Saturday, 11 April 2015

कश्मीर पर कविता। " तूं ख़ूबसूरत बाग़ हिंदोस्तां बागवां तुम्हारा "

ऐ कश्मीर तेरी वादियों में ज़न्नत का नूर है
अखण्ड भारत का सरताज तूं कोहिनूर है ,

ग़र ये वतन है मेरा तो वो जान है वतन की
ग़र ये वदन है मेरा तो वो प्राण है वदन की
ग़ैर की निग़ाह से सच हमने कभी ना देखा
ग़र कहीं है स्वर्ग तो तेरी धरा पे है गगन की ,

ग़र वो बिछड़ गए तो हम जी के क्या करेंगे
साथ-साथ हम रहेंगे संग जिएंगे और मरेंगे
कभी विलग की हमने तो ख़्वाब में ना सोचा
बिन तेरे अखंडता की कैसे आहें भरा करेंगे ,

वो फूल भी क्या फूल जो चमन में ना खिले
वो फूल शूल सा लगे जो सहरा से जा मिले
तूं ख़ूबसूरत बाग़ है यह देश बागवां तुम्हारा
प्रेमांकुर उगा लें मन में हम गले से आ मिलें।

                                     शैल सिंह

देवी उपाधि नहीं मन भाती


जब-जब होती हूँ तनहा 
काटे कटता नहीं जब लमहा
तब-तब कलम सखी बनकर
शब्दों का जामा जाती पेहना  ।

मेरे अनुरागी मानस पर
जब वैराग औ राग उफनते हैं
आँखों के आँसू स्याही बनकर
अंतर का दर्द उगलते हैं ।

नारी शब्द से नफ़रत होती है
अबला नाम से होती घृना
बंधन बिंदिया,पायल,कंगन
ताक़त इनसे होती बौना ।

त्याग,तपस्या,ममता की मूरत
देवी उपाधि नहीं मन भाती
वात्सल्य की मोहरा बन नारी 
बैरी जग से छली है जाती ।

तुझे दुवा दे या करे शुक्रिया अदा
बता ऐ अपराधी,अन्यायी ख़ुदा
आँचल में दूध औ आँख में पानी
क्यों लिखी उसकी ही ऐसी बदा ।

बाँहें पालना अङ्क सुखों की शैय्या
जिसकी गोदी में सुखद बसेरा
दिन-रात जली जो दीपशिखा सी
अंतस में क्यों उसके गहन अँधेरा ।

                                              शैल सिंह