Tuesday, 25 August 2015

तूं कितना कंजूस है भगवन तुझसे बहुत शिकायत है
क्यों मेरे लिए ही हर जगह करता इतनी किफायत है
मैंने भी तो मंदिर-मंदिर जा तुझको था परनाम किया
तेरी दहलीज पर मत्था टेक चरणामृत का पान किया
मैंने भी फल,मेवे थाली भर-भर तुझे भोग लगाया था
अक्षत,रोली,धूप,अगर,चारों कोणों में दीप जलाया था
गोमाता के शुद्ध क्षीर से हर-हर बम-बम नहलाया था
चालीसा औ महामंत्र पढ़ बस तुझमें ध्यान रमाया था
दान,दक्षिणा दे द्विज को भी श्लोक,मन्त्र,पढवाया था
घंटियों की कर्कश ध्वनियों से कितनी बार जगाया था
नयनों की अविरल धार से कितनी बार अभिषेक किया
निर्निमेष कर जोड़े भाव से,पर तूने क्या पारितोष दिया
रत्ती भर भी भान नहीं था भगवान घाघ  घूसखोर भी है
मोटे असामियों के लिए लगा देता ताकत पुरजोर भी है
मैंने तो अपनी सामर्थ्य और क्षमता तुझपे खूब लुटाया
पाषाण की बेजान मूरत क्यों पग-पग मुझको भरमाया
प्रभु तेरे नाम से  मेरी भोर हुई तेरे नाम से ही मेरी शाम
सुबह,शाम गंवाया क्यूँ मैंने आरती,वन्दन में निष्काम
कभी चाँद,सितारे तो मांगी नहीं ना ही मांगी आसमान
छोटे-छोटे सपनों के सजे थे कुछ मेरी आँखों में अरमान
छली गई आस्था मेरी सिरे से ठगा गया अपार विश्वास
तुझे क्षमा नहीं करुँगी दम्भी जब तक लेती रहूंगी श्वांस
बची खुची उम्मीदों पर थोड़ी सी अपनी कृपा बरसा देना
ओ पत्थर के निठुर देवता अभिलाषा के फूल खिला देना ।

                                                       शैल सिंह