Tuesday, 29 December 2015

हरियाई लगे है मुरझाई लता द्वार की


भटकता हुआ कहां आया तूं अजनबी 
हूर का दीदार करने हीर की इस गली ।

तेरी निग़ाहों ने ऐसा क़तल क्यों किया
कि जिबह होते गए दिल के रुतबे मेरे
हाथ खड़े कर दिए रसूखी प्रहरी सभी 
टूटते गए इख़्तियार के सभी क़ब्ज़े मेरे ।

तुमने दीदा से दिल का हरफ़ पढ़ लिया
नाम अपने वसीयत ज़िगर की लिखाई
जादूई रंग भर दिया खाली कैनवास में
कि हाथ मैंने मोहब्बत की मेंहदी रचाई ।

कोई इबारत पढ़े आँखों में महबूब की
दुनिया से कटकर फ़र्लांग भरने लगी हूँ
जमीं पर चांद गगन से उत्तर आया लगे
सूत हसरतों के दिन-रात बुनने लगी हूँ ।

चुपके आके पवन कान कुछ कह गई
हरी लगने लगी मुरझाई लता द्वार की
भर लिया फाग का रंग ओढनी में सब
छू रहा अम्बर चरन पूछ पता प्यार की ।

ज़माने की परवाह पीछा ना करती रहे
तोड़ आई रिश्ते सभी पाषाणी नगर से
छोड़कर दास्ताँ किस्मत की लकीरों पे
अस्त सूरज के पहले चली आई घर से ।

चोरी के अब तक पड़े हैं जालिम निशां
तूने सेंध सीने में आंखों से लगवाई जो
देख वदन की उधेड़कर के चिन्गारियाँ
जिस्म की हंडियां अदहन खदकाई जो ।

उन टहनियों जिनपे नैनों की आरी चली
खैर-ख़ैरियत से बौर और पत्ते खिला दो
समेट बांहों में जमाने की तोहमतें सनम
चरमराती पसलियों की दुनिया बसा दो ।

                                    शैल सिंह




Saturday, 26 December 2015

'' एक हमारा कल था ''


आज उलझकर बचपना बस किताबी हो गया
हाथों में मोबाईल टैबलेट ठाठ नबाबी हो गया ,

          '' एक हमारा कल था '' 

अभी तक है याद ताज़ी मौसम गुलाबी गाँव की
छपाछप खेलना बरसातों में कागदों के नाव की ,

भोर की सुनहरी किरणें ढलती सुहानी शाम की
नीम ,बबूल की दातून  सेंक सर्दियों के घाम की ,

चिंड़ियों की चहचहाट कागा के कांव-कांव की
नित्य भिनुसार नमन करना बुजुर्गों के पांव की ,

बसंती हवा की झरकन बरगद के घने छाँव की
सोंधी महक माटी की गन्ध बचपन के ठाँव की ,

ओसारों में डलीं खाटें लुत्फ़ चाँदनी के रात की
यादें बहुत हैं रूलाती गुज़री घड़ियों के बात की ,

संयुक्त परिजनों का क़स्बा दादू के चौपाल की
पक्के कुंवना का पानी चने,अरहर के दाल की ,

कच्चा रस, मटर की घुघुरी सरसों के साग की
वो स्वाद चोखा भऊरी पके गोहरे के आग की ,

चिन्ता फिकर ना जिम्मा न जहमत जवाल की
गुडे्-गुड़िया याद झूला वो निमिया के डाल की ,

लड़कपनी कुलांचें सखियां,अमुवा के बाग़ की
याद आती लगी कुर्ती आम,जामुन के दाग की ,

घर के विशाल अहाते,चौबारे में किये राज की
सिमट गयी हा ज़िन्दगी दो कमरों में आज की ,

अजीब आबो-हवा शहरी,काम की न काज़ की
लूटी जाये रोज आबरू बहन-बेटी के लाज की ,

                                              शैल सिंह 

Tuesday, 22 December 2015

नारी मर्म न जाना पुरुष जगत तुम ताक़ीद किया नारी धर्म निभाने की ,

नारी मर्म न जाना पुरुष जगत तुम
ताक़ीद किया नारी धर्म निभाने की ,    

कब झांक के अन्तर्मन देखा तुमने
जिसकी कितनी सागर सी गहराई                      
झाग सी उठती लहरें देखीं,ना देखी
शान्त,स्निग्ध सलिला क्यों बौराई ,

बोलो कब ज़िद की थी मैंने तुमसे
देदो ना लाकर मुकुट हिमालय का
बोलो कब चाहा देवी की मूरत बन
मूक शोभा बनकर रहूँ देवालय का ,

मुझे बांध कर तुमने वर्जनाओं में
लक्ष्मण रेखाएं खींच रखी कितनी
तुमने जकड़ परिधि के जंज़ीरों में
मेरी तय कर दी सीमाएं हैं कितनी ,

क्या मर्यादायें क्या संयम की तुम
हरदम मुझे बतलाते रहे परिभाषा
छल करते आये ओढ़ कर आवरण
नहीं जानी मन की क्या अभिलाषा ,

मैंने द्विज के वचन निभाए सातों
सच्चे बन्धन में खुद को रखे बाँधा
फिर भी अग्नि परीक्षा लेकर क्यों
सतीत्व का तुमने प्रमाण था माँगा ,

मैं तो सम्पूर्ण समर्पित वामांगी बन
जीवन सेवा के यज्ञकुंड में स्वाहा की
तुम अग्निसाक्षी नियम ताक़ पे रखे
मैं तन जला दीया सी देहरी आभा की ,

खुद लगा मुखौटा मुख हजारों रंग के
उड़ाई मेरे अटल विश्वास की धज्जी
व्यर्थ ही पूजती रही तुझे देवतुल्य मैं
अस्तित्व बना दिया कागद की रद्दी ,

लूटा दी ममता,स्नेह की चिर तिजोरी
लूटा दिया वात्सल्य का सारा संसार
बहाकर प्रेम की अतल,अथाह नदी मैं
ढूंढ़ती फिर रही हूँ पूरे जीवन का सार ,

                                  शैल सिंह




Monday, 21 December 2015

माँ लौट आऊँगा जब भी दोगी सन्देश






संग ले गया वह घर की रौनक़ें सारी
बुढ़ापा संग सांय-सांय करे फूलवारी,

सावन भादों सी झर-झर बरसें आँखें
जबकि बरसात का मौसम बीत गया
सरहद पार बसे किसी और मुल्क़ जा
उन औलादों के विषय में क्या कहना ,

किस मोहपाश में बांध रखी फिरंगन
कि भूला गाँव,गली शहर अपना देश
आँखों में सपने भर जो कह गया था  
माँ आ जाऊंगा जब भी दोगी सन्देश ,

बूढ़ी हो गईं आँखें अब तो इंतजार कर
शिथिल पड़े उमड़ता ममता का सागर
जाने कब बाती गुल हो जाये दोनों की
हृदय के ख़्वाब सुनहरे रह जाएँ कातर

पहले यदा कदा पाती भी आ जाती थी
अब तो वह कड़ी भी धीरे-धीरे टूट गई
जाने कब आएंगे परदेश को जाने वाले
सांसों की डोर शनैः-शनैः अब छूट रही

अपनी मंज़िल छोड़ मंज़िल तलाशने
निकला था घर से अपनों से दूर बहुत
माँ-बापू का कांधा भूल खो गया कहाँ
कभी न मुड़कर देखा हृदय शूल बहुत ,

जमीन,ज़ायदाद,मकान किये जिनके 
लिए,यत्न से तृण-तृण पाई-पाई जोड़
उस घर का देखो उजड़ा वीराना मंज़र
जहाँ सुनाई दे उल्लू,चमगादड़ के शोर ,

                                    शैल सिंह 

Sunday, 20 December 2015

'' इश्क़ क्या है ''

   '' इश्क़ क्या है ''

इश्क़ करना खता नहीं खता करवा देती है
बिना दुश्मनी के भी तलवार चलवा देती है
ज़ायज़ नाज़ायज़ इश्क अंधा करवा देती है
घर-परिवार से बग़ावत पर उतरवा देती है
ख़ुदा भी नज़र आता नहीं महबूब के सिवा
ज़माने की जखम से बेपरवा करवा देती है
इश्क़ तूफान सा बहता बेतरतीब दरिया है
इज्जत पे आंच आये हैवान बनवा देती है
इतिहास पलट के देखो इश्क़ के मतवालों
दुनिया दीवारों में ज़िंदा भी चुनवा देती है ।

                                        शैल सिंह


Wednesday, 9 December 2015

नाता तुड़ा दिया नईहर के सारे

अभी-अभी बेटी की शादी करके लौटी हूँ बेटी विदा करने का उद्वेलन क्या होता है बेटी वाला ही जान सकता है ,मैं भी अपने बाबूजी की बेटी थी ,अपने प्रियजनों से जुदा होते समय बेटी के मन में क्या आन्दोलन होता है ,वही हृदयस्पर्शी भाव मेरी कविता में व्यक्त है ,यह  हर बेटी की पीड़ा का असह्य व्याख्यान है ।


पिता ने लाड़ की नदी बहाई
माँ ने ममता का सागर
भैया के स्नेहिल बाँहों  की
बड़ी हुई ओढ़कर चादर ,

परम्परा के निर्वहन में, मैं
रीति की भेंट चढ़ा दी जाऊँगी
कोई घोड़ी चढ़कर आएगा
डोली में बिठा दी जाऊँगी ,

