों ने इतना धिक्कारा पर तुझे नहीं आया शर्माना ,

क्यों उसकी फिक्र तुझे इस्लाम अनुसार जन्नत के मजे वो लूट रहा
बहत्तर हुरों के अंगूरी रस का स्वाद इत्मिनान से वानी तो चूस रहा ,

वैश्विक पटल पे इतनी फ़जीहत देखले मक्कार तूं अपने को तनहा
कहाँ गई जनाब की दादागिरी ओए शुरू हो जा उलटे दिन गिनना ,

आख़िर क्यूँ हमसे बैर तुम्हें,साज़िश-रंजिश रचते जिन्ना के मरदूदों
पक्के देशभक्त अपने हिंदुस्तानी मुस्लिम यहाँ ना डालो डोरे चूज़ों

पाकिस्तानी हिन्दूओं संग जो किये बर्बरता उन्हें शहीद का दो दर्जा
कहर ढा चुप रखा उन निर्दोषों को कहीं तेरे गुनाहों की ना हो चर्चा

देख तरक्की हिन्दुस्तान की जल-भून क्यूँ खूंखार बन खुंदस रखता
हम मानवता के अंकुर बोते पाकिस्तानी जमीं जिहादी पौधा उगता

मौन तरंगों को करता उद्वेलित तूं हमपे अघोषित प्रहार कर-करके
गरज उठा समंदर अन्तर का भीषण तूफ़ानों के अट्टहासों से भरके ,

पीड़ा और ज्वलन के आरक्त से हुईं शिथिल इन्द्रियाँ भी उन्मादित
तेरे रक्त कणों से उर की प्यास बुझानी,हैं हिंदुस्तानी भी उत्साहित ।

                                                                 शैल सिंह
  

Friday, 7 October 2016

बता दो शेरों क्या औक़ात तेरे हिंदुस्तान की,


   ' वीर रस की कविता '


सीमाओं पर तो सब कुछ सहते तुम सेनानी
फिर किस आक़ा के ऑर्डर का इन्तजार है
आत्म रक्षा के लिए वीरों तुम पूर्ण स्वतंत्र हो
हैवानों से निपटने का तुम्हें पूर्ण अधिकार है,

स्वयं के जान की कीमत समझो सिपाहियों    
दुश्मनों पर दागो गन ,बारूद औ एटमबम
कायर बन कर राक्षसों के वंशज करते वार
छप्पन गज सीने से टकराने का नहीं है दम,
   
खद-खद ख़ौल रहा जो आज खून जाबांजों
इतना ख़ौफ़ दिखा फट जाए पाकिस्तान की
बहुत खोये हैं लाल भारत माँ ने आज तलक
बता दो शेरों क्या औक़ात तेरे हिंदुस्तान की,

ऐसा उठा बवंडर शान,आन की बात सपूतों
घर के मित्र-शत्रु का फर्क भी ध्यान में रखना
बहुत हुई गाँधीगिरी मानवीयता बहुत दर्शाये
असमंजस क्यों,पैलेटगन हिफ़ाजत में रखना,

मुहूर्त बहुत ही अच्छा दुश्मन मार गिराने का
मटियामेट इन्हें करना संकल्प ठानो दिग्गज़ों
प्रीत पड़ोसी नहीं जानता बार-बार उकसाता
देश कुर्बानी मांग रहा राणा प्रताप के वंशजों,

ऐ कश्मीर के बासिन्दों क्यों धुंध नजर पे छाई
क्यों स्वर्ग की नगरी नरक कुण्ड है बना दिया
क्यूँ बो रहे केसर की क्यारी नफरत के अंगारे
क्यों ग़द्दारों की सह पे खुद का चैन उड़ा लिया ,

                                                shail singh



Wednesday, 5 October 2016

' क्रान्तिकारी कविता ' अविच्छिन्न अंग काश्मीर हमारा इसे न हाथ से जाने देंगे

 इस कविता के द्वारा मैंने हिजबुल मुजाहिदीन,जैश-ए-मोहम्मद और अलगाव वादी नेताओं तथा हाफिज सईद आदि जैसे आतंकी फैक्ट्रियों को चलाने वाले एवं भारत में अराजकता फैलाने वाले एवं अपने नापाक इरादों से कश्मीरी नौजवानों को गुमराह करने वाले सनकियों को समझाने वाले अंदाज में एक सन्देश देने की कोशिश की है । 

' क्रान्तिकारी कविता '  अविच्छिन्न अंग काश्मीर हमारा इसे न हाथ से जाने देंगे,


भटके नौजवां आतंकी बन काश्मीर के जर्रे-जर्रे में छैले
छितरे नागफ़नी के काँटों से फुफकारें पाले नाग विषैले ,

क्यूँ रक्षकों के भक्षक बन दुश्मन देश से हाथ मिलाते हो
क्यूँ जन्नत सी धरती पर अपनी काँटों की पौध उगाते हो
विपदाओं में जब-जब घिरता संग कौन खड़ा होता बोल
किस आजादी की मांगे कर दिन-रात उत्पात मचातें हो ,

ओ वादी के भोले नादानों कह दो अपने सरगनाओं को
हमें नहीं जेहादी बनना दो टूक जवाब दो आकाओं को
हमें तामिल हासिल कर नबील बानी जैसा टॉपर बनना
हमें हुर्रियत जैसे भड़काने वाले नेताओं का पर कतरना ,

तुम्हारी अकर्मन्यतायें ही आतंकों की प्रयोगशालाएं हुईं
क्या कभी हुक्मरानों ने जानी क्या तेरी अभिशालाएं हुईं
अपनी औलादो की करें हिफाज़त तुझे ज़िहाद में झोंकें
तूं कुत्तों की मौत मरे तेरे कुन्बों को खुश करने वो भौंकें ,

पत्थरबाजी खेला-खेल तुम्हीं वर्दी वालों को उकसाते हो
जब वर्दी हरकत में आती क्यों पैलटगन पर चिल्लाते हो
सारी हदें तुम तोड़ते क्यों पागल माफ़िक होश गंवाते हो
खुद आग लगा हाथ क्यों आग की लपटों में झुलसाते हो ,

यह मत सोचो हमें डराकर कश्मीर हमारा हथिया लोगे
दहशतगर्द गतिवविधियों से दिल्ली का तख़्त हिला दोगे
अविच्छिन्न अंग काश्मीर हमारा इसे न हाथ से जाने देंगे
रहो चैन से रहने दो वरना हम जन्नत की राह दिखा देंगे ,

मत इस गफलत में रहना ऐ आतंक जेहाद के उलेमाओं
देश के नक़्शे से काश्मीर मिटा इस्लामी मुल्क़ बना लोगे
हमने खेलीं न कच्ची गोलियाँ न तो गट्टों में चूड़ियां पेन्ही
जब कुपित काल बन घहरेंगे नाशपीटों तो दुम दबा लोगे

क्या कभी भड़काने वालों ने शिक्षा रोजगार की बातें कीं
पढ़ो-लिखो तुम अच्छा इन्सान बनो कभी ऐसे जुमले कीं
तूं दिमाग से पैदल है या तेरी अक़्ल को लकवा मार गया
क्यों नहीं समझता गिद्धों ने पैदा खूनी खेलों की नस्लें कीं ,

हम कितने पेशेवर हैं देखो बता दिया सही वक्त आने पर
जब-जब तोड़ेगा सब्र विवश होंगे इच्छाशक्ति दिखाने पर
क्यूँ भड़काते,भाई से भाई के आंगन में दंगल करवाते हो
कितनी हिदायतें देते ओछी हरकत से बाज नहीं आते हो,

क्यूँ नौजवानों के मस्तिष्क में बोते तुम नफरत के अंगारे
पलते हमारी आस्तीन मे लगवाते पाक ज़िंदाबाद के नारे
अरे जाहिलों लड़वाओ न भूख,बीमारी,अशिक्षा,बेगारी से
इत्ते भी अब घाव न दो वादी वंचित हो जाये किलकारी से ,

घाटी में मरघट फैला,वीरों की शहादत पर जश्न मनाते हो
मुस्टण्डों खाते-पीते हो हिंदुस्तान का हरा रंग फहराते हो
तेरी भाषा में देना आता जवाब आ हम भी सीना तान खड़े
क्यूँ भिनभिनाकर मधुमक्खी सा तुम छत्तों में घुस जाते हो ,

तुझ माटी के कच्चे घड़े को मनचाहे आकारों में ढलवाना
मनसूबों के नापाक ईरादे तुझे नाकारा निकम्मा बनवाना
ओ कश्मीर के नौनिहालों इन अलगाववादियों से दूर रहो
हिन्दुस्तान लिए जीयो-मरो ऐसा करो के हिन्द के नूर रहो ,

भेदिये का काम बख़ूबी यही करें,.यही हैं घुसपैठ करवाते
हम विविधता के बहुरंगों में यह इस्लाम की फ़सल उगाते
देख अन्दाज हिन्द की ताक़त का विश्व भी लोहा मान रहा
सरहद पार जो कीर्ति दिखा दी दुनिया भर में सम्मान रहा ,

दहशतगर्दी की धौंस दिखा खेल न खून भरी पिचकारी से
खलनायक का रोल भूल खुश्बू फैला केसर की क्यारी से
हाथ न डाल मांद में शेरों की हम चीर फाड़ कर रख देंगे
अपनी धर्म,संस्कृति की रक्षा हेतु जान हथेली पर रख देंगे

हुक्मरानों के बरगलाने पर नाक में दम करना अब छोड़ो
बंद करो ये खूनी खेल प्रसारण अंजाम बहुत घातक होगा
और न उकसाओ हिन्दुस्तानी हृदय के तूफानी ज्वारों को
तेरे कुकर्मी कारख़ानों का रोकथाम बहुत विनाशक होगा ।
                                                 
                                                                    शैल सिंह
                                      

Friday, 30 September 2016

'' क्रन्तिकारी कविता '' शत-शत नमन तुम्हें महानायकों

ये वानगी तो एक चेतावनी थी
सिंधु जल पर जल्द फैसला लेंगे हम ,

दिल आज ख़ुशी से पागल है
मन रही देश में गली-गली दीवाली  
शहर-नगर फूटे धांय-धांय पटाखे
मिष्ठानों से घर-घर सज गई थाली ,

उरी की घटना ने ले लिया इंतक़ाम
फैली मातमी चेहरों पर ख़ुशहाली
बहादुरों ने ऐसा साहसी रंग बिखेरा
अबीर गुलाल उड़ा होली पर्व मना ली ,

शत-शत नमन तुम्हें महानायकों
रच दी एल ओ सी पे नई कहानी
प्रण किया था खा के माँ की कसम
व्यर्थ न जाने दी सेनानी की क़ुरबानी ,

एक-एक शहादत के बदले तेवर ने
दस-दस जां लेने की बात कही थी
अभी मिशन नहीं पूरा हुआ बता दो
पीठ पे हमने घात की वार सही थी

आज कलेजे को मिली है ठण्डक
उरी का मुँहतोड़ जवाब दे देने पर
घर में घुस वीरों ने जो अंजाम दिया
अब नहीं मलाल सुपुत्रों के खोने पर

तेरे शौर्य का अद्द्भुत परचम देख
हल्दीघाटी का भी सीना फूल गया
परमाणु बमो की धमकी देने वाला
शिकश्त खा लाशें गिनना भूल गया।

                                       शैल सिंह




Tuesday, 27 September 2016

'' क्रन्तिकारी कविता '' शमशीरें मचल रही हैं चोलों में


उरी हमले पर मेरी लेखनी द्वारा बिफरती हुई यह दूसरी कविता है ,उरी के शहीदों को समर्पित मेरी इस वीर रस की कविता की एक वानगी ---

शमशीरें मचल रही हैं चोलों में


प्रस्तावना से लेकर उपसंहार तक
ऐ पाकिस्तान तेरी बर्बादी का
पटकथा,कहानी लिख ली भूमिका
ढाँचा ध्वस्त करना तेरी आबादी का ,  

कितनी बार फेंकी है तूने लुत्ती
हमारे अमन चैन के उपवन  में
कितनी बार तूने भड़काए शोले
हमारे हृदय के शान्त सदन में ,

विकराल हवा संग मिल चिन्गारी
तेरी चमड़ी पे ऐसा कहर ढहाएगी
अंगारों को कल अब तभी मिलेगा
जब नमक-मिर्च का छोङ्क लगाएगी ,

अनगिनत नासूर दिए हैं तूमने
अब ये उफान नहीं है रुकने वाला
लालकिले की रणभेरी ने हुंहकार
खोल दिए हैं अब चुप का ताला  ,

दरियायें अब समंदर बन कर
तेरी तबाही को पाक व्याकुल हैं
आँसुओं की छछनाईं नदियां
तेरी घोर बर्बादी को आकुल हैं ,

क्यों माएँ तेरी बस पैदा करतीं
तुझे आतंक,ज़िहाद में झोंकने को
क्यों शिक्षा,संस्कार,चलन को देतीं
आत्मघाती,फिदाईन चोला ओढ़ने को ,

हमारे असंख्य पीरों की मवाद ने
अचूक औषधि ईज़ाद कर ली है
इसका माकूल शोध अब तुझ पर होगा
सहनशक्ति ने पूरी मियाद कर ली है ,

घर आतंकवाद का गढ़ है तेरा
आतंकी देश तूं घोषित होने वाला
अब चाहे जितना भी मिमिया ले
तूं ही जिहादियों को पोषित करने वाला ,

छप्पन गज छाती की दहाड़ तो
तूने भी दिल्ली के सिंहासन की सूनी होगी
ये आवाज ही काफ़ी है नींद उड़ाने को
अब ये हुँकार रात चौगुनी दिन दूनी होगी ,

अरे ओ नक़ाबपोश के गलियारों
तेरे पापों का पर्दाफ़ाष हुआ है
तेरे दिग्गज मेहरबानों ने हाथ खींच लिए
तभी तो तूं इतना बदहवास हुआ है ,

गिलगित,बलूचिस्तान भी उफनाए हैं
देखना पीओके भी हम ले लेंगे
दुनिया के नक़्शे से तेरा नाम मिटा
मोहरा तुझे बनाएंगे दांव हम खेलेंगे ,

अपने वीर शहीदों की कुर्बानियां
कभी व्यर्थ नहीं हम जाने देंगे
कतरे-कतरे का मोल चुकाएंगे
दस-दस लाश बिछा हम दम लेंगे ,

क्यों इतनी नियति में खोट तेरे रे
इन्सान नहीं हैवान है रे तूं
आहार ज़ुल्मतों का खा-खाकर
राक्षस,नरपिशाच,शैतान है रे तूं ,

तेरी लाशों के ही ढेर पर अब
होली,दीवाली का जशन मनाएंगे
एक-एक शहादत के एवज में
सौ-सौ जानों पर गाज गिराएंगे ,

हम चौकन्ना हो गए हैं जब
क्यों बिल में घुस गए ओ केंचुओं
कंटियायें बेताबी से तरस रही हैं
साहिल पे आ जाओ ओ कछुओं ,

अरे ओ छुट्टा बकरी के मेमनों
कहाँ दुबक गए हो खोलों में
बहत्तर हूरों के पास नहीं जाना क्या
शमशीरें मचल रही हैं चोलों में ,

हमीं हर मोर्चे पर हुए हैं क़ामयाब
अरे कायरों मैदान-ए-जंग में तो आओ
कृष्ण,अर्जुन के पराक्रम,पुरुषार्थ पर
कायराना बल एक बार तो आज़माओ ,

हम नदियों का जल सुलभ न होने देंगे
हो जाओ तैयार बेहूदों आपदा झेलने को
जब प्यास से मरना बिलबिलाकर
तब आना कबड्डी हम संग खेलने को ,

रुख हवा ने भी अपना मोड़ लिया है  
सन्धि,समझौते भी बदल देंगे अन्दाज़
तुझे बूँद-बूँद को तरसायेंगी अब पापी
झेलम ,रावी ,सतलज ,व्यास ,चिनाब ,

इन विषधर साँपों के फन को
यही अच्छा वक्त कुचलने का है
इन डोड़हों के फुफकारने से पहले
इनके नस-नस ज़हर उड़लने का है ,

कुछ भितरघाती जयचंदों की भी
जुबानों पर शीघ्र ही जाबा मखने होंगे
कुछ गद्दारों,देशद्रोही,बड़बोलों की
नाकों में भी शीघ्र नकेल कसने होंगे ।

                            शैल सिंह




















Sunday, 25 September 2016

'' क्रन्तिकारी कविता ' रण में विजय केतु फहराने पर

'' क्रन्तिकारी कविता ' रण में विजय केतु फहराने पर

ये आक्रोश भरे शब्द लिखे हैं आंख पानी से
रोष है उड़ी में हुए अट्ठारह वीर जवानों की कुर्बानी से ,

रण हुंकार से भरी शेरों की शमशीरें दहक रही हैं
बिफ़र रहीं तलवारें भी भुजायें-भुजायें फड़क रही हैं
हर वजूद के रक्त प्रवाह से सिंह सी गर्जनायें भड़क रही है
विकराल तूफान की लहरें लीलने के लिए पाक तुझे ललक रही हैं

हम आस्मा को धरा पर झुका लेने की ताकत रखते हैं
तोड़ पर्वतों का गुमां गंगा बहा लेने की हिमाकत रखते हैं
हमारी एक ही हुंकार जला के खाक कर देगी पाकिस्तान को
हमारे हिन्दुस्तानी स्वेद में दुनिया बहा ले जाने का दुःसाहस रखते हैं

माँ मलिन मन मत करना वीर पूत के शीश कटाने पर
गर्व से सीना तान के रखना रण में विजय केतु फहराने पर
धरा का शीश नहीं झुकने देंगे अरि भी नत मस्तक करेगा अब
देखना माँ रण बांकुरों के कर में देख खंग विश्व भी काँप उठेगा अब

बांध शहादत का सेहरा माँ गर वीरगति भी हो जाये
मातृभूमि की रक्षा ख़ातिर माँ मेरा नाम अमर गर हो जाये
धन्य मानूँगा ये जीवन,धरती ऋण से प्राण उऋण गर हो जाए
सौभाग्यशाली वो दिन होगा क़फ़न तिरंगा ओढ़ चिता गर घर जाये ,

माँ ने कोंख से जनम दिया भारत माँ को सौंप दिया
कैसी हिम्मत वाली माँ फ़र्ज की ख़ातिर कुलवंश सौंप दिया
योद्धा पत्नी ने जीवन सुहाग का आभूषण धैर्यवान हो सौंप दिया
मैं कितना किस्मत वाला वतन लिए निश्चिन्त सांस-सांस है सौंप दिया
,
ऐसा सिंघनाद करना है,तहलका विश्व में मचाने को
काई रक्त की साफ है करना कायरों की जड़ें हिलाने को
अब कोई संवाद न होगा बस होगा इंकलाब दिल दहलाने को
भटकी तरुणाई में रसायन ऐसा घोलना नपुंसकों का होश उड़ाने को ।

शैल सिंह

Friday, 23 September 2016

'' देश भक्ति कविता '' घटा भी बरसी ऐसे आज धाड़-धाड़ कर

'' देश भक्ति कविता ''   घटा भी बरसी ऐसे आज धाड़-धाड़ कर 


चिता पर तेरी दुलारों श्मशान रो रहा है
कैसे करें अगन हवाले जहान रो रहा है
धरा रो रही है नीला आसमान रो रहा है
जनाजे पर तिरंगे का अपमान रो रहा है ,

आपा खोया ,भृकुटी तनी,त्योरियां चढ़ीं  
लाल किले के बुर्ज़ ने संयम तोड़ दिया
छल-छद्म के बदले हेतु भड़की चिंगारी                    
नरम रवैये ने सब्र का बंधन खोल दिया ,

मौत का पाई-पाई कर्ज़ चुकाने को मैंने
माँ की सौगन्ध वर्दी तन पे सजा लिया है
हाथ अश्त्र ले दस-दस लाश बिछाने का
सरहद पार जाने का वीणा उठा लिया है ,

चिताओं से उठती  लपटें ललकार रहीं
पाकिस्तान को नेस्तनाबूंद कर देने को
हर आंसू हर आह से शोला भड़क रहा
जखम ब्याज सहित वसूल कर लेने को ,

माँ-बहनों परिजनों के दग्ध चीत्कार पर
पाषाण हृदय के भी निर्बाध आंसू उमड़े
घटा भी बरसी ऐसे आज धाड़-धाड़ कर
सुहागन के ललाट की जब लाली उजड़े ,

तिरंगों में लिपटे अट्ठारह जवां शवों पर
देश कितना संतप्त,विदग्ध,शोकातुर है
किस्तों में मिला दर्द,कलेजे चुभा नश्तर
हाँ युद्ध की दुन्दुभि बजाने को आतुर है ,

किसी का अमर  सुहाग जला  चिता में
किसी का गुलशन खाक हुआ चिता में
कितनी माँ की कोख़ भष्म हुई चिता में
कितनों  का आसरा स्वाहा हुई चिता में ,

जिस हथेली पर मेंहदी का टह-टह रंग
जिन केशों का गजरा मुरझाया नहीं था
उस दर पर आई सजन की अर्थी सजी
जिस सेज का पुहुप कुम्हलाया नहीं था ,

अब देखना पाक हमारे संग्राम का मंजर
उमड़ते सैलाबों ने तोड़ीं सब्र की सीमाएं
दिल दहलाने वाला ताण्डव तो अब होगा
मौत के साथ जलाने का सामां भी हैं लाए ।

                                           शैल सिंह





Monday, 19 September 2016

'' हिन्दी दिवस पर '' हिन्दी आत्मा है हिंदुस्तान की

            अभी हिंदी पखवाड़ा चल रहा है उस उपलक्ष्य में मेरी मेरे द्वारा लिखी यह कविता है 

                      हिन्दी दिवस पर बस यही कहना है ---

                       '' हिन्दी आत्मा है हिंदुस्तान की
                          इसे सभी लोग दिल से अपनाएं
                          इससे अच्छी भाषा न कोई जहान की
                          हम इसे जेहन में जिंदगी में उतारें ''

हिन्दी धड़कन,मेरुदण्ड,सांस है शिरोमणि अखण्ड हिंदुस्तान की
हर माने में समर्थवान वृहत कोषों का भण्डार हिंदी हिंदुस्तान की,

स्वर,व्यंजन,छन्दों से सुशोभित सुघड़,सलोनी हिदी हिंदुस्तान की
सहज,सरल,सुबोध,शुद्ध अलंकारयुक्त शुचि भाषा हिंदी ज्ञान की,

गीत रचे संगीत रचे रस श्रृंगार में परोसे दुःख दर्द कहानी,कविता
गजल,कलाम शेरो-शायरी में कर देती अंतर की प्रवाहित सरिता,

खोल तिजोरी अतुल शब्द समन्वय की अविरल रसधार बहाती है
सौंदर्यबोध की मलिका हिंदी लगाके बिंदी भव्य अलख जगाती है,

गर्व से बोलो,शर्म करो मत राष्ट्रधर्म निभाओ भाषा स्वाभिमान की
संसार की सबसे उन्नत औ सुव्यस्थित अग्रणी भाषा हिंदुस्तान की,

मर्यादित,सुस्पष्ट,प्रभावी मधुर भी कितनी जनहित के कल्याण की
संवादमुखी,पारदर्शी संग सर्वसुलभ,सर्वव्यापी हिंदी हिंदुस्तान की,

आचार-विचार,व्यवहार में घुलती हिंदी भाषा देश लिए उत्थान की
सर्वसमय सर्वत्र प्रयोग अभिव्यक्ति की मैत्री है हिंदी हिंदुस्तान की,

मीठी सरस,सुहावन हिंदी भावों की जननी जन-जन के जुबान की
सद्दभाव,सौहार्द की कड़ी,समृद्ध करें हिंदी विश्व गुरु अभियान की,

अकूत साहित्य सम्पदा हिंदी की शुद्ध परिष्कृत ओजस्वी शान की
सहर्ष सुकीर्ति,ख्याति फैलायें राष्ट्रीय चेतना हिंदी आत्म सम्मान की,

चिरंतनकाल से देवों की वाणी सनातनी है हिंदी धर्म वेद पुराण की
संस्कारवान,शालीन,सौम्य रससिक्त मृदु भाषा हिंदी हिंदुस्तान की,

जिन्हें कदर नहीं अमृत भाषा की जो अज्ञान के अन्धकार में डूबे हैं
जिन्हें हिंदी बोलने में शर्म संकोच महिमा का भान नहीं वे अजूबे हैं,

राष्ट्रभाषा है हिंदी हमारी सगर्व बोलो जय बोलो हिंदी हिंदुस्तान की
जोर से बोलो,मिलके बोलो,सारे बोलो हम हिन्दू हिंदी हिंदुस्तान की ।

                                                                          शैल सिंह

Sunday, 18 September 2016

पागलों का जमावड़ा

उरी में हुए आतंकी हमले और वीरों की शहादत पर लालू यादव के ये श्रद्धांजलि के शब्द हैं ,मोदी जी पर कटाक्ष कि ३६ इंच का सीना सिकुड़ गया ,इस उजड्ड गंवार की अक्ल को कौन ठिकाने लगाएगा सारा देश शोक संतप्त है ,इस शोक की घड़ी में तो सारे देशवासियों को घर के अन्तर्कलह को किनारे कर भारतीय एकता का सन्देश देना चाहिए ,लालू यादव के इस कथ्य पर भी बवाल मचाना चाहिए ,किस सरकार के कार्यकाल में इस तरह के घातक हमले नहीं हुए ,आशंका तो हो रही कहीं सरकार को बदनाम करने के लिए राजगद्दी की लालसा के लिए कहीं इन विरोधी तत्वों का हाथ तो नहीं ,यदि आतंकी हमलों पर, देश पर मंडराते हुए खतरों पर राजनितिक पार्टियां ऐसी बयानबाजी करती हैं तो पूरे देश से मेरा अनुरोध है की बेहूदे जुबानी हमलों पर उन्हें भी सबक अवश्य सिखाएं,धर्म,जाति-पांति को परे पखकर ऐसे हालात पर एक शब्द भी बेतुका बोलने वाले की जीभ काटकर उसके हाथों में रख देना होगा ,घर के बहरूपियों की उलटीसीधी ,अंट-शंट बयानबाजी से दुश्मनों को हिम्मत मिलती है ,कहाँ देशवासियों, जवानों का हौसला बढ़ाना चाहिए और कहाँ ताना और छींटाकसी केरना ,अरे लालू भी तो देश का नागरिक है क्यों नहीं ७२ इंच का सीना लेकर आगे आते कि प्रधानमंत्री बनकर ही देश का कल्याण करेंगे,शिवसेना की भी बयानबाजी रास नहीं आई,कौन जानबूझकर मौत को बुलावा देगा इन सनकी बरखुरदारों को जिहाद ,आतंक से निपटने की रणनीति पे चर्चा नहीं करनी है बस चूक कैसे हुई ,इनका कहने का मतलब साफ ,सैनिकों ने अपनी मौत का सामान खुद तैयार किया ,पागलों का जमावड़ा है इस देश में दुःख की घड़ी में भी ये लुच्चे एकजुट कभी नहीं हो सकते ,कितना गलत सन्देश जाता है आपसी दुराग्रह का,कभी सोचा है।

                                                                                                                                  शैल सिंह 

रत्ती भर परवाह नहीं ,

उरी कश्मीर में अपने १७ जवानों की शहादत और घायल हुए जवानों की खबर से आत्मा दुःख से चीत्कार रही है ,आक्रोश इतना कि चुन-चुन-कर गिन-गिन कर एक-एक को मन हो रहा है चुटकी से मसल-मसल कर इनकी जन्नत जाने वाली अछूत शरीर को आग लगाकर उस पर मैला डाल दें , जवानों के माँ,बाप,बहन,पत्नी बेटी का क्या हाल हो रहा होगा ,हम सिर्फ प्रतिक्रियाएं व्यक्त करते हैं लिख,बोलकर भड़ास निकालते हैं फिर कुछ दिन बाद ऐसा दर्द भूल जाते हैं लेकिन फिर ऐसी ही वारदात दुहराई जाती है ,जहर का घूंट कब तक पीते रहेंगे हिंदुस्तान का वह तबका कहाँ गया जो हमेशा विरोधाभाषी बातें करता रहता है कहाँ गए ओवैसी और कश्मीर के अलगाववादी नेता वो विरोधी पार्टियां जिनकी लंबी-लंबी जुबानें चार हाथ बाहार निकलकर भड़काने वाली बातें करती हैं ,यदि आज अभी कोई कारगर कदम उठाया जाय तो चों-चों करने के लिए सभी पार्टियां दुश्मनों की तरह एक मंच पर आ जाते हैं मोदी जी के ख़िलाफ़ आवाज उठाने  के लिए ,यदि सभी हिंदुस्तानी एक मत से ऐसी घटनाओं के निराकरण के लिए आवाज बुलंद करें सभी अराजक तन्तुओं के आचरण का बहिष्कार करें ,देश के प्रति सब एकजुट हो जाएँ तो क्या मजाल कोई आँख दिखाए ,बहुत ही आहत हृदय हुआ है ,सभी सीमाओं पर अपोजिट बोलने वाले नेताओं के दुलारों को तैनात कर उनके जनाजे का नजारा देखना चाहिए ,दाल,पेट्रोल,किराया भाड़ा पर बोलना गरीबों को अनपढ़ों को भड़काना तो बड़ा अच्छा लगता है शहीदों और सेनाओं के लिए क्या होना चाहिए उसकी रत्ती भर परवाह नहीं ,सारे मिडिया वालों और पत्रकारों की कलम और जुबान भी शहीद हो गई शहीदों के साथ ।
         
                                                                                 शैल सिंह 

Wednesday, 7 September 2016


सूना कदम्ब सूना जमुना किनारा
सूखकर देह राधा की हुई छुहारा
गोपी,गाय,ग्वालों की हालत बुरी

तेरी बेरुखी पे तुझको कभी सदा न दूँगी
तेरे लिए इस दिल को कभी सजा न दूंगी

जान पर आ बनी है धरम की सियासत
कैसे चाँदनी रात भी अब डराने लगी है
भय आतंक से दहलता शहर दर शहर
ऑंख पूर्णिमा की भी रात चुराने लगी है ,

                                     शैल सिंह


Saturday, 3 September 2016

नई स्फूर्ति की मिश्री घोल रही है

'' नई स्फूर्ति की मिश्री घोल रही है ''


सोने वालों उठो नींद से आँखें खोलो
आलस्य उबासी छोड़ो मुँह तो धो लो ,

अँधेरे की तिजोरी अलकें खोलीं
देखो सप्तरंगों की खींच रंगोली
अम्बर ने बिखरा दी रोली
चले खेत किसान ले बैलों की टोली
बूढ़ी अम्मा मक्ख़न बिलोल रही है ,

धरा पे बिखरी सूरज की लाली
मन आभा मण्डल से हुआ विभोर
गहमा-गहमी हुई प्रारम्भ प्रात की
गह-गह फैली कृत्रिम छटा चहुँओर
हरियर दूब पे ओस ठिठोल रही है ,

हिम शिखर की चोटी चूम-चूम
स्वर्णिम ऊषा पट खोल रही है
प्रात की पहली रुपहली किरण
सिन्दूरी घूँघट से बोल रही है
नई स्फूर्ति की मिश्री घोल रही है

मंगल गीत सुना रहे हैं सुर में
दहियल,बुलबुल,कोयल,कलहांस
गुलमुहर पे छितरी लाली
पीली ओढ़नी ओढ़े अमलतास
चिड़ियाँ चह-चह किल्लोल रही हैं ,

दिन चढ़ आया रवि लाया देखो
नव जोश उजास की भरी टोकरी
तिमिर चीर फूट रहा उजाला
पुरईनियां खिल गईं ताल,पोखरी
पुरवईया झूर-झूर डोल रही है ,

दिन की सारी तेजी खोकर सूरज 
जाने कब गोधूलि में जाये समा
श्याम-सलोनी सन्ध्या आँचल फहरा
जाने फिर कब ले तुझको भरमा
समय ठगिनी तक़दीर टटोल रही है ,

नई सुबह लेकर आई है नई प्रेरणा
देने जीवन का तुझे अनमोल उपहार
समय अहेरी कर लो मुट्ठी में बंद
बुन लो अनुपम स्वपनों का संसार
जागो अवसर वरदान दे तोल रही है ।

                                  शैल सिंह



Friday, 26 August 2016

देखो अश्रु की धारा

दुश्मन बाज न आएगा
पतित है कभी बेशर्मी से
जला दो शत्रुओं की लंका
लहू की ख़ौलती गर्मी से ,

इतिहास के पन्नों में होगी
दर्ज़ तुम्हारे शौर्य की गाथा
चुका दो क़र्ज़ निभा के फ़र्ज
चूमें माँ गर्व से माथा ,

इक बलिदानी की विधवा
तुझी से न्याय मांगे है
यतीम बच्चे शहीदों के
तुझसे इंसाफ़ मांगे है ,

उन माँ-बाप के आँखों
में देखो अश्रु की धारा
जिनने ज़िगर का टुकड़ा
वतन की आन पे वारा ,

कोई बांका न जाये वार
रायफ़ल की दुनालों का
बहादुर तुम सिपाही हो
मिटा दो नाम नक़्क़ालों का ,

गिन-गिन शहादतों का
तुम्हें इंतक़ाम लेना है
तुम्हें सौगंध, बैरियों का
सर क़त्लेआम करना है ,

खतरा घर के गद्दारों, का
कम आंको न शमशीरों
पैलटगन संभाले रखना
सुरक्षा में तुम शूरवीरों ,

हायतौबा भले मच जाये
इसका गम नहीं करना
क़ौम के सब तुम्हारे संग
गिरह ये बांध कर रखना ।

                    शैल सिंह

Wednesday, 24 August 2016

फट गई ऐसा ब्रह्मास्त्र चलाया कि

           '' फट गई ऐसा ब्रह्मास्त्र चलाया कि ''


मोदी कर दिए ऐसी कारगुजारी ,बंध गई गिद्धों की घिग्घी सारी
होशो-हवास उड़ी है नींद बिचारी ,फट गई ऐसा ब्रह्मास्त्र चलाया कि ,

लाल किले के प्राचीर ने फोड़ दी है चिंगारी
पाकिस्तान में धुवां उठा है सुलग-सुलग जल रहा है नर संहारी
पासा उल्टा पड़ गया भारी , बंध गई गिद्धों की घिग्घी सारी
ईंट को पत्थर ने दिया करारी ,फट गई ऐसा ब्रह्मास्त्र चलाया कि ,

मोदी कर दिए ऐसी कारगुजारी ,घिग्घी बंध गई गिद्धों की सारी
होशो-हवास उड़ी है नींद बिचारी ,फट गई ऐसा ब्रह्मास्त्र चलाया कि ,

गिलगित,बल्टिस्तान का दिखा आईना ठोंका '' पीओके '' पे दावा 
घाव बहुत सहा है जालिम हमने फूट रहा भीतर का लावा
खुद के ही जाल में फंसा मदारी ,बंध गई गिद्धों की घिग्घी सारी
आगे देखो सुलूक हमारी ,फट गई ऐसा ब्रह्मास्त्र चलाया कि ,

मोदी कर दिए ऐसी कारगुजारी , बंध गई गिद्धों की घिग्घी सारी
होशो-हवास उड़ी है नींद बिचारी ,फट गई ऐसा ब्रह्मास्त्र चलाया कि ,

अभी तो केवल गरजे हैं जब बरसेंगे फिर क्या होगा
बदल दिया रक्षात्मक रवैया देखना अब तेवर का रंग क्या होगा
सिट्टी-पिट्टी करेंगे गुम तुम्हारी , बंध गई गिद्धों की घिग्घी सारी
हुई आक्रामक नीति हमारी ,फट गई ऐसा ब्रह्मास्त्र चलाया कि ,

मोदी कर दिए ऐसी कारगुजारी , बंध गई गिद्धों की घिग्घी सारी
होशो-हवास उड़ी है नींद बिचारी ,फट गई ऐसा ब्रह्मास्त्र चलाया कि ,

जम्मू-कश्मीर का राग न छेड़ गुलाम कश्मीर भी लेंगे हथिया
अपने घर की आग बुझा तूं बेमतलब न उधेड़ बेतुकी बखिया
किया विश्वपटल पे नक्शा जारी , बंध गई गिद्धों की घिग्घी सारी
अब उल्टी देख तूं चाल हमारी ,फट गई ऐसा ब्रह्मास्त्र चलाया कि ,

मोदी कर दिए ऐसी कारगुजारी ,घिग्घी बंध गई गिद्धों की सारी
होशो-हवास उड़ी है नींद बिचारी ,फट गई ऐसा ब्रह्मास्त्र चलाया कि ,

नरमी-नम्रता छोड़ दिया तेरे बार-बार उकसाने पर
चीन-फीन के बल पर उछल रहा तूं ठान लिया है मजा चखाने पर
कितनी बार किया है धूर्त गद्दारी , बंध गई गिद्धों की घिग्घी सारी
चुका दोहन की कीमत भारी ,फट गई ऐसा ब्रह्मास्त्र चलाया कि ,

मोदी कर दिए ऐसी कारगुजारी , बंध गई गिद्धों की घिग्घी सारी
होशो-हवास उड़ी है नींद बिचारी ,फट गई ऐसा ब्रह्मास्त्र चलाया कि ,

तूं कपटी अन्याय का पोषक हम शांति अमन के दूत
हम भारत माँ के महान सपूत तूं पापी पाक का पूत कपूत
फैलाता आतंक की है महामारी , बंध गई गिद्धों की घिग्घी सारी
देख क्या होगी हाल शिकारी ,फट गई ऐसा ब्रह्मास्त्र चलाया कि ,

मोदी कर दिए ऐसी कारगुजारी , बंध गई गिद्धों की घिग्घी सारी
होशो-हवास उड़ी है नींद बिचारी ,फट गई ऐसा ब्रह्मास्त्र चलाया कि ,

कभी भी अपनी दोगली हरकत से बाज नहीं जो आया
साम,दाम,दंड अपनाया जब ऊंट पहाड़ के नीचे आया
कश्मीरियों का बनता हमदर्द भिखारी , बंध गई गिद्धों की घिग्घी सारी
जुल्म-जिहाद-सितम का पुजारी ,फट गई ऐसा ब्रह्मास्त्र चलाया कि ,

मोदी कर दिए ऐसी कारगुजारी ,बंध गई गिद्धों की घिग्घी सारी
होशो-हवास उड़ी है नींद बिचारी ,फट गई ऐसा ब्रह्मास्त्र चलाया कि ।

                                                                      '' शैल सिंह ''

Tuesday, 16 August 2016

सत्य बोलना कड़वा होता है
झूठ बोलना पाप होता है
तो फिर बोलें  तो क्या बोलें
पाप वाला सच बोलें
या कड़वा वाला झूठ बोलें
नहीं ये मुझसे नहीं हो सकता
गर्दन पे आरी चले तो भी
हवा के साथ नहीं हो सकती ,

                         शैल सिंह
                 






आख़िर कब तक हम शहीदों के लिए मातम मनाते रहेंगे ,कब तक देश के लिए अपने सपूतों का बलिदान देते रहेंगे इसका निदान कब होगा ,इसका इलाज क्या है ,

                                                                                शैल सिंह 

Friday, 29 July 2016

अभिव्यक्ति की आजादी है इसीलिए अभिव्यक्त किया है


अभिव्यक्ति की आजादी है इसीलिए अभिव्यक्त किया 

हम चाँद पे झंडा फहरायेंगे क्षितिज का चाँद हमारा है
देख तीन रंगों के बीच चक्र अभिप्राय बड़ा ही प्यारा है ,

तूं झंडे पे चाँद के चित्र बना ध्यान रहे आधा अधूरा हो
आधे चाँद के बीच सजा बस एक ही टंका सितारा हो  ,

हवा नीर सब अपने सूरज पर भी अधिकार हमारा है
आस्मा सहित चाँद के जुगनूँ तारे सबपे राज हमारा है ,

जल जमजम का पीकर भी तेरे मन का सोता खारा है
यहाँ हर मन के सोते से फूटती पावन गंगा की धारा है ,

अपराध की फ़ेहरिस्तों से गदगद होता ख़ुदा तुम्हारा है
सद्गगुण सुमार्ग सत्कर्म से अभिभूत होता नाथ हमारा है ।

                                                 शैल सिंह 

Thursday, 28 July 2016

अपनों से ही ठोकर खाई

यह कविता उनके लिए जो परिश्रमी मेधावी होने के बावजूद भी लोगों के अन्याय का शिकार होते है ,फिर भी हारते टूटते नहीं ,गिर के फिर संभल जाते है अगली लड़ाई के लिये और पुनः संकल्प की टहनियों को संजीवनी दे पुनर्जीवित करते हैं मंजिल तक पहुँचने के हर प्रयास को ,बार-बार परास्त हो साहस को और शक्तिशाली बना विरोधियों को मजबूर कर देते हैं सत्य की ठोस जमीं पर उतरने को। संकटों में घिरकर भी लक्ष्य को सकारात्मक
बना लेते हैं सामर्थ्यवान की गलत नीति को धराशाई कर देते हैं और सत्य की जीत पर वो छलांगे भी लगा लेते हैं कभी-कभी ,जो भी कुर्सी का गलत उपयोग करते हैं उनके लिए भी मेरी ये कविता है ,किसी के पक्षपात के लिए किसी योग्य का अहित नहीं करना चाहिए ।



तूं भी कश्ती पे सवार है कश्ती मेरी डूबाने वाला
तूं भी धरती पे इंसान है भगवान नहीं कहलाने वाला
डर तूफां की मौन हलचल से ज्वार उफान पे आने वाला
ईश्वर की लाठी बेआवाज़ सुन वही तेरी औक़ात तुझे बताने वाला ,

इतना गुरूर हस्ती पे हस्ती ही सबक सिखाएगी
जिस चाबुक से किया वार अक्ल वही ठिकाने लाएगी
शब्दों के कोड़े जहर बूझे बरसा चैन करार है छीन लिया
क्यूँ पूर्वाग्रह से ग्रसित हिस्से का दिन का उगता सूरज लील लिया ,

देर है अंधेर नहीं तुझपे भी वक्त कहर ढहायेगी
तड़पा-तड़पा कर करनी का तुझे भी मजा चखाएगी
अपनों ने ही छला बहुत पग-पग अपनों से ही ठोकर खाई
धर्मपरायण हो भी भटक रही लड़नी पड़ी है हक़ के लिए लड़ाई ,

बहुत आँधियों ने तोला बहुत बवण्डरों संग खेला
दृढ़ इरादों की चट्टानें बदनीयत बलायें हिला ना पाईं
दीये की लौ का अडिग मनोबल हठी हवाएं बुझा न पाईं
सनकी लहरें औंधे लौट गईं लक्ष्य के साहिल से जब भी टकराईं ,

                                                         शैल सिंह

Tuesday, 26 July 2016

फर्ज बताने हम निकलें हैं


कारगिल दिवस पर 



अखण्ड भारत का अखण्ड दीप जलाने हम निकले हैं
करें हिन्द पर प्राणउत्सर्ग अलख जगाने हम निकले हैं
ज्योति से ज्योति बिखेरने की मुहीम पर हम निकले हैं
साथ कारवां का निभाने की अपील पर हम निकले हैं

जागो भारतवंशी एकता का हार पिराने हम निकले हैं
शहादतों का कर्ज उतारना फर्ज बताने हम निकलें हैं
ग़द्दारों की विकृत ज़मीर को धिक्कारने हम निकले हैं
रचनाधर्मिता की मशाल से तुम्हें जगाने हम निकले हैं

                                                  शैल सिंह 

Monday, 25 July 2016

क्या भाव हृदय के जाने



तूं पत्थर तेरा दिल पत्थर
क्या भाव हृदय के जाने
क्यों लहूलुहान विश्वास करे
कभी आस्था नहीं पहचाने
तूं पत्थर तेरा दिल पत्थर  .......।

मनकों की माला फेरूँ क्या
कैसे नाम रटूं तेरा जिह्वा पर
क्या पुष्पों का हार चढाऊँ
और क्या-क्या वारूं दीया पर
तूं पत्थर तेरा दिल पत्थर  ,,,,,,।

सच्चरित्रता,सत्कर्म ,ईमान ,कर्मठता का
गर तुझे देना फल घातक इतना
तो सन्मार्ग चलें क्यों फिर तेरे लिए   
जियें कुमार्ग पे चल जीवन अपना
तूं पत्थर तेरा दिल पत्थर  ........।

कितना धैर्य का लेगा इम्तिहान तूं
कितनी बार करेगा नाइंसाफी
भक्ति-भावना छोड़ दी अब तो
करले जितनी करनी वादाखिलाफी
तूं पत्थर तेरा दिल पत्थर  ........।

तेरी दिव्य दृष्टि किस काम की जब
उचित-अनुचित अनर्थ ना देख सके
तूं पाखंडी पाषाण की विकृत मूरत
होता कितना अन्याय ना रोक सके
तूं पत्थर तेरा दिल पत्थर  ........।

गर तेरी लाठी में दम है इतना
तो कर वार मेरे दुश्मन पर
जिसने इतना गहरा घाव दिया
कर बेआवाज़ प्रहार उस तन पर
तूं पत्थर तेरा दिल पत्थर  ......।



                     शैल सिंह

Saturday, 23 July 2016

     ग़ज़ल 

गुनहगार हूँ मगर बेकसूर भी हू

ज़माने की निग़ाहों का तीर सह सकी ना
मजबूर इस कदर हुई कर बैठी बेवफ़ाई

कभी आह भरती हूँ  कभी रोती बहुत हूँ
दर्द रात भर पिघलता  जाने कैसी बुत हूँ
अश्क़ गम के खातों में कसकती तन्हाई
मजबूर इस कदर हुई कर बैठी बेवफ़ाई

कभी फूल बन के तुम आते हो ख्वाबों में
कभी पलकों पर आ  बह जाते सैलाबों में
क्यूँ गुजरे ज़माने की महका जाते पुरवाई
मजबूर इस कदर हुई  कर बैठी बेवफ़ाई ,

अपनी ज़िन्दगी अपनी किस्मत ना बस में
भला कैसे निभाते हम वफ़ादारी की रस्में
जिधर फेरती निगाह दिखती तेरी परछाई
मजबूर इस कदर  हुई कर बैठी बेवफ़ाई ,

तिल-तिल कर मरती हूँ दिल की तड़प से
यह शमां जलती देखो ज़िस्म की दहक से
क़समें वादों का जनाजा क्या गाये रूबाई
मजबूर इस कदर  हुई कर बैठी बेवफ़ाई

बेगैरत मोहब्बत ना मेरे हमदम समझना
खुदा की कसम मुझको बेवफ़ा न कहना
बेपनाह मोहब्बत  की तुम्हें दे रही  दुहाई
मजबूर इस कदर  हुई कर बैठी बेवफ़ाई ,

तोहमत की बिजली न बेचारगी पे गिराना
जब भी दूँ सदा सुन फ़रिस्ता बनके आना
टूटा दिल का आबगीना फिर भरने रौनाई
मजबूर इस कदर  हुई कर  बैठी बेवफ़ाई

आबगीना --शीशा

                           शैल सिंह 

हम ऐसी जमीं के जांबाज सिपाही

                   उस दिन का इंतजार है जब कश्मीर पाकिस्तान बन जाएगा : यह कहना है Nawaz Sharif का.

हम ऐसी जमीं के जांबाज सिपाही 

कश्मीर तेरी प्यारी बहन है क्या जो ससुराल से विदा कराकर ले जाएगा
जीतनी बार भेजेगा लावलश्कर कंहार लाशों का ढेर शानों पे ले जायेगा

आ जा प्यारे तेरी आवभगत के लिए बेताब यहाँ गोले बारूद बरसने को
सीमा पे तैनात तेरे जीजाओं की बन्दूक भरी स्वागत में आग उगलने को

इत्ता वैराग भी ठीक नहीं पागलों अब कश्मीर राग अलापना दो भी छोड़
भीतर से खोखला है तूं कितना करना है तो कर भारत की प्रगति से होड़

अभी तो देखी तुमने केवल हमारी शराफत गर अपने पर हम आ जायेंगे
अभी वक़्त है चेत ले वरना तेरे घर में घुस ऐसी कहर क़यामत का ढाएंगे

इक-इक को चुन-चुन कर माँ की कसम कश्मीर का भैरवी राग सुनाएंगे
जो दहशतगर्दी फैला रखी भारत की जमीं पर उससे तेरा मुल्क जलाएंगे

पहले देख तूं अपने वतन की जर्जर हालत जो तेरी माँ उस पे तरस तूं खा
मत आँख उठाकर देख मेरी पावन धरा छिछोरेपन से कायर बाज तूं आ

अरे उचक्कों तुम्हारी नौटंकी का दृश्य देखने हम तैनात नहीं सीमाओं पे
हम ऐसी जमीं के जांबाज सिपाही जो जान लुटाया करते अपनी माँओं पे।

                                                                               shail shingh

    

Sunday, 10 July 2016

मत करो न साधना घायल मेरी

मंदिर-मंदिर चौखट-चौखट
दीया बाल कर रही याचना
नैवेद्य पुष्प की थाल सजाये
घण्टी बजा कर रही प्रार्थना ,

मन्दिर के परमपूज्य पुजारी
अर्जी देकर कह दो शिव से
भजन,कीर्तन में लीन निमग्न
कर जोड़े बैठी कबसे दर पे ,

मन तेरा द्रवित नहीं होता है
क्यों देख जगत की पीर प्रभु
हहाकार रुदन,चीत्कार नहीं
क्यों देता तेरा सीना चिर प्रभु ,

मांग अमन की भीख विकल
क्या ऐसा अपराध किया मैंने
सर्वत्र विराजमान तूं दयानिधे
क्यूँ नहीं देखता क़हर घिनौने ,

तुझे रिझाने को निठुर भगवान
जाने कितने उपक्रम कर डाले
नयनों से घटा बरसा-बरसाकर
अनगिनत बार फेरे हैं मैंने माले ,

क्या तुझे समर्पित और करूँ मैं
तेरा ये गर्वित रूप पिघलाने को
रीती गागर आँचल सूखा सावन
सिवा श्रद्धा ना कुछ बरसाने को ,

कहो ना चाँद से शीतल बनकर
दहक मिटा दे तपती धरती का
रजनी की चादर ना हो मटमैली
तृष्णा मुस्कान हरे ना जगती का ,

जलती सांसों पर बोल गीतों के
सुमधुर स्वर ताल में कैसे लाऊँ
ऊषा बदली बदले सभी सितारे
उलझे हालात मैं कैसे सुलझाऊँ  ,

मत करो न साधना घायल मेरी
ना अवहेलना अर्चन-वन्दन की
भगवन तूं तो अगम-अगोचर है
हृदय पीर सुनो हम भक्तन की ।

                            शैल सिंह






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Thursday, 7 July 2016

आखिर लिखूं तो क्या लिखूं

मुरझा से गए अल्फ़ाज मेरे
सुख गई मन की तलहटी
पैठ इनमें ढूँढूँ तो क्या ढूँढूँ 
कुछ आता नहीं दिमाग में
आखिर लिखूँ तो क्या लिखूँ ,

ताजी खुश्बुओं का झोंका
कब आकर चला गया
हुनर आशिकी का मेरे
कहाँ लेकर चला गया
सदा दूं तो किसको दूं
कुछ आता नहीं दिमाग में
आखिर लिखूं तो क्या लिखूं ,

अब न हाथ में आती कलम
ले भावों का सुन्दर समन्वय
ना ही दर्द देते शब्द कुछ
करूँ कागजों पे कोई बवंडर 
रिक्तता में भरूं तो क्या भरूं
कुछ आता नहीं दिमाग में
आखिर लिखूं तो क्या लिखूं ,

ऐसी तो न थी हालत कभी
कैसे तबियत बिगड़ गई
ऐसा हुआ क्या माजरा
फन से रंगत उतर गई
बैठी करूँ तो क्या करूँ
कुछ आता नहीं दिमाग में
आखिर लिखूं तो क्या लिखूं ,

ना वो मधुर पल-छिन रहे
ना सुहानी गुनगुनाती रात
ना उमड़-घुमड़ सौहार्द्र बरसे
ना स्वच्छन्द गूंजे अट्टहास
वक्त से कहूँ तो क्या कहूँ 
कुछ आता नहीं दिमाग में
आखिर लिखूं तो क्या लिखूं ।

                      शैल सिंह


Monday, 4 July 2016

द्रव तेरी आँखों का क्यों सूखा है रे जालिम

द्रव तेरी आँखों का क्यों सूखा है रे जालिम

बर्बर आतंकों से दहला हुआ है विश्व भी
ख़ौफनाक सायों में गुजरे सहमी जिंदगी

दहशतगर्दों के इरादों की अज़ीब दास्ताँ
इंसानियत को मार जी रहे कैसी जिंदगी   
बनके अमानुष गिराते रोज ही क्रूर गाज  
झुलसा रहे निर्दयता से दुनियावी जिंदगी 

मौत का बरपा क़हर पसरा हुआ मातम 
सांसों के अहसानों पर जी रहे हैं जिंदगी 
देख यह मन्जर मेरा होता है दिल घायल 
पी-पी के घूँट ज़हर का जी रहे हैं जिंदगी ,

यह कैसी सनक धुन है उपद्रव किसलिए
ऐसे खिलवाड़ से करोगे कबतक दरिंदगी
गर न ज़मीर जागा न फूटा सोता स्नेह का 
इक दिन तुम्हें भी लील लेगी तेरी दरिंदगी ,

हाय तुम्हारी हैवानियत को मैं क्या नाम दूँ 
जन्नतेहूर की ख़ाहिश बनाई सस्ती जिंदगी  
द्रव तेरी आँखों का क्यों सूखा है रे जालिम
तेरी बेरहमी बेगुनाहों की ले रही है जिंदगी , 

जिस ख़ुदा वास्ते बरपाता बेख़ौफ़ तूं कहर
वही ख़ुदा देख सुन रहा है मेरी भी बन्दग़ी
कभी न कभी फूटेगा ये तेरे पापों का घड़ा
हज़म तुझे भी करेगी हर आहों की बन्दग़ी ।

                                शैल सिंह



गुलाब से सीख

गुलाब से सीख 


तेरी सुवासित कोमल पंखुड़ियाँ
पर काँटों भरी टहनियाँ क्यों हैं    
ऐ गुलाब बता तेरे ताबों के संग
शूलों की इतनी लड़ियाँ क्यों हैं '



     

इन शूलों के भी बीच अकड़कर
कैसे सुर्ख सिंगार कर मुस्काता है
दुनिया को जरा यह रहस्य बता दे
शूलों में घिर कैसे सुगंध फैलाता है  ।

                                 शैल सिंह

Saturday, 2 July 2016

भले मैं नन्हा दीपक



कहाँ दीपक की दीपशिखा में दंभ तनिक भी बोलो तो
कहाँ दीपक के प्रज्वलन में है अहं तनिक भी बोलो तो ,

पर्व ज्योति का आया दीप बाल करें सिंगार तिमिर का
अन्तर्मन के तज विकार आओ करें सिंगार तिमिर का ,

मावस की काली रजनी जगमग वर्तिका की ज्योति से
आलस्य,कुंठा,भय,निद्रा मिटे दीप की अमर ज्योति से ,

चेतना का द्वार खोलता माटी का दीप जला अपना तन
अज्ञानता का तिमिर मिटाता दीप लुटा कर अपना धन ,

आकाश जुगनूओं से जगमग दीपों से झिलमिल धरती
साहित्य ,कला,संस्कृति ,ज्ञान दीपशिखा उरों में भरती ,

निज की आहुति दे नित दीपक पथ आलोकित करता
स्वर्ण शिखा सी ज्योति बिखेर संसार सम्मोहित करता ,

दीप जलाएं शिक्षा का मानवता का ऊर्जा भाईचारे का
नेह के घृत में चेतना की बाती तम मिटाऐं अंतर्मन का ,

अन्तर्मन की भावनाएं,संवेदनाएं प्रज्वलित करें प्रकाश
अभिव्यंजना दीप की तब सार्थक जब हिय भरें उजास ,

हमारी संस्कृति के रंग-रंग रचा-बसा दीपों का त्यौहार
आत्म ज्योति दीपित कर मनुज घर मन्दिर दियना बार ।

                                                    शैल सिंह 

महा नगर की एक झलक

महा नगर की एक झलक 

कैसा  ये महानगर  अजीब   इसकी दास्ताँ
ना  किसी  से  दोस्ती ना  किसी  से  वास्ता
ना  किसी से गल्प कोई ना  किसी से वार्ता
अजब सी आपाधापी बस पैसा रिश्ता नाता ,

बहुमंजिली  इमारतों  में  दुनिया  सिमट  गई
कबाट बन्द खिड़कियों में जिंदगी अटक गई
कोंतड़े सी बालकोनी में क्या क्या लटक गया
बित्ते भर के बारजे पर  सब कुछ ठिठक गया ,

कहते शान से बी.एच.के.महंगा है बड़ा दाम
महल  लगे ना हवेली अपार्टमेंट  फ्लैट  नाम
इससे इतर तो  मुर्गी का दड़बा  कहीं बेहतर
फ़ितरत तेरी इंसान कबूतर से भी बदतर ,

अंगना नहीं कि तुलसी का चौरा बना सकें
फुदक   रही   हों  गौरैयें  दाना  चुगा  सकें
दूध भात का कटोरा ले  लालच से बुला के
छज्जा  नहीं  मुंडेर  कि  कागा  उड़ा  सकें ,

कोठा नहीं अटारी निशां मोनियाँ काश का
हिफाजत से रखें आजी का संदूक काठ का
इतने  सहन  में  घूरों का  साम्राज्य  गाँव  में
यहाँ संम्हल के चलूँ ठोकर लगते है पाँव में ,

रिश्तों भरा परिवार है पल पल दरक रहा
न्यूक्लियर परिवार  का  चलन है  बढ़ रहा
पुस्तैनी बाप-दादा की विरासतें है ढह रहीं
वक्त की आंधियों में पंगु  इन्सान बह रहा ,

अजनवी  लगें  यहाँ  जाने-पहचाने  लोग भी
त्यौहार ,पर्व  बेमाने , बेमानी  लगे  सोच  भी
कहाँ वे छप्पन भोग कहाँ व्यंजनों की खुश्बू
फास्टफूड,मैगी.पास्ता पे  स्वाद हुआ लडडू

फर्नीचरों में तब्दील जंगल और बाग़ हो गए
उजड़ रही हैं बस्तियां शहर आबाद हो गए
बुलबुलों की वाटिका लानों की शान हो गयीं
पक्षियों का कलरव वाहनों की खान हो गयीं ,

चित्रों में  दिखती बस महादेवी की गिलहरी
कहाँ खेत औ खलिहान जहाँ बोले टिटहरी
उंगलियाँ जो पकड़ती थीं तितलियाँ जुलाहे
अब वो माउसों से खेलतीं टी.वी, पर निगाहें ,

अब पपिहरा की पिक कहाँ चाँद की चकोरी
सखी से कहाँ पाती  अब लिखाती कोई गोरी
अब कहाँ विरहन कोई जो छुप के चोरी चोरी
डाकियों की झरोखों से देखें साँझ भोरे खोरी ,

कभी झुरमुटों के पीछे  पिछवाड़े का ठिकाना
प्रिय से मनचली के मिलने का होता हो बहाना
यहाँ शर्मोंहाया का परदा निग़ाहों से गिर जाना
रास कैसे होता खुलेयाम  बेशरम हुआ जमाना,

कैसा है ये महानगर ……।

मोनियां काश का --सरपत,मूंज का बना हुआ ढक्कन वाला मोना ,
                                        सिंगार का  रखने का पिटारा
घूरों का साम्राज्य --कूड़ा कचरा फेंकने की जगह

                                                       शैल सिंह 

Wednesday, 29 June 2016

तुम याद बहुत आए

जब-जब कोकिल ने गान सुनाए
और चटक चांदनी उतरी आँगन 
जब-जब रंग बिखेरा इन्द्रधनुष ने
और जब आया पतझड़ में सावन 
         तब-तब प्रियतम तुम याद बहुत आए ,

जब-जब जग ने तंज कसा मुझपे 
मन के सन्तापों पर किया प्रहार 
माथे की शिकन पर गौर ना कर 
दुःखती रेखाओं को दिया झंकार 
         तब-तब प्रियतम तुम याद बहुत आए ,

उन्मद यौवन की प्यासी आँखों ने
कभी उर में तेरा अक्स उतारा था
ख्वामखाह हुई बदनाम निगोड़ी रे
जब देख के चढ़ा जग का पारा था
        तब-तब प्रियतम तुम याद बहुत आए ,

हर जीवन की होती एक कहानी
किसी के छंट जाते बादल बेपरवा
जबकि यहाँ धुला दूध का ना कोई
जब आईना मुझको दिखाया गया
        तब-तब प्रियतम तुम याद बहुत आए ,

जब-जब दामन पर कीच उछला
मेरे  पाप-पुण्यों  पर उठा  सवाल
औरों की करतूतें तो गुमनाम रहीं
जब मन के ठोकर पर मचा बवाल
         तब-तब प्रियतम तुम याद बहुत आए ।

                                         शैल सिंह

Wednesday, 8 June 2016

अभी हल करना काम बहुत है बाकी


अभी तो पग हैं धरे डगर पे
चलना दूर बहुत है बाकी
सफर अभी तो शुरू हुआ है
तय करना सफर बहुत है बाकी
अल्प समय में कर दिया बहुत कुछ
अभी करना काम बहुत है बाकी
पल-पल का अभी हिसाब क्या दूँ
अभी हल करना काम बहुत है बाकी
सबका साथ सबका विकास हो
बस हाथ में हाथ मिलाना साथी
घर में रोशनी की बहुत जरुरत
तुम सब दीया बनो जलूं मैं बन बाती
अभी विश्व फ़लक पर नाम है चमका
अभी भारत को स्वर्ग बनाना बाकी

                          शैल सिंह


Sunday, 29 May 2016

आँखें खोलो पथभ्रमितों

सीमाओं पे डटे सिपाही कभी भेदभाव नहीं करते
जान जोख़िम में डाल अपना महफूज़ हमें हैं रखते

परवाह न करते मौसम की धूप,ताप गलन हैं सहते
माँ रज की धूलि तिलक लगा हमवतन वास्ते लड़ते

जो कश्मीर का सुर अलापे जुबां काट रखें हाथों में
कभी ना आना भाई मेरे कैसी भी बहकाई बातों में

राम ख़ुदा में बांटा किसने क्यों नहीं समझ में आता
क्यूँ नहीं इस माँ के लिए हृदय में कोई भाव जगाता

जो माँ आत्मसात की आँचल में सदा तुम्हारा जीवन
उस माँ के लिए भरा क्यों मन में बदबू सा है सीलन

आँखें खोलो पथभ्रमितों दूजी 'जहाँ' की देखो तस्वीर
जहाँ इन्सानों का मोल नहीं खींची हुई देखो शमशीर

हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई का ये देश पुरातन भारत
यहाँ सभी धर्मों का आदर होता देश सनातन भारत

मत करो बगावत माँ से नहीं जहाँ में कोई ऐसा देश
जहाँ स्वर्ग उतर के स्वयं हिन्द का चूमा करता केश

भेदभाव,मतभेद मिटा भाईचारे की अलख जगाओ
हम हिंदुस्तानी एक कुटुम्ब हैं मत दहशत फैलाओ ।

                                               शैल सिंह






Wednesday, 25 May 2016

किसने किस्तों में लूटा है देश सबको है पता

           " नमो-नमो को समर्पित "




[ १ ]

ऐसा कोहिनूर हीरा कभी ना मिलेगा
अरे देश वालों क़दर करना जानों
सत्ता की लोलुपता में मसीहा ना नकारो
महान इस विभूति की शिखा तो पहचानो
अंतर्मन के द्वार खोलो और देखो उजाला
क्यों तमस का आँखों पे परदा है डाला
जिसने विश्व की जुबान पे हिंदी हिंदुस्तान का
फूंक दिया है मन्त्र अपने गीता और पुराण का ।

[ २ ]

सियासत के दांव-पेंच से उतर रहा नशा
बदल रहा है देश और सुधर रही दशा
गा रहीं फिजाएं मुस्करा रही दिशा
छंटी मन पे छाई बदरी दीप्त हो रही निशा
बहारों को भी भा गई खिज़ां की हर अदा
नदी,बावड़ी,तालाब हुईं कंवल-कंवल फ़िदा
किसने किस्तों में लूटा है देश सबको है पता
किसके चमके हुनर पे है विश्व दे रहा सदा ।

                                   शैल सिंह


Tuesday, 24 May 2016

नमन तुम्हें नन्हें ज्योतिर्मय दीपक


नमन तुम्हें नन्हें ज्योतिर्मय दीपक



निर्जन रजनी का तूं पथप्रदीप है
अन्तर्मन आलोकित करने वाला
जगमगाता दीप तूं पर्व पुनीत है

चाहे जितने जुगनूँ तारे चमकें
बजता हो आसमां में डंका चाँद का
पर दीपक की परिभाषा अभिन्न
तमकारा चीर सुख देता आनंद का

हरने को तिमिर का तुम्हें पीर हर
जलना दीपक तुम्हें निरन्तर
लिखा बदा में मालिक ने तेरे
नहीं सुस्ताना कभी भी पल भर ,

तुम द्वैत-अद्वैत के मिलन के दीपक
तुम्हीं हो तम् के वाहक दीपक
तुम्हीं हो मन के साधक दीपक
नमन तुम्हें नन्हें ज्योतिर्मय दीपक ,

बिन तेरे हर अनुष्ठान अधूरा
तुम बिन हर विधि-विधान अधूरा
तुम ही धरती के अमरपुत्र हो
हे माटी के राजवंश तुम जीवनसूत्र हो ,

माटी गुण से जीवन परिपूरित तेरा
सारी रात तपा देह नेह आलोक विखेरा
जग का तमस निगल सलोने तूने
दिया सूर्योउदय के हाथ सिन्होरा ।

                           शैल सिंह

Friday, 20 May 2016

मृत आत्मा में फूंकनी अँगड़ाईयाँ तुम्हें


" देश के नौजवानों के लिए मेरी ये जोशीली कविता " 


जागो  नौजवानों  देश के,अबेर न  हो जाये
भरके जोश-ज़िस्म खूने-जुनूँ देर न हो जाये ,

देर   न    हो    जाये   कहीं    देर   न  जाये
खेत चुग जायें चिरईयां  हाथ बटेर रह जाये ,

देखो स्वप्न अखण्ड देश के,सवेर न हो जाये
भर  शिरा   में   गर्म  लहू   देर  न  हो  जाये ,

देर   न    हो   जाये    कहीं    देर   न  जाये
खेत चुग जायें  चिरईयां हाथ बटेर रह जाये ,

कहीं  लग  न  जाये आग  घर  के चराग़ से
खा  न  जाएँ  मात जयचन्दों  के  जमात से
वहशी आँधियाँ बहा न लें अपने मिज़ाज से ,

जागो नौजवानों  देश  के,अबेर न  हो जाये
भरके जोश-ज़िस्म खूने-जुनूँ  देर न हो जाये ,

मृत  आत्मा  में   फूंकनी  अँगड़ाईयाँ  तुम्हें
अभी  विश्व की भी मापनी  गहराईयां  तुम्हें
छूनी उड़ के आसमा  की   ऊँचाईयाँ   तुम्हें ,

जागो  नौजवानों  देश के,अबेर न  हो जाये
भरके जोश-ज़िस्म खूने-जुनूँ देर न हो जाये ,

तुम्हें   गगन  को   भेदना   चट्टान    छेदना
विकराल  हवा  बनकर  शोलों  से  खेलना
वक्त दुश्मनों की माद में ताकत है झोंकना ,

जागो  नौजवानों  देश के,अबेर न  हो जाये
भरके जोश-ज़िस्म खूने-जुनूँ देर न हो जाये ,

वश में हो  सूरज जगा  जन-जन  में  हौसला
फौलादी  सीना  देख  दुश्मन  जाएं  बौखला
जमीं  से  पाताल  का तय करना  है फासला ,

जागो   नौजवानों  देश के,अबेर न   हो जाये
भरके जोश-ज़िस्म  खूने-जुनूँ देर न हो  जाये ,

शांतिवाद का हम पाठ पढ़ बलिदान बस हुए
छाती  पे  मूंग   दल - दल  हैवान   सब   हुए
अस्त्र   हाथ  में  उठा जला  उत्थान  के  दीये ,

जागो  नौजवानों   देश के, अबेर  न  हो  जाये
भरके  जोश-ज़िस्म  खूने-जुनूँ  देर न हो  जाये ,

रुकने   न    पाए  कारवां  कभी  तूफान   का
जलता रहे सतत मशाल दिल में अभियान का
कहीं आँधियाँ न रोक लें राह ऊँची  उड़ान  का ,

जागो  नौजवानों  देश  के, अबेर  न  हो  जाये
भरके  जोश-ज़िस्म  खूने-जुनूँ देर न  हो  जाये ।

                                             शैल सिंह






Tuesday, 3 May 2016

देशद्रोहियों की मति गई है मारी का


जहाँ सुबह होती अजान से कान गूंजे हनुमान चालीसा
जिस धरती पे राम-रहीम बसते गुरु गोविन्द और ईसा
जहाँ हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई में भाई-भाई का नाता
जहाँ की पवित्र आयतें बाईबिल ग्रन्थ कुरान और गीता ,

हम करते हैं नाज़ जिस वतन की नीर,समीर माटी पर
हम करते हैं नाज़ जिस चमन की सुवासिता ख़ुश्बू पर
जिसकी आन वास्ते शहीद हुए न जाने कितने नौजवाँ
उस मुल्क़ के मुखालफ़त गद्दार हुए बदजात बद्जुबां ,

पतित पावनी धरा पर भूचाल मचाया उपद्रवी तत्वों ने
अभिव्यक्ति की आज़ादी में पाजी अक्ल लगी सनकने
भारत के टुकड़े होंगे कहते हैं कश्मीर नहीं भारत का
बेलगाम नामुराद देशद्रोहियों की मति गई है मारी का ,

                                            शैल सिंह

इक दिन बिखर जायेगा तूं कन्हैया दहर में
देखना टूटे हुए जंजीर की कड़ियों की तरह
उठेंगी दश्त में घृणा भरी निग़ाहें बस तुझ पर
सुनोगे आवाज़ें हिकारत की चिमनियों की तरह  ,

अरे हम नहीं ख़ामोश बैठने वालों में से हैं
वामपंथियों की हवा निकालने वालों में से है
ये खुशबयानी और ख़ुशख़यालियाँ पाले रखो
नहीं तुम्हारे मंसूबे क़ामयाब होने देने वालों में से हैं ,

हम सदा मोहब्बत बांटने की बात करते है
कुछ लोग अहले सियासत की बात करते हैं
हमारा पैग़ाम सवा सौ करोड़ देश की जनता को है
चलो देशद्रोहियों को मुल्क से खदेड़ने की बात करते है ।

                                                             शैल सिंह
  

Sunday, 1 May 2016

आतंक की घृणित विभीषिका पर मेरा अंतर्द्वंद


नित देख जगत का आहत दर्पण
पन्नों पर मन का दर्द उगलतीं हूँ
कब होगा जाने जग प्रफुल्ल अब
सोच कविता में मर्म विलखती हूँ ,

काश व्यथित करतीं शोहदों को
आतंक की चरम घृणित क्रीड़ाएं
कोई मुक्तिदूत बनकर आ जाता
हर लेता जग की क्रन्दित पीड़ाएँ ,

कभी गर घोर निराशा के क्षण में
कहीं से छुप झांक पुरनिमा जाती
पुनः अगले पल कुछ घट जाता रे
जैसे ही सुख भर पलकें झपकाती ,

जब-जब हँस उषा की लाली देखा
कलह की सुख पर चल गई आरी
फिर काली निशा हो गई डरावनी
सुनकर कुत्सित षड्यंत्र की क्यारी ,

उठती भाटे जैसी हिलोर हृदय में
व्यूह तोड़  लहरों में बह जाने को
जग का दुर्दिन हश्र देख मचलता
विवश कंगन कटार बन जाने को ,

अलग-अलग भावों का रुख होगा
गर आपस में ही लड़ते रह जायेंगे
जो भी आदि बची हा दीन दशा में
कलुष विद्वेष सोम विष कर जायेंगे ,

मची कोलाहल सुरभित जीवन में
सर्वत्र चीत्कार रही गलियाँ-गलियाँ
भय से भूल गए खग पक्षी कलरव
उषा दहशत में निर्वाक सी दुनियाँ  ,

खलल शांति अमन को निगल गई
डोलते निर्जन नीड़ों में चमगादड़
नभ कण भी बरसा रहे अश्रु बिंदु
मची हुई चहुँदिशा भीषण भगदड़ ,

यदि बस में होता गर कुछ भी मेरे
भरती जग आँचल सुख का सागर
मिटा तमिश्रा उर-उर की,धर देती
अधरों-अधरों किसलय का गागर ,

सुख समरसता ठिठक गई मानो
पथभ्रष्टों की निर्भीक निर्दयता से
हो रही प्रकम्पित धरणी,अणु भी
मस्तिष्क की दुर्भिक्ष दानवता से ,

विक्षिप्त मानसिकता की जद में
जगत की दिनचर्या धधक रही है
लगता बहुत अनर्थ है होने वाला
निर्बाध दाईं आँख फड़क रही है ,

चैतन्य हो जाओ अरे सोने वालों
नव प्राण फूंकना मृत स्पंदन में
समता की करनी है मुखर वाणी
शंखनाद गूंजे निस्सीम गगन में ,

बेवजह दहक रही दुनिया सारी
आतंकवाद की भीषण लपटों से
कहीं 'तू-तू ' 'मैं-मैं' के विलास में
मिट ना  जाएँ आपसी कलहों से ।

सोम--अमृत

                               शैल सिंह 
















Tuesday, 15 March 2016

भईल बा बदगुमानी कन्हैया

'' भोजपुरी में मेरी ये कविता ''

केकरा सह पर भईल बा एतना शानी
बोलेला बदजुबानी कन्हैया
निर्लज्ज मजमा लगा के नौटंकी खानी
भईल बा बदगुमानी कन्हैया ।

बोली सुन उबाल आवे मन करे गर्दन मरोड़ीं जाके
तमाशबीनन के सठिअइले पर देईं लताड़ जाके
काहे बढ़-चढ़ के बोलेला हरामी
भइल बा अभिमानी कन्हैया ।

सहकी-सहकी बोले चहकी-चहकी बोले
हरजाई जोकर लागे भांड जस मुंह खोले
वेमुला के आदर्श माने हिन्द के अपमान पर
सेना के बदनाम करे आतंकिन के सम्मान पर
एकरा ऐंठन पर फेरे के होई पानी
भईल बा बदगुमानी कन्हैया ।

पड़ोहा क ई मच्छर बाटे फैलाई महामारी
ऑपरेशन जरुरी इन्फेक्शन से होइ बेजारी 
लुच्चा कहेला भारत के टुकड़ा-टुकड़ा होई
घर-घर में कहेला भड़ुवा अफजल पैदा होई
सनपाति के बोलेला आनी-बानी
भईल बा बदगुमानी कन्हैया ।

अभिव्यक्ति क अजादी मांगे भारत क बरबादी
देश के जगा दिहले पगला तूं कही के मनुवादी
देशप्रेम क उमड़ल सोता जागल सगरो जनता
मिटा के भेदभाव सबमें भईल बा अजब समता
दोगलन पे करिहा मत मातृभक्त मेहरबानी
भईल बा बदगुमानी कन्हैया ।

देशभक्तन के फुटल बाटे अंगे-अंग गुस्सा
तबों नाहीं बाज आवे केतना बदजात टुच्चा
हिन्द क अपमान करे भारत के मुर्दाबाद कहे
आतंकियन के संगे मिली पाक जिंदाबाद कहे 
गद्दारन क खैर नाहीं सब लिये मन में ठानी
भईल बा बदगुमानी कन्हैया ।

वामपंथी चोला पेन्हि के निठल्ला बनि भीख मांगे
गरीबी भूखमरी के ककहरा पे बेतुका गोला दागे
अरे घर-घर के अफजल के हर-हर सेनानी सुन
लगइहें ठिकाने बच्चा-बच्चा लेहले मन ठानी सुन
डाली के मुश्किल में सगरी जिंदगानी
बेलगाम बोले अभिमानी कन्हैया ।

पड़ोहा--नाली   ,  सनपाति ---पगला कर

                                                  शैल सिंह 

'' बहुत प्यारी हमको अपनी सरज़मीं ''

'' बहुत प्यारी हमको अपनी सरज़मीं  ''

जाविदाँ ,जहाँ आफरीं हिन्द मेरा वतन
जहाँगीर जाविदाँ मेरा ज़न्नत सा चमन
नहीं ऐसा जहाँपनाह कहीं भी जहाँ में
सारा जहाँआरा बाअदब करता नमन ,

जाके देखो जहांगिर्द नहीं कहीं पाओगे
ऐसा जमील अौ जमाल है गुलशन मेरा
ज़फ़ा जालसाजी छोड़ो ना गद्दारी करो
जवान स्वालिह बनो मत किताली करो ,

आँखें दिखाने की जुर्रत ,जसारत करो
ना वतन से मेरे जुलसाजी,गद्दारी करो
पल में करेंगे जिलावतन सुनो काफिरों
हम जाँनिसार वतन  पर सुनों जाहिलों ,

हम जाविरों को कभी माफ़ करते नहीं
हम हैं कितने जलाली ये जरा जान लो
हम हैं जाबांज जब्बार करने लेने वाले
छोड़ो  जब्र जबरन कहा जरा मान लो ,

जम्हूरी सल्तनत नहीं हिन्द जैसी कहीं
मेरे भारत माँ की जन्नत सी है सरजमीं
जवाँ दौलत,जवाहरों का मेरा ये देश है
जवांसाल,जवाँमर्दों का यहाँ समावेश है ,

जाविदाँ --शाश्वत ,अविनाशी
जहाँआफरीं --संसार को रचने वाला
जहाँगीर--चक्रवर्ती ,विश्वविजयी
जहाँपनाह--संसार की सुरक्षा करने वाला
जहाँआरा--संसार प्रशंसक
जहांगिर्द--दुनिया भ्रमण कर
जमील अौ जमाल--मनोहारी सौन्दर्य
जफा--अत्याचार  , जवान स्वालिह--नेक इंसान
किताली --रक्तपात,युद्ध
जसारत --दुस्साहस ,धृष्टता
जुलसाजी--धोखेबाजी , जिलावतन---देश निकाला
जाँनिसार---जान न्योछावर ,  जाविरों---अन्यायी ,अत्याचारी
जलाली --प्रतापी शान वाला ,  जब्बार--विजय प्राप्त
जब्र ज़बरन --जोर,जुल्म,उत्पीड़न
जवांदौलत जवाहरों--ऐश्वर्यवान ,रत्नमणि
जवांसाल,जवाँमर्दों---नवयुवा,साहसी,हौसलामंद  ।

                                                  शैल सिंह