गाजे-बाजे साथ बाराती
वर आया धूमधाम मेरे द्वारे
चुटकी भर सिंदूर मांग भर
नाता तुड़ा दिया नईहर के सारे,

फूट-फूट रोई माँ मेरी
पिता ने रुँधे गले दी ढाढ़स
भैया विलख दिए कांधा
सौंप दी अपनी पूँजी पारस ,

आँसुओं की छछनी बाढ़ भी
जुदा करने से रोक नहीं पाई
सर पे डाल ओहार चूनर की
कर दी गई मेरी विदाई ,

जब से जनम लिया है
सुनती आई पराई धन हूँ
ये कैसी है विडम्बना ,मैं
तुलसी और किसी आँगन हूँ ,

स्वयं लहू से सींचा माँ ने
पिता ने धन दौलत था समझा
भैया ने नाज औ नखरे उठाये
फिर क्यों गैर की ड्योढ़ी बख़्शा ,

सब कहते शुभ घड़ी आई
शुभ लगन तेरा है आया
मेरे दुःख का दंश है क्या
सर,चन्द घड़ी बस सबका साया ,

टार ओहार जब निरखूँ
कोई पीहर का नहीं दिखता
धीरे-धीरे पी की देहरी पास
दिल जोरों से मेरा धड़कता ,

घर से विदा हुई डोली में
कहते सूना ससुराल ही मेरा घर
कैसे समायोजन बैठाऊँगी
नया नगर है डगर नया है घर ,

                                             शैल सिंह








Sunday, 15 November 2015

कुछ पंक्तियाँ बिखरी-निखरी

१--

कभी काजल के मानिन्द बसे
हम उनकी बेजार निगाहों में
अब नौबत कि नजरें चुराकर
बगल से गुजरा करती उनकी ,
२--
मेरे ख़्वाबों में दबे पांव आता है कोई
आकर मुझे  नींदों से जगाता है कोई ,
३--
कम्बख़्त नज़र एक सी आग लगाई दोनों तरफ
वहाँ करार उन्हें नहीं इधर चैन बेक़रारी को नहीं ,
४--
जल कर मोहब्बत में दिन-रात दिल खाक़ कर लाए
न बहारों का लुत्फ़ ले पाये न ख़िज़ाँ के साथ रह पाए ,
५--
वायदों का अलाव जलाकर इन्तज़ार किया बहुत
ऐतबार ने मगर क़त्ल किया है क़यामत की तरह ,
६--
पाठ मोहब्बत का क्या पढ़ाया सबको भूला दिया
तूने तो मासूम दिल पर  ऐसा कब्ज़ा जमा लिया
पिला कर मय  निग़ाहों की दिखा  अदा के जलवे
दूर ज़माने से किया  नकारा निकम्मा बना दिया ,
७--
वहाँ घर उनके आई डोली इधर सर मैंने भी सेहरा बाँधा
कितनी मजबूर मोहब्बत दुनिया से कर ना पाये साझा
घर दोनों के रखना आबाद खुदा इतना तो रहम  करना
जैसे राधा संग कांधा, इक दूजे के दिल में बसाये रखना ।

                                                              शैल सिंह




हम सबकी परी नन्हीं परी
कितनी प्यारी-प्यारी है
माँ-पिता की राजकुमारी
दादी-दादा घर पधारी है
नानी-नाना की दुलारी
नर्म फूलों सी सुकुमारी है
मह-मह महकी फुलवारी
सूने घर में ये अवतारी है
बाँहें पालना नाना ने
नन्हीं के लिए संवारी है
नानी की सुन-सुन लोरी
परी करती किलकारी है
दीदी,भैया,मामी-मामा ने
अंक भर नेह से पुचकारी है
ताई-ताऊ सभी मौसियों ने
परी की आरती उतारी है ।
                          शैल सिंह

Thursday, 22 October 2015

ओ भारत के युवा प्रहरी जाबांज़ सिपाही कभी न होना गुमराह बेतर्कों के झांसे में ,

ओ भारत के युवा प्रहरी जाबांज़  सिपाही
कभी न होना गुमराह बेतर्कों के झांसे में ,

बो कर नफ़रत के बीज भीड़ जुटाने  वालों
ख़ुश्बू  मोहब्बत  की  बिखराओ  तो  जानें
क्यों बेमतलब  का उलझाते  हो आपस में
गले लग प्रेम का सूता सुलझाओ तो जानें ,

सवालिया निग़ाहें पूछ रही हैं जन-मन की
पहले वाली कहाँ  गई  रौनक़ त्योहारों  की
सहमें,बच्चे ,बूढ़े ,भय,आतंक सब पूछ रहे
कहाँ पहले सी चहल-पहल गई बाजारों की ,

कैसे ग्रहण लगे जीवन के मुस्काते रंगों को
कहाँ वो धानी आकर्षण खेत खलिहानों की
खुद जीओ देश ,समाज ,पड़ोस को जीने दो
होली जला उपद्रवी कुंठित सोच विचारों की ,

घर तभी बनेगा सपनों का सजेगा,संवरेगा
जब रक्षा करना सीखोगे दर औ दीवारों की
अनेकता में एकता क्या होती दिखलाना है
बेहतर जीवन स्तर हो आवामी सौहार्दों की ,

प्रेम मोहब्बत इतना प्रगाढ़ बलवान बनायें
सामाजिक समरसता वास्ते  आह्वान करें
इंसान,दोस्ती की तस्वीर उजागर कर देखें
मिलकर नफ़रत की खाई को शर्मसार करें ,

भारतीय समाज की मानवीयता औ रिश्ता
सहेज कर  हमें तार-तार होने  से बचाना है
सांस्कृतिक ,सहिष्णुता  अक्षुण्ण विरासत
हिन्दुस्तान  की  दुनिया को दिखलाना  है,

मुश्किलों के समक्ष बुज़दिली नहीं दिखाना
शेर गर्जना सा हथियारों पर धार चढ़ाना है
मटमैला हृदय ,भूल अतीत की कड़वी यादेँ
पुराने जख़्मों पर मरहम का लेप लगाना है ,

                                             शैल सिंह










वाह रे मिडिया वाले

वाह रे मिडिया वाले ,तेरी अच्छाई और बुराई दोनों ही चरम पर हैं ,सच्ची बातों के लिए आवाज़ बुलंद करते हो और कभी-कभी तिल का ताड़ बनाने में भी माहिर ,आजाद भारत में व्यक्ति को अपनी अभिव्यक्ति भी स्वछंद और स्वतन्त्र रूप में व्यक्त करने की आजादी नहीं है ।किसी के मुँह से वकार क्या निकली कि तोड़-मरोड़कर  गलत तरीके से गुमराह करने और मतलब निकालने का महारत भी पास रख लेते हो । खैर बुद्धिजीवियों और समझदारों पर तो इसका कुप्रभाव नहीं पड़ता । एक बात तो सत्य है की मोदी की लोकप्रियता और प्रसिद्धि विरोधियों के गले की हड्डी बन गई है ,वरोधी पार्टियां तिलमिला-तिलमिला कर जल भून रही हैं । इसीलिए अनाप-शनाप गुद्दी में गुद्दी निकालती रहती हैं ,लालू इतना घटिया स्तर का भाषण देता है किसी पर जूं तक नहीं रेंगता और कोई सही बात भी बोले तो बवाल हो जाता है राबड़ी जैसे लोग विहार की वागडोर थाम सकते है , बोलने के लिए बहुत कुछ है पर बवाल और टीका टिप्पड़ी सहने की क्षमता नहीं है उददंड और उजड्ढ लोगों की की बेसिर पैर बातें सुनने के लिए ।
                                                               शैल सिंह
                                                      

Tuesday, 20 October 2015

सोनिया गांधी ……  ,
अपने घर से रुख़सती क्या ली भारत के राजकाज पर काबिज हो गई
दो चार भाई होगी छोड़ी यहाँ भाइयों के रूप में हजारों सेवक पा गई
घर की रहगुजर क्या भूली यहाँ हर रहगुजर पर तेरी तस्वीर लग गई
ओ चिड़िया तूं जिस शज़र पर बैठी उस शजर पर और चिड़िया नहीं बैठी
तुझे भारत में मोहब्बत ही नही मिली बल्कि सर आँखों पर बिठाया लोगों ने
हम ये कैसे कहें तुम्हें हुकूमत प्यारी नहीं क्या हुकूमत बिन चाहे ही मिल गई
तेरे चहरे ने इस सर जमीं का भाई चारा छिना एक से एक महारथियों का बाड़ा छीना
तेरे पास जो था वो तुझसे ज्यादा हमारा था तेरे प्रेम जाल ने हमसे हमारा छिना
यहाँ बहुत से बच्चों के सर का साया नंगा है बच्चों को भारत की संतान बनके रहने दे
तूने गिरिजा छोड़ दिया जो तेरा था तूं शिवाला का क्या कभी हो पायेगी
तकदीर बदलने के और भी रास्ते हैं  भारत की बहू-बेटी बनके रह वरना सम्मान से चूक जाएगी
इक तूं ही बेवा नहीं हुई यहाँ हजारों लाखों बेवाएं हैं जो घर छोड़कर कभी मायके नहीं गईं
तेरी वजह से नफ़रतों की दीवार खड़ी हुई बस चन्द नासमझों चाटुकारों की मसीहा बनके रह गई 
तूं यहाँ के मुसीबत की चिंता ना कर यहाँ ऊंचे कद वालों की कोई कमी नहीं
यहाँ के लोगों को तुझसे भी ज्यादा अपना देश प्यारा है
सियासत तुझसे नहीं तुझे लेकर सियासतजदां सियासत करते हैं क्योंकि वो
गुमराह हैं खुद को अलग कर इस घर को अपना घर नहीं समझते हैं ,
तूं इस मिट्टी को गर समझेगी अपनी धरती तो धरती का सीना तेरे लिए बड़ा हो जायेगा ।

                                                                                 शैल सिंह



Saturday, 17 October 2015

मेरी ये फितरत नहीं यारों


बहारों का आनन्द लेती हूँ
मेरी ये फ़ितरत नहीं यारों
कि हवा  के संग बह जाऊँ ,

लोग सूखे पत्रों के मानिन्द
बहक हवा के साथ उड़ते हैं
जिधर का  रुख हवा का हो
उधर हवा के साथ चलते हैं

माहौल के अनुरूप देखा है
कि हैं कुछ लोग ढल जाते
जैसी जिस जगह की मांग
वैसी तुरुप चाल चल जाते ,

कड़वा सत्य बुरा  होता पर 
मेरी ये फ़ितरत नहीं  यारों
सच से चर्चा में मुकर जाऊँ ,

भला एक ही इन्सान कैसे
जब-तब कुछ नजर आता
जुबां तो एक होती है मगर
तरह-तरह बात कर जाता ,

लिबास आचरण के उनके
आश्चर्य, पल में बदलते हैं
लोग भलीभांति जानें क्यों
तारीफों के  कसीदे गढ़ते हैं

अडिग सही  बात पर होती
मेरी ये फितरत  नहीं यारों
गिरगिटी चोला पहन आऊँ ,

कहें भले लोग बुरा मुझको
इसकी परवाह  नहीं करती
ईश्वर क्या देखता न होगा
चालबाज़ी चाल में किसकी ,

चटुकारता की दुर्गन्धों से
भभक उठते हैं नथुने मेरे
उबटन लगाकर तेल संग
क्यों मालिश करें पोर मेरे ,

बाँधूँ कलावा सच-झूठ का
मेरी ये फ़ितरत नहीं यारों
आत्मा का क़त्ल कर जाऊँ ।

                       शैल सिंह















Thursday, 15 October 2015

ओ परदेशी

'' शहर की कहीं,कोई,कैसी भी चीज़ भाई
   अपने प्यारे न्यारे गाँव सी नहीं लगती
   चाहे जितना खायें पिज्जा,बर्गर,नूडल
   माँ के व्यंजन के स्वाद सी नहीं लगतीं ''

                 ओ परदेशी 

कच्ची गलियाँ अम्मा-बापू रखना याद घराना
फड़फड़ायेंगे ना देख परिंदे वीरां आशियाना ,

शहर को कूच करने वाले गाँव के मुशाफिर
गाँवों की पगडण्डियां हृदय में बसाये रखना
हिफाज़त से बुजुर्गों के नसीहत की भी पूँजी
आँखों में सहेज कर शिद्दत से सजाये रखना ,

जाते वक़्त की ना करना विस्मृत निशानियाँ 
उमड़ा रेला परिजनों का आँसू भरा खजाना
कहीं भूल ना जाना परदेश की आबोहवा में
नीम का छायादार आँगन का दरख़्त पुराना ,

याद में कभी जिगर गर तड़पे बालपन वाला
छोड़ वनवास दहलीज़ लौट चले फिर आना
रौशन हो जाएँगी बेनूर हुई हैं जो बूढ़ी आँखें
रौनक पनघट पर जो बिन तुम्हारे सूना-सूना ।

                                          शैल सिंह





आदतों में करना शुमार अकड़ मजबूरी मेरी


कोई नाम,शोहरत,ओहदा कमाये हमें क्या
ज़मीर बेचकर हमने कभी समझौता न की ,

मोम सा दिल  बनाने की पाई  ऐसी  सजा
हर ठौर मोमबत्ती के  मानिन्द जलाई गई
मेरी सादगी ही ज़माने को बस आई नजर
हर बात हवा सी हवा में मेरी बस उड़ाई गई ,

मेरे आदर्शों उसूलों और सत्य की राहों को
हर कदम  भुगतना पड़ा खामियाजा सदा
साँच को आंच की कब भला परवाह हुई है
झूठ की बुनियाद नहीं करना ईमारत खड़ा ,

पढ़ सकूँ चेहरों  के पीछे की दोगली इबारतें
हुनर सीखते-सीखते बीत गया इक जमाना
झूठ फ़रेब का मोटा मुलम्मा चढ़ा अक़्स पे
लबे मुस्कान आई नहीं काईयाँ सी दिखाना ,

आदतों में करना शुमार अकड़ मजबूरी मेरी
वरना इज्जत से जीने का हर  हक़ छीनकर
दुनिया सिद्धान्तों  पर चलने तो देगी नहीं
करवाएगी  मनमानी ,बेईमानी मजबूर कर ,

कोई नाम,शोहरत,ओहदा कमाये हमें क्या
ज़मीर बेचकर हमने कभी समझौता न की ,

                                         शैल सिंह



Wednesday, 14 October 2015

ऐ जान-ज़िगर के टुकड़े मेरे प्राण तुझी में बसा रहता है


''  ना  जाने क्यों मन आज उद्द्वेलित है ''

जज़्ब कर नीर नैन का लाल दर्द सीने में ज़ब्त किया था
कदमों में बिछा दुनिया की नेमतें सीने से जुदा किया था ,

क्यूँ मन की मौन तलहटी में ऐसी हलचल हो रही आज
लगता कोई पीड़ा मथ रही लाल को जो छुपा रहा राज ,

भींचकर गम सीने में गुमसुम मत कभी रहना चुपचाप
तेरे बेचैन साँसों के स्वर की भी माँ सुन लेती है पदचाप ,

तेरे अवयव की हर धड़कन मुझसे ही हो के गुजरती है
गर बदली तुझ पर घिरती है तो वारिश मुझ पर होती है ,

माँ के व्यंजन की खुश्बू तेरे नथुनों तक भी जाती होगी
माँ देख सामने थाली दृग से,छह-छह धार बहाती होगी ,

तूं जबसे दूर गया नयन से,मन अंदेशों में घिरा रहता है
ऐ जान-ज़िगर के टुकड़े मेरे प्राण तुझी में बसा रहता है ,

एक-एक निवाला हलक में मैं मुश्किल से उतार रही हूँ
इक-इक दिन काट इंतजार में बाट बेसब्र निहार रही हूँ ,

जाकर परदेश में बबुवा मत परदेशी फिरंगी बन जाना
माँ ताक रही रस्ता शिद्दत से जल्दी घर अपने आ आना ।

                                                              शैल सिंह 

Wednesday, 23 September 2015

जब-तब यादों का सोता उमड़ कर

कहावत हैं तन बूढ़ा तो हो जाता है
पर सही, मन कभी बूढ़ा नहीं होता ,

पछुवा ,पूरवा ,भाटा ,तूफान ,बवण्डर
ना जाने कैसी-कैसी आँधियाँ आईं
फिर भी अन्तस जलता स्मृति का
कभी अड़ियल दीया बुझा ना पायीं  ,

मैंने  सहेज अतीत  को तस्वीरों में
घर की दरों-दीवारों सजाये रखा है
बचपन की यादों का हर इक पन्ना
शिद्दत से हृदय  से लगाये रखा है ,

जब-तब सोता यादों का उमड़ कर
निर्जन में आर्द्र नयन कर जाता है
दिखा परछाईयों का खोल झरोखा
खुशियों से सूना कोना भर जाता है ,

कितने पन आये गए जिन्दगी में
सबसे सुंदर अपना वो बचपन था
यौवनपन की कुछ मीठी यादें संग
पर इस पन केवल संग चिन्तन हा ,

दिल बहका रे देख पुरानी तस्वीरें
कैसे दिखते थे जवानी में हम भी
पर सामने खड़ा ये आईना हठात
बता गया के कहाँ आ गए हम भी ,

कैसा-कैसा विभिन्न रूप औ रंग
धारा जीवन में यह माटी का तन
पर परिस्थितियों के हर कैनवास
स्वयं को सजाये संवारे रखा मन  ,

चमकी चाँदी सी सफेदी केशों में
तन जर्जर हुई मलिन भी काया
मद्धम हुई रौशनी आँखों की भी
पर मन अब भी खुमार है छाया ।

                                             शैल सिंह








Tuesday, 22 September 2015

हिंदी नहीं तो हिंदुस्तान कैसा

हिंदी नहीं तो हिंदुस्तान कैसा

जब दूर होगी हमसे,हिंदुस्तान से हिंदी
फिर अंग्रेज़ी के साथ हमारा क्या होगा
गंगा,जमुनी तहज़ीब संस्कृति,सभ्यता
हमारे सनातन,धर्म का आगे क्या होगा ,

चन्द हिमायती अंग्रेजी को आबाद कर
राष्ट्रभाषा का अनादर करते हैं कितना
हमारी सांस्कृतिक विरासतों के गढ़ से 
इसी मुई लिये लापरवाह रहते हैं इतना,

अंग्रेजों को तो इस मुल्क से दिया खदेड़ 
ये अंग्रेजी यहाँ ठाठ से पोषित होती रही
ग़फ़लत में हमारी इस सौतन भाषा संग  
सनातनी धर्म पग-पग शोषित होती रही,

अंग्रेजी की वक़ालत करने वालों की बस     
मुश्किल से भारत में  मुट्ठी भर तादात 
हिंदी करोड़ों भारतीयों के जुबां की रानी  
भला कैसे करें पराई भाषा यहाँ बरदाश्त,

न रंग-ढंग चाल-चलन रत्ती तहजीब ही  
आदर-सम्मान छोटे-बड़ों का भाव नहीं
ख़ाक़ करेगी बेअदब मुकाबला हिंदी का
जिसमें देशप्रेमी रखते रंच भी चाव नहीं ,

मानते हैं अवांछनीय नहीं है कोई भाषा
अनेक भाषाओं का ज्ञान बुरा नहीं होता  
राष्ट्रभाषा का अनादर हो इस बीना पर
ये ससुरी आँख तेरेरे स्वीकार नहीं होता ,

हिंदी का प्रचार-प्रसार कर पोषण संवर्धन 
मातृभाषा अर्श पे ला दुनिया को दर्शाना है  
भारतीय संस्कृति के सनातनी प्रवाहों को 
भारतवासी कोटि-कोटि अक्षुण्ण बनाना है।

                                             शैल सिंह 


Friday, 18 September 2015


'' हिंदी की महत्ता '' 

                                       
जय हिंदी ,जय भारत ,

      हिंदी पर लेख लिखने में अपार हर्ष और आनंद की अनुभूति हो रही है । हिंदी का सम्यक ज्ञान यदि मैं अपने लेख द्वारा थोड़ा भी जन मानस को दे सकूँ तो यह मेरे प्रयास की थोड़ी सी उपलब्धि होगी और अपनी लेखनी की कुशल शैली पर संतोष  और प्रसन्नता की अनुभूति भी होगी ।
            बताते चलें कि विश्व में ८० करोड़ लोग हैं जो हिंदी को अच्छी तरह समझते हैं ,और ६० करोड़ विश्व में हिंदी बोलने वाले लोग हैं ।१४ सितम्बर १९४९ को वैधानिक रूप से हिंदी को राजभाषा का दर्ज दिया गया । संबिधान में अनुच्छेद ३४३ में यह प्रावधान किया गया है कि देवनागरी के साथ हिंदी भारत की राजभाषा होगी । हिंदी के माध्यम से आज रोजगार तथा कारोबार व्यवसाय के बड़े बाजार भी तमाम सम्भावनाओं के लिए दस्तक दे रहे हैं । यह भी शुभ लक्षण है कि आज हिंदी को लेकर प्रचलित हीनता की ग्रन्थि से धीरे-धीरे हम उबर रहे हैं ,भाषा की मजबूती ही चहुँमुखी विकास का मूलमंत्र है ।हिंदी अब प्रौद्योगिकी के रथ पर सवार होकर विश्वव्यापी बन रही है । अपने मुनाफे के लिए विश्वस्तरीय कम्पनियाँ भी हिंदी प्रयोग को बढ़ावा दे रही हैं ,जैसे माइक्रोसॉफ्ट ,गूगल ,याहू ,आईबीएम तथा ओरेकल इत्यादि ।
        हिंदी केवल भाषा ही नहीं वरन भारतीयों की आत्मा है, भाषा ही अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है, और वह भाषा है हिंदी, जो दिलों पर अपनी गहरी छाप छोड़ती है । हमारे प्रधानमंत्री जी भी हर जगह हिंदी में ही भाषण देते हैं चाहे देश हो या विदेश ,और हर जगह इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा हो रही है । पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी बाजपेई जी ने भी संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में ही भाषण दिया था ,जिसे आज भी लोग याद करते हैं ।अंग्रेजी बोलने वाले दुराग्रह के कारण हिंदी नहीं बोलते जबकि उन्हें अच्छी तरह हिंदी बोलने और समझने आती है , ये लोग `हिंदी फिल्में तो बड़े चाव से देखते हैं ,फिर हिंदी अपनाने में दुर्भाव क्यों । हमें अपनी हिंदी भाषा पर गर्व करना चाहिये ,सच्चे हिंदुस्तानी होने का स्वाभिमान होना चाहिए । 
        हिन्दी इस राष्ट्र की पुरातन संस्कृति का एक अटूट हिस्सा है । हिंदी भारतीय समाज को जोड़ने की एक कड़ी है ,हिंदी देश की प्राचीन सभ्यता और आधुनिक प्रगति के बीच की एक मजबूत जंजीर है। हिंदी भारतीय चिंतन और संस्कृति की वाहक है ,यह भाषा हमारे पारम्परिक ज्ञान की खान है ,दुनिया के कोने-कोने में बसे लाखों करोड़ों प्रवासियों की हिंदी ही सम्पर्क भाषा है,हिंदी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान मिली है । हिंदी की समृद्धि से देश की समृद्धी है । इस राष्ट्र ने जब-जब किसी विपत्ति में स्वयं को घिरा हुआ पाया ,हिंदी भाषा ने चारों दिशाओं में स्थित विविध संस्कृति से युक्त राज्यों को एक सूत्र में पिरोकर राष्ट्र को संगठित किया एवं विपत्ति से राष्ट्र को बाहर निकाला । चाहे अंग्रेजों के विरुद्ध ४०० वर्षों तक चला स्वतंत्रता संग्राम हो या उसके पूर्व मुगलों और यवनों के अत्याचारों से आक्रांत १००० वर्षों का अविरल संघर्ष हो ,राष्ट्र भाषा हिंदी ने हर युग और काल में एक मंच प्रदान करने का अविस्मरणीय कार्य किया है ।किन्तु विगत वर्षों में इस भाषा को पल्ल्वित पुष्पित करने के मार्ग में जिस तरह की बाधाएं आई हैं ,या कह सकते हैं बाधाएं उत्पन्न की गई हैं,वह एक विचित्र स्थिति है अब तक विदेशियों ने हिंदी को पनपने से रोका ,राष्ट्रकवियों को राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत कवितायेँ करने से रोका ,तुलसी और मीरा के भक्तिपदों तक पर तरह-तरह के अंकुश लगाये गए ,वह इस बात का द्योतक था कि भारतीय संस्कृति की प्राचीन उन्नत परंपरा को नष्ट करने के उद्देश्य से विदेशियों ने ऐसा किया ,क्योंकि यही एक मार्ग था जिसके द्वारा वे इस राष्ट्र की एकता ,अखंडता को खंडित कर सकते थे । किन्तु यही कार्य जब स्वयं भारतीय करें ,और वह भी स्वातन्त्रयेत्तर भारत में ,तो इसका कारण कुछ अस्पष्ट सा प्रतीत होता है । अंग्रेजी भाषा सार्वभौमिक रूप से सर्वमान्य एक अंतर्राष्ट्रीय भाषा है एवं उसका अपना एक कार्यक्षेत्र है,क्षेत्रीय भाषाओँ की भी अपनी एक महत्ता है । किन्तु एक राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी के अतिरिक्त हमारे पास विकल्प क्या है ? भारत के हर कोने में बोली समझी जाने वाली यह एक व्यापक साहित्य से युक्त मीठी और सहज भाषा है ,यह अलग बात है कि अपने स्वार्थ की अंधी परिभाषाओं में स्वयं को बद्ध कर कुछ लोग अलगाववादी मानसिकता के कारण हिंदी का विरोध आदिकाल से करते आये हैं ,किन्तु ऐसा करने वाले स्वयं जानते हैं कि यदि हिंदी का विरोध है तो उनके देश से दूसरे प्रदेश जाकर काम करने वाले लोगों का जीवन यापन असंभव हो जायेगा । अर्थात भाषा की व्यापकता का लाभ तो वे लेना चाहते हैं ,किन्तु इसका प्रतिफल देने की बजाय वे हिंदी के विरोध में ही स्वर मुखर करते हैं ।
     यह प्रश्न मात्र हिंदी दिवस तक ही सीमित नहीं है बल्कि एक शाश्वत सोच का विषय है कि हमें अपनी ही मातृभाषा से दोयम दर्जे के व्यव्हार की क्या आवश्यकता है ? विश्व की हर भाषा का ज्ञान हो इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं है ,किन्तु अपनी ही मातृभाषा की सतत उपेक्षा कर हम संस्कृत को कहाँ ले जा रहे हैं, मंथन का विषय है । अंग्रेजी समेत किसी भी भाषा में हमारी निष्ठा हो किन्तु वह हिंदी के प्रति उपेक्षा की कीमत पर कत्तई स्वीकार्य नहीं है। यह समय है जब हमें समझना होगा कि हमारा राष्ट्रध्वज मात्र कपड़े का टुकड़ा नहीं,वरन सम्पूर्ण राष्ट्र की आत्मा का प्रतीक है । हमारा राष्ट्रगान मात्र कुछ शब्दों का समंजन नहीं ,अपितु प्रत्येक भारतवासी के हृदय की गूंज है । इसकी महत्ता हमारे स्वयं के अस्तित्व से कदापि कम नहीं । अंग्रेजों ने इस महत्ता को समझा था इसीलिए सबसे पहले उन्होंने अपने पैर ज़माने के लिए भारतीय संस्कृति,स्थानीय बोलियों और राष्ट्रभाषा पर प्रहार किया और लोगों को अलगाववादी मानसिकता की धारा में बहाने का प्रयास किया । किन्तु अब स्थितियां विपरीत हो चुकी हैं । अब अपने ही राष्ट्र के मूर्धन्य उत्तरदायी लोग हिंदी की अस्मिता को सुरक्षित रखने के प्रति उदासीन हैं । अगर भारत की भाषाओँ को विधायिका ,कार्यपालिका व न्यायपालिका और साथ में शिक्षा व्यवस्था  खासकर उच्च शिक्षा व शोध ,वाणिज्य-कारोबार ,सूचना प्रौद्योकि आदि में स्थान नहीं दिया जायेगा तो हम कैसे उम्मीद करें कि दुनिया हमारी भाषा को सम्मान देगी । अपनी मूल संस्कृति का सर्वनाश करके किसी भी विकास की कल्पना करना मृगमरीचिका के सामान है । अतः यह प्रयास मात्र हिंदी दिवस तक सीमित न हो कर हर पल अनवरत चले ,तभी हिंदी दिवस की सार्थकता है । हिंदी दिवस हिंदी के लिए कुछ करने हेतु प्रारम्भ करने का दिन नहीं है ,वरन वर्ष भर हिन्दी के उन्नयन के लिए किये गए प्रयासों की समीक्षा का दिन है ।आइये हम भी अपने वर्ष भर के प्रयासों की समीक्षा करें एवं यदि हमारा प्रयास शून्य रहा है तो आज ही आत्मविश्लेषण करें कि अपनी संस्कृति व भाषा के महत्त्व को न समझकर हमने क्या खोया है ?
      ' हिंदी ' साहित्यकारों के मन की ,कलम की वह पूंजी है जिसके द्वारा वह जन-जन के मन की ,समाज की ,परिवेश की भावनाओं को दर्शाता है । यह कहने में अतिश्योक्ति नहीं इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि आज के दौर में हिंदी साहित्य के शौक का भी पुनर्जन्म हुआ है । दुनिया में दिनोंदिन हिंदी का रुतबा बढ़ रहा है, आज तकनीकी प्रगति की संचार प्रकाशन संवाद की अनेकानेक खिड़कियाँ खोल रही है । वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती शाख ने कई देशों को हिंदी जानने व समझने को विवश कर दिया है ।
      हिंदी भाषा का प्रश्न मात्र एक भाषा के उत्थान-पतन का प्रश्न नहीं है ,हिंदी देश की पहचान ,उसके गौरव ,कला और सांस्कृतिक धरोहर से भी जुडी है । हिंदी का अर्थ है देश की अपनी भाषा में देश का आह्वान करना ,भारतीयों के लिए हिंदी से जुड़ना देश से जुड़ना है । यदि हिंदी जीवित है तो अपनी जीवन शक्ति से ,क्योंकि राजभाषा,मातृभाषा ,संपर्क भाषा की यह संजीवनी है । हिंदी में आगे उज्जवल भविष्य की संभावनाओं का आसार नजर आने लगा है ।वह समय जल्द ही आने वाला है जब हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा की मान्यता मिलेगी और हिंदी का मान-सम्मान विश्व फलक पर पताका की तरह लहराएगा ।
     बड़े दुःख के साथ यह कहना पड़ रहा है कि अपनी राष्ट्र भाषा हिंदी को हिंदी दिवस के रूप में मनाकर हम अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं । हिंदी दिवस मना लेना ,हिंदी पखवाड़ा मना लेना मात्र ही हिंदी के प्रति आस्था नहीं दर्शाता ,बल्कि अपनी राष्ट्र भाषा के लिए हमें प्रतिबद्ध होना चाहिए । राष्ट्रीय व्यव्हार में हिंदी को काम में लाना देश की उन्नति के लिए बेहद आवश्यक है । हिंदी भाषा एक ऐसी भाव तरंगिणी है जो सीधे आत्मा में उतरती है ,हिंदी विचारों की सुन्दर पोशाक है ,जिसके द्वारा हम अपनी अभिव्यक्ति को बहुत ही आकर्षक तरीके से दर्शा सकते हैं ।अब समय आ गया है जब हम नई पीढ़ी के लोगों को यह समझायें कि हिंदी में बात करने में उनमें हीन भावना नहीं आनी चाहिए ,अपनी भाषा पर गर्व करना चाहिए। अपनी भारतीय संस्कृति का दर्शन करायें ताकि ये पीढ़ी अपनी परम्पराओं से अनभिज्ञ ना रह जाय ,भारतीय मूल के लोगों को इस दिशा में गम्भीर प्रयास करना चाहिए ,कहीं ऐसा ना हो कि अंग्रेजियत के फैशन में एक,दो पीढ़ियों बाद ये लोग ये भी भूल जाएँ कि हमारे पूर्वज किस गांव या शहर से आए थे यदि घर में हिंदी को सम्मान नहीं देंगे तो विदेशों में हिंदी का सम्मान कैसे होगा ? यह एक अत्यंत ही गंभीर और विचारणीय विषय है ।   
       आप सबको हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं । जय हिन्द। 
                                                                         शैल सिंह 

Friday, 4 September 2015

बह गए रेत से सपने सारे

        झुग्गी झोंपड़ी


     '' बह गए रेत से सपने सारे ''

सोंधी ख़ुश्बू वातायन में बिखरा तो दी हो बरखा रानी

टूटही छान से रिस-रिस कर घर में टपक रहा है पानी

महलों के बाशिंदों को रिमझिम देती सावन की फुहार

हम गरीबन पर गाज गिराती भसकी छप्पर हुए उघार

जगह-जगह दरकाती धरती बेकाबू बरखा मूसलाधार

बंगलों की बगिया महका के गमलों में फूल खिलाई हो

यहाँ गुरबत की बखिया उधेड़ जंगल की बाड़ लगाई हो

बजबजा दी हो घाव मनमाने उद्दंड बारिश की बूंदों से

टीसों में भर दी हो सिहरन तेज हवा साथ इन झींसों से

डगमग मंझधार में जीवन नैया यहाँ नहीं कोई खेवनहार

हम ही सहते मार सूखा की हमें ही है करती बाढ़ बेजार

कर्ज़ों में धँसी हड्डी पसली गात में है घुन सा लगा बुखार ,

आग उदर की भड़काती झोंपड़ी के चूल्हे की ठण्डी राख

आँखें आसमान टकटकी लगा काटीं जाग के कारी रात

महलों के सब दिन लगे गुलाबी हमरे फीके सब त्यौहार

कजरी,विरहा भूल गए बिसरा आल्हा,उदल गीत मल्हार

रात फिसलती रही चाँदनी बंगलों,मेहराबों,गलियारों से

छलक रही आँखें असहायों की टकराकर ढही दीवारों से

घर दूधिया चाँद में चमक रहे नहा बरखा की बौछारों से

हम बरसाती में दुबके पड़े डर के घिग्घी बांधे सियारों से

कहीं तो बालकनी से झाँके बत्ती कोई पहरों पे लेता साँस

बह गए रेत से सपने सारे बदहाली भरे कैसे भला हूँआंस ।

गात -- शरीर                                                    शैल सिंह


Wednesday, 2 September 2015

ये भारत देश के वासी हैं


यह देश ' कृषि प्रधान देश ' के नाम से
विश्व विख्यात है
इसी देश के नौनिहाल कैसे होता
अन्न उत्पाद अज्ञात हैं ,
अहाते की छोटी सी फुलवारी में
पिछवाड़े की छोटी सी क्यारी में
तड़ी पड़ी थी धान की
बेटी सयानी पूछी मम्मा ये कैसी घासें
हरी-हरी परिधान की
मैंने बोला जरई है ये
बोल रही क्या होता है
मैंने बोला रोपनी होगी
बोली रोपनी क्या होता है
मैंने बोला धान की रोपाई होगी
बोली धान रोपाई क्या होता है
मैंने बोला शर्म करो तुम
राईस ब्रीडर की बेटी हो
इसी घास को खाकर सब
मटियामेट कर देती हो
कृषि प्रधान देश में रहती हो
केवल खाती पीती सोती हो
रोपाई का मौसम है
निहुर-निहुर रोप रही मूल्यानी
खेत ले जाकर उसे दिखाया
देख ले खेती कैसे होती अज्ञानी
जिन्होंने पढ़ते-लिखते कॅरियर बुनते
गाँवों को कोसों पीछे छोड़ दिया
आज के नवयुग के ये बच्चे क्या जानेंगे
जिनने सब रिश्तों से मुँह मोड़ लिया
जिनने शहर में खोली ऑंखें
सुख वैभव की जिन्हें मिली विरासत
कितने चरणों से होके गुजरता उत्पादन
क्या जाने इन सबकी ऐसी नफ़ासत
बेटी की सहेली और उसकी माँ ,
इक बार मेरे घर आई थीं
कैम्पस में घुमा-घुमा कर
बेटी ने उन्हें भी फील्ड दिखाई थी
धान की कई प्रजाति की किस्में
चिन्ह के लिए स्टिक में टैग लगाकर
छोटी-छोटी क्यारियों में अलग-अलग
सलीके से रोपी गयी थीं रो में सजाकर
देखीं अचंभित माँ-बेटी थीं
विस्मय से फटीं रह गई ऑंखें
कह बैठीं इस संस्थान में
कितने करीने से उगाई गई हैं घासें
और हठात कह बैठीं पारो
इन घासों पर नंगे पांव
तूं सुबह शाम चलाकर
पावर कम हो जायेगा तेरा चश्मा उत्तर जायेगा
सुनकर हम और हँसे ठठाकर
बेटी बोली आंटी ये घास नहीं है धान है
ये संस्थान अनुसन्धान की खान है
यहाँ वैज्ञानिक करते इसी पर काम है
धान से निकलता चावल
चावल ही विश्व का मूल खाद्यान्न है
कुछ गाँछों में धान की देखीं बालियाँ
पहली बार हुआ दिग्दर्शन
बोलीं क्या धान ऐसा होता है
चावल इसका ही है परिवर्तन
पहली बार फसल से हुआ दीदार था
ऑंखें हुईं विस्फारित
दऊरी ,दुकान है रोजी-रोटी
जिनका जीवन विजनेस पर आधारित
क्योंकि दोनों थीं मारवाड़ी
कहाँ होती है उनके खेती बाड़ी
ये भारत देश के वासी हैं
कृषि प्रधान देश के निवासी है ।

मूल्यानी ---खेतों में काम करने वाले मजदूर
तड़ी ,जरई ----धान की नर्सरी
                                     
                                     शैल सिंह 

Monday, 31 August 2015

सींकती रही दीए की लौ में

'' सींकती रही दीए की लौ में ''


अम्मा क्यूँ नहीं तूने मुझको भी
भैया सा अधिकार दिया ,हक़  
मेरे हिस्से का काट-कपट कर  
केवल भैया को ही प्यार दिया ,

मुझको भी गर ' पर ' मिलता 
उड़ती-फिरती मुक्त गगन में 
डाल सूरज के शहर बसेरा माँ 
सुर्ख सी उगती नील गगन में ,

बूनती ऊँचे-ऊँचे स्वप्न सुनहरे  
लिखती नित नई-नई इबारत
दुनिया को दिखलाती क्या हूँ 
किसमें हासिल मुझे महारत ,

मुक्त पखेरू सी फ़िजां-फ़िजां
माँ विचरण करती जी भरकर
ना साँझ,सवेरे का भय होता 
चलती बेख़ौफ़ राह पे डटकर ,

चील कौओं की नजर चीरती
शीशे से वदन को बेंधती ऑंखें
क्यों कांच में ढाला कंचन तन
कुतर दी गयीं उड़ानों की पाँखें ,

पिता के घर जन्मी पली बढ़ी
ससुराल पिया का घर कहती
है कौन सा घर मेरा बतलाओ
कहाँ बता मेरी अपनी धरती ,

कोई भी मेरा मोल ना  जाना
तोल गई जाने कित रूपों में
जली दीप सी सबके लिए मैं
खुद को सेंक दीए की लौ में ,

फरियाद करूँ किस अदालत
कुदरत ने कैसी रची कहानी
देकर जीवन अनमोल,दिया
आँचल में दूध आँख में पानी ।

                                     शैल सिंह 




Sunday, 30 August 2015

हौसलों का दीप ना बुझने पाये

भारत माँ के वीर जवानों तेरी जननी आज ललकारे
बहा दो खून की होली जला दो जगमग दीप सितारे ,

रंग-रंग में तेरी जमा है इस धरती का खून पसीना
स्वराज्य करो सपूतों मैं खड़ी रहूँ गर्व से ताने सीना
सर झुके न बैरी के आगे मेरी अभिलाषा वीरों प्यारे
बहा दो …… ।

इस पावन धरती पर गैरों का पदचाप न पड़ने पाये
ओ वीर सिपाही तेरी धरती माँ न कभी तड़पने पाये
ऋण अदा करना गौरव से भर आँचल माँ का दुलारे
बहा दो  .......।

ना कभी हार मानना पुत्रों ना पग पीछे कभी हटाना
स्वतन्त्र रहे ये भारत भूमि छक्के दुश्मन के छुड़ाना
रहे निरन्तर जलता हौसलों का दीया ना बुझने पाये
बहा दो  ….…।
                    शैल सिंह 

'' काश कलम गर होती मेरी तलवार ''

'' काश कलम गर होती मेरी तलवार '' 

मन में जब-जब जितने फूटे ज्वार
बस हम बस कागज का पेट भरे
कितने लाचार , मजबूर ,विवश हम
जबकि खूँ में गर्मी जोश में है दम
कैसे करें क्षरण इन उल्लुओं के उत्पात
जो नहीं समझते सीधी-साधी बात
छल ज़मीर में इनके संस्कार बदजात
तभी तो करते बार-बार विश्वासघात
हमने बस ईमान का पाठ पढ़ा
और शांति,सद्भाव का यज्ञ किया
नैतिकता में बंधे रहे ,संविधान का मान किया
ताजीवन दूध पिलाते रहे संपोलों को
और खुद बार-बार विषपान किया
कितने हुए शहीद सपूत यहाँ के
कितने अभी और शहादत देंगे लाल
अभी और कितनी बार सहेंगे वार
काश कलम गर होती मेरी तलवार
हौसलों को मसि बनाकर
शब्दों को देती तीखी धार
{ दाँत पीसकर }कर देती बदज़ातों का बंटाधार
कोई अलगाववाद की बात करे
और कोई मांगे हमसे मेरा कश्मीर
सीने पर बैठकर मूंग दल रहे 
छुपकर घाव कर रहे गम्भीर
अन्न,जल ग्रहण करें इस धरती का
रुबाई गायें पापी पाकिस्तान की
हमारे प्रेम सौहार्द को मटियामेट करें
जाल बूनें बैठकर गोद में हिंदुस्तान की
कोई अल्ला-मुल्ला के नाम पर
दे रहा समस्त जगत को पीर
काश कलम गर होती मेरी शमशीर
ऑंखें निकाल हाथ पे रखती ,देती सीना चीर
कुछ कठमुल्लों कुछ बद्दिमागों ने
कर दिया है कौम का नाम बदनाम
क्षिक्षा ,समृधि ,प्रगति की बातें दरकिनार कर
करते फिर रहे कत्लेआम सरेआम
अकल पे परदा डालकर अपने
कर दिया है विश्व का चैन हराम
विफल होती सभी वार्ता
अपमानित होते सभी प्रयास
घुसपैठिये राह हैं ढूँढ निकालते
पहरों के चाहे जितने लगे कयास
काश कलम गर होती मेरी तलवार
और शब्द होते जैसे वृक्ष कपास
फाग सी विखेर देती रुई के फाहों को
विश्व में फैला देती नई उजास
काश कलम गर होती मेरी तलवार ।

                                                शैल सिंह 

Tuesday, 25 August 2015

तूं कितना कंजूस है भगवन तुझसे बहुत शिकायत है
क्यों मेरे लिए ही हर जगह करता इतनी किफायत है
मैंने भी तो मंदिर-मंदिर जा तुझको था परनाम किया
तेरी दहलीज पर मत्था टेक चरणामृत का पान किया
मैंने भी फल,मेवे थाली भर-भर तुझे भोग लगाया था
अक्षत,रोली,धूप,अगर,चारों कोणों में दीप जलाया था
गोमाता के शुद्ध क्षीर से हर-हर बम-बम नहलाया था
चालीसा औ महामंत्र पढ़ बस तुझमें ध्यान रमाया था
दान,दक्षिणा दे द्विज को भी श्लोक,मन्त्र,पढवाया था
घंटियों की कर्कश ध्वनियों से कितनी बार जगाया था
नयनों की अविरल धार से कितनी बार अभिषेक किया
निर्निमेष कर जोड़े भाव से,पर तूने क्या पारितोष दिया
रत्ती भर भी भान नहीं था भगवान घाघ  घूसखोर भी है
मोटे असामियों के लिए लगा देता ताकत पुरजोर भी है
मैंने तो अपनी सामर्थ्य और क्षमता तुझपे खूब लुटाया
पाषाण की बेजान मूरत क्यों पग-पग मुझको भरमाया
प्रभु तेरे नाम से  मेरी भोर हुई तेरे नाम से ही मेरी शाम
सुबह,शाम गंवाया क्यूँ मैंने आरती,वन्दन में निष्काम
कभी चाँद,सितारे तो मांगी नहीं ना ही मांगी आसमान
छोटे-छोटे सपनों के सजे थे कुछ मेरी आँखों में अरमान
छली गई आस्था मेरी सिरे से ठगा गया अपार विश्वास
तुझे क्षमा नहीं करुँगी दम्भी जब तक लेती रहूंगी श्वांस
बची खुची उम्मीदों पर थोड़ी सी अपनी कृपा बरसा देना
ओ पत्थर के निठुर देवता अभिलाषा के फूल खिला देना ।

                                                       शैल सिंह



Thursday, 20 August 2015

'' तुम हाँ तुम ''

               '' तुम हाँ तुम ''

कितनी बार उमड़ कर बरसी ,बदली बन मेरी घनीभूत पीड़ा
काश कभी तुम पोंछ दिए होते स्नेह में बोर-बोर इन पोरों से ,

जो अभिव्यक्ति भर गीतों,छंदों में अलापी थी मेरी मन वीणा
काश कभी तुम सुन होते विक्षिप्त दर्द भरे आरोह-अवरोहों से ,

उर के अतल समंदर न जाने कितने थे बेशकीमती रत्न छिपे
काश कभी तुम खोज लिए होते पैठ अंतर्मन के गोताखोरों से ,

कलमवद्ध कर कविता में उर के अनमोल मोती थे पिरो दिए
काश कभी तुम पढ़ मन से दूर किये होते दर्द के उन कुहोरों से ,

उर्वशी,रम्भा सी कहाँ देह मेरी तुझे मत्स्यगंधा सी नशा मिली
काश क़ि योगी के तप भंग करने के मुझमें होते ढंग छिछोरों से ।

                                                               शैल सिंह 

Monday, 17 August 2015

'' अमर अब्दुल कलाम ''

        '' अमर अब्दुल कलाम ''

तेरी सच्ची देशभक्ति तिरे किरदार को सलाम
सफर के नेक इरादों को तहे दिल से है परनाम  ।

क़बा-ए-जिस्म छोड़ कर कब तस्वीर बन गया
हर जुबां पे अपने नाम का वो कलमा गढ़ गया
कली,फूल रो रहे बिछड़ तुझसे माहताब सितारे
समां,फ़िजां सदायें दे रहीं तुझे अहबाब तुम्हारे ।

हिन्दू चाहिए न हिन्दुस्तां को मुसलमां चाहिए
तुझसा नेक दिल हिन्दोस्तां को रहनुमां चाहिए
जिसे जाति,घर्म ,किसी मज़हब से ना हो राब्ता
तेरे रूपों में ढला तुझसा जुनूनी इन्सान चाहिए ।

सरफरोश जीस्त कर दिया जिसने देश के लिए
उसके कितने शाहकार हुए ख़ुलूस,वेश के लिए
जगी आँखों में जिसने ख़्वाब के जुगुं जला दिए
सपने वो नहीं जो देखो नींद में ये गुर बता दिए ।

जो हारा,थका,रुका न कभी रहा ख़ाब को जीता
पथरीली ,कंकरीली पगडंडियाँ सदा रहा चलता
कभी बुझ न सकेगी उसने जो दिखाई है रौशनी
चलेगा उसकी दिखाई राह सदा ये मुल्क़ है यकीं ।

जिसकी जिंदगी का सरापा देश का विकास था
जिस मिसाईल मैन ने रचा अनूठा इतिहास था
जिस व्यक्ति की हस्ती-ए-मालूम सादगी भरी
शख़्सियत औ शोहरा जहने-रसा सोने सी खरी ।

तसव्वुरात से लबरेज रहा तेरे हयात का सफर
बहिश्त को सिधारा हैरां सभी सुनकर ये खबर
तेरे ही नक़्शे-कदम पर देश का चलेंगा नौजवां
आने वाली नस्लों का बनेगा तेरा ख़्वाब कारवां  ।

साधा अमूल्य जीवन खुद से लड़कर हर कदम
शील,ध्यान,ज्ञान,प्रज्ञा प्राप्ति में सदा निमग्न
जो निष्ठांवान था मिशन की कामयाबी के लिए
किश्ते-दिल जिसका तड़पा माते भारती के लिए  ।

तिरे कारे-हुनर ने ख़ल्क़ में पहचान दी कलाम
मज़हबों की पटे खाई ग़र बने हर कोई कलाम
तेरी सच्ची देशभक्ति तिरे किरदार को सलाम          
सफर के नेक इरादों को तहे दिल से है परनाम  ।

शब्द अर्थ ---
अहबाब--लोग,बाग़,मित्र , क़बा-ए-जिस्म--जिस्म रूपी वस्त्र  ,
जीस्त--ज़िन्दगी , शाहकार -प्रशंसक , ख़ुलूस--सरल स्वभाव ,
हस्ती-ए-मालूम --वास्तविक जीवन , सरापा--सब कुछ ,
जहने-रसा--मस्तिष्क तक , हयात--जीवन , बहिश्त--स्वर्ग ,
ख़ल्क़ --संसार , किश्ते-दिल --ह्रदय भूमि
                                                                      शैल सिंह








Wednesday, 15 July 2015

रिस्तों की परिधि में अपना ठिकाना

'' रिस्तों की परिधि में अपना ठिकाना '' 


पढ़ना-लिखना किसी काम न आया
डिग्री बक्शा भीतर रखी सहेजकर
ध्यान-ज्ञान हुशियारी सब धरे रह गए
स्त्री धर्म का कडुवा मर्म ओढ़कर
कभी-कभी विकल एकाकीपन में
निहार लेती फिर रख देती सहेजकर
महकती कल्पना चहकती चेतना
कभी-कभी कलम उठा लेती है
और रच देती नवगीत में अंतर्वेदना
कोई ना जाने मेरे अक्षरो की दुनिया
कौन निखारे मेरे मन्सूबों की कोठियां
विचार,विवेक बुद्धि जैसी मीनारें
भीतर ही भीतर दरक उठती हैं
जब कोई करता गुणगान किसी का
लहूलुहान हो जाती प्रतिभा की संजीवनी
झनझना जातीं वजूद की दीवारें
तौहिनिया श्मशाम के सन्नाटे जैसा चिर देती  
जिंदगी शनैः-शनैः बीत रही काम के तले
बनाती संवारती घर, बुहारती मन का विराट चबूतरा
और निहारती निर्मल सपनों पर जमी गर्द और
दूर-दूर तक देखती उन आयामों को
जहाँ न मैं ना मेरा वजूद ना मेरा नाम
बस हिस्से में काम, मन में सबके लिए मंगल  कामना
खटते रहने का नाम अपने हिस्से में रखना
क्योंकि मैं एक स्त्री हूँ ,इससे इतर मेरा कोई मुकाम नहीं
रिस्तों की परिधि में अपना ठिकाना
सोचती हूँ कब काली रात के बाद वो सुबह आएगी
जहाँ एक स्त्री की बदहाल तस्वीर की जगह
कल्पनाओं का साकार और विशाल आसमान होगा ,
काम से इतर कुछ घड़ी के विश्राम में
जीवन का अनकहा ,अव्यक्त राग उंड़ेल देती हूँ
कागज की छाती पर ,कलम और कागज ही सच्चे साथी हैं
ये ही सच्चे अर्थों में मेरी अनुभूतियों से परिचित हैं
रूबरू हैं मेरी योग्यता और प्रतिभा के शीशमहल से
मन का निनाद इनके सीने पर अभिलक्षित कर
ह्रदय की अनुकृति का आकार और आकृति
इन्हीं कोरे कागज़ों पर महसूसती हूँ ।

                                             शैल सिंह

Tuesday, 14 July 2015

सीख लिया जीने का गुर

  '' सीख लिया जीने का गुर ''

'' जबसे तन्हाई से यारी हुई
  ढूंढ लिया जीने का सुर
  तन्हाई से करके मोहब्बत
  सीख लिया जीने का गुर ''

ये तन्हाई ----

कभी विहँस शरच्चन्द्रिका सी दर्शन करवा देती दिव्य लोक के
कभी झकझोर परिहास से मटमैले लोक में छोड़ जाती तन्हाई
कभी यादों, सोचों का साम्राज्य खड़ा कर चीर देती है सन्नाटा
कभी मन के निर्मम, बोझल त्तम् को आलोक दिखाती तन्हाई  ,

कभी व्यथित कर देती अन्तर्, कभी नाभाष प्रफुल्लता भर देती
कभी निराशा के अंचल हर्षातिरेक से आशा की पूर्णिमा भर देती
कभी तन्हाई के नैराश्य जमीं पर सुख-दुःख के सरसिज बो देती
कभी राह सुझा जाती जीने की कभी झट धीरज संचित खो देती ,

कभी विलास की रानी बनकर मृत स्पन्दन में किसलय भर देती
कभी अलौकिक,अद्भुत संसार लेजा ऐसा मन मतवाला कर देती
कभी नयनों में खारा पानी कभी अविच्छिन्न उत्साह से भर देती
कभी समीर शीतल बन,एकाकी जीवन उपवन  सुरभित कर देती ,

ये जीवन के सांध्य प्रहर का पतझड़, सभी उन्मत्त बहारें लौट गईं
कुछ दिन सुख के घन छलका अब सुख की सारी चंचल  रैन गईं
अब नहीं नूतन कुछ होने वाला 'अपने' सब साथ छोड़कर चले गए
चिर शान्ति, विदारक आह, व्यथा की दाह पास छोड़कर चले गए ,

उम्र के सुने जर्जर तट का सुनसान किनारा, सौन्दर्य निहारे कौन
पीर अपरिमित ममता की वातसल्य की अब आलिंगन धारे कौन
गेह कवि की तन्हाई ,खिलते स्मृति ,कल्पना, भाव के सुमन यहाँ
वीराने मूक अकेलेपन की बनी सुहागन सिंगार सजाती मौन यहाँ,

कभी तो हताश,निराश,विषाद,अवसाद की ऊसरता मिटला देती
कभी जीवन सरिता की उद्गम बन मरुमय उर उर्वरा बना देती
कभी बाल संगिनी बन तन्हाई तन्हाई की नीरवता सहला जाती
कभी ख़ुशी का अलख जगाती कभी ज्वाला बन देह जला जाती ,

कभी तो कुत्सित भाव जगातीं कभी मन का कोलाहल पढ़ लेती
कभी कल्पना के पंक से पंकिल कविताओं की कड़ियाँ गढ़ देती
कभी समर्पित हो अभिव्यक्ति भंगिमा चुपचाप सृजित कर देती ,
कभी चुन-चुन कर भाव हृदय में मुक्त क्लान्त कवि के भर देती

कभी निर्वाक् वो अविचल भाव से कई सुख के आयाम जुटा देती
कभी खामोश सिमट सीने में उमग मधुऋतु की आस लगा लेती
कभी उफ़नती स्याही बन उत्साहित अनंत शब्द भंडार जुहा देती
कभी मन के व्याकुलता की आश्रय बन अरुण ध्वजा फहरा देती ।

                                                                               शैल सिंह


Thursday, 9 July 2015

ढलका सूरज भी आस्मा से निढाल हो

       ढलका सूरज भी आस्मा से निढाल हो        

      ( १ )

है ये कलमा, गजल या शायर की रुबाई
हांल-ए-दिल सुन तबियत सिहर जाएगी ,

जब भी देखेगा दरपन में अपना ही मुख
भोली मासूम मेरी तस्वीर नज़र आएगी ,

चाहे जितनी जलाओ शम्मा इंतजार की
रुत रुठी ना जाने रुठकर किधर जाएगी ,

कुछ कसर छोड़े होते कर वफ़ा का क़दर
क्या पता नज़र बावफ़ा ये बदल जाएगी ,

कितने आँसू बहाये जज्बे तेरे सितम से
इक दिन आईना वही बात रुबरु कराएगी

हजारों मौजें दफ़न कर लीं खामोशियाँ
हिजाब-ए-यार ऑंखें शर्म से झुकी जाएगी ,

                   ( १ )

ये आजू-बाजू तेरे जो आज गुंचे खिले हैं
बह रौ में मत किरन सी बिखर जाएगी ,

तेरी पलको पे टुकड़े कुछ बुलंदी के जो
क्यूँ दिखाते मुझे क्या मेरे घर आएंगी ,

बहेंगी परचम की मेरे निरंतर आँधियाँ
मेरे रुतबों से खुमारी फिर उत्तर जाएगी ,

ढलका सूरज भी आस्मा से निढाल हो
सोच पागल तूं ढल कर किधर जाएगी ,

नहीं रखना मुझे तुझसे कोई भी राबता
ज़िन्दगी में घोल फिर तूं जहर जाएगी ,

जमीं पर पांव रख जरा चलना ढंग से
जो चलन तेरी नज़रों से उत्तर जाएगी।

हिजाब-ए यार--दोस्त की शर्म

                                                शैल सिंह



Tuesday, 7 July 2015

फासले मिट गए चन्द मुलाकात में

'' फासले मिट गए चन्द मुलाकात में ''


वह महफ़िल में आये सभी की तरह
पर लगे क्यों नहीं अजनवी की तरह ,

नज़र क्या मिली कुछ घड़ी के लिए
वीरां ज़िन्दगी में जैसे बहार आ गई
जो ना उनने कहा कुछ ना मैंने कहा
वही ज़ज्बात आँखों के द्वार आ गई,

सांसें मस्त हो गईं डूबकर ख्वाब में
बिन पिए मय जैसी खुमार आ गई
निखर सी गई मेरी दुनिया का रंग
कोई सरगम सी जैसे झंकार आ गई ,

जिस छाया ने पागल किया था मुझे
सामने साया साक्षात् साकार आ गई
करती लाखों जतन ख़ुशी छुपती नहीं  
ज़िक्र बन शायरी लबे-ए-पार आ गई ,

फासले मिट गए चन्द मुलाकात में
करके ऐतबार दिल को करार आ गई
मिली जबसे नजर रौशनी मिल गई
मोहब्बत भरी सावनी फुहार आ गई ।

                                       शैल सिंह

कुछ कड़ियाँ ये भी


          ( १ )

पागल दिल तेरी शीशे से नाजुक दीवारें
क्यों समझता नादान टूट जाने के बाद
क्या पता तुझको तेरी क्या अहमियतें
क्यों जोड़ता किरिचें फुट जाने के बाद ।
                                             

                                                           शैल सिंह


        ( २ )

दंभ, गरूर, घमण्ड, अहंकार, अभिमान, मय
जिसके व्यक्तित्व का हो ये आभूषण, वो उनको मुबारक
करुणा, दया, प्रेम, सहिष्णुता, सदाशयता
जैसे सद्गुण और भाव गहना बने शैल तेरे व्यक्तित्व का ।
                                             
                                                           शैल सिंह 

Monday, 6 July 2015

जालिम करवटें



बेरहम करवटें जगाकर नींद से
भोर का विभोर सपना चुरा ले गईं ,

चाँद से बात कर रही थी ख्वाब में
पलकों पे तिरते परिंदे उड़ा ले गई ,

सूरज का साया दिखा छल किया
रात सितारों भरी छीन दगा दे गई ,

रात भर नींद आई कहाँ याद में ,पर
खुशबु से तर सुबह-ए-शमा दे गई ।

                                 शैल सिंह


Sunday, 5 July 2015

दर्प का रुख पर चश्मा लगाकर न बह

अच्छा इन्सान बन डर ख़ुदा ख़ौफ़ से 
बेआवाज लाठी में होती हैं दुश्वारियां ।

कभी सामने रखकर अपने तुम आईना
पूछ लेना क्या-क्या तुममें हैं खामियां
दर्प का रुख पर चश्मा लगाकर न बह
हवा देखना पहाड़ साधे है खामोशियाँ ।

शक्ल बदलेगी जिस दिन अपना गुमां
साथ अहबाब ना होंगे होंगी तन्हाईयाँ
गुरुर इतना भी अच्छा कब रूप-रंग का
उम्र भर कहाँ साथ दोस्त देतीं रानाईयां ।
 
दम्भ,मद-अहं से लबरेज मिज़ाज लहज़े
आबो-ए-हवा में देखना अपने वीरानियाँ
ये लाव-लश्कर कभी देंगे तुम्हें शिकस्त
रोना फ़ितरत पर कर याद मेहरबानियाँ


अहबाब--लोगबाग,मित्र,समूह
रानाईयां--सौन्दर्य , फ़ितरत --स्वभाव

                                   शैल सिंह  

Monday, 29 June 2015

ये वादियां,फिजायें दे रहीं आमन्त्रण

ये वादियां,फिजायें दे रहीं आमन्त्रण 

कुर्ग,कोडईकनाल,मुन्नार,लोनावाला
अवकाश का आनंद लेने चलें खंडाला ,

कहीं बीत न जाये गर्मी की छुट्टियां
ऊहापोह में झट खुल ना जाये स्कूल
अनदेखा अनजाना अनुभव होने का
मन कचोटता फिर ना रह जाये शूल ,

वन की विलक्षण वनस्पतियां देखने
अनुपम वाटिका,रंग-विरंगे फूलों का
ये वादियां,फिजायें दे रहीं आमन्त्रण
लुत्फ उठाने को अप्रतिम मौसम का ,

पर्यटन के वैबिध्य रूपों का रोमांचक
एहसास कराने सपनीली दुनिया का
कल-कल बहते झरने पहाड़ी बीच से
साक्षात् देखने नजारा डूबते सूरज का ,

सावन की बरसती रिमझिम फुहारें
उस पर अनुपम सौन्दर्य प्रकृति का
भीनी-भीनी ख़ुश्बू सुहाये वारिश की
ठंडी हवा के झोंके नैसर्गिक सुंदरता ,

हरी-भरी लगतीं खूबसूरत पहाड़ियां
झरनों के इर्द-गिर्द चादर बादल का
कण-कण स्वागत करती मुग्ध धरा
मानसून के जीवन्त सुरभित रंग का ,

प्राकृतिक सुवास से प्राण प्रस्फुटित
पेड़-पत्ते,जीव-जन्तु ,नदी पोखर का
छटा मनोहर भाये मंजुल गोधूलि की
शान्त,एकांत सदाबहार गिरी दल का ,

प्रकृति का अद्भुत उपहार समेटे पहाड़
अलौकिक अनुभूति,मोहक रमणीयता
अनगिनत अनोखी दर्शनीय जगहें यहाँ
बर्फीला रेगिस्तान औ मरुस्थल दिखता ,

अनदेखे कोनों की आओ याद सहेजने
शहरों की हलचल से बिल्कुल अलहदा
जिस सैर से सैलानी मन हो बाग़-बाग़
आओ मस्त चाँद देखो नीले अम्बर का ,

फैला मदहोशी का आलम दूर-दूर तक
कुनकुनाती धुप चहकती आबोहवा का
आह्लादित मखमली,अनछुई वादियां
कौतूहल से कल श्रृंखला नीलगिरि का।

मंजुल--सुन्दर , कल--सुन्दर ,
                                              शैल सिंह



Saturday, 27 June 2015

मुझे नकारा न समझो अरे दुनिया वालों

एक इंसान जो रोजी-रोटी के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है ,असफलताओं ने उसे तोड़कर रख दिया है दुनिया उसे नकारा कहती है ,लोग उसपे तंज कसते हैं,उम्र ढलती जा रही ,जिम्मेदारियां बढ़ती जा रही, सभी कोशिशें नाक़ाम ,उसकी अंतर्व्यथा मैंने अपनी कविता में पिरोया है ,आगे....

'' मुझे नकारा न समझो अरे दुनिया वालों ''

मजबूरियां कोई खरीदकर नहीं लाता
लाचारियां भी बाज़ार में नहीं मिलतीं
अगर मिलती किस्मत किसी हॉट में
कीमत अदा कर लाता उम्र नहीं ढलती ,

किसी की मजबूरियों पर मत हंसिए
मजबूरियां कोई खरीदकर नहीं लाता
आप भी डरिये जरा वक्त की मार से
बुरा वक्त कभी यूं बताकर नहीं आता ,

अक़्ल का चाहे जितना धनी हो कोई
बिना तक़दीर के मंज़िल नहीं पाया
बीरबल अक्ल का शहंशाह होकर भी
कभी बादशाहत का ताज़ नहीं पाया ,

जीने देतीं आशाएं ना तो मरने देतीं हैं
जाने क्यूँ रूठा है मुझसे मुक़द्दर मेरा
खुद के कंधे पर सर रख रो सकता नहीं
न गले खुद को लगा दिल बहलता मेरा ,

ढो रहा जिंदगी बेहिसाब औरों के लिए
जो मुझे चाहते ज़िंदगी बस उनके लिए
सुबह-शाम वक्त उनपे करता हूँ जाया
जीने का नाम जिंदगी है दूसरों के लिए ,

रिश्ते मोहताज नहीं होते हैं पैसों के जी
अमीर बना देते जरूर बिन पैसों के भी
कुछ रिश्ते मुनाफ़ा नहीं देते पर जीवन
अमीर बना देते पोंछ उदासी के सीलन ,

ओ अमीरों गर बनते हो धनवान इतने
तो बेशक़ीमती मेरी बदनसीबी खरीदो
लौटा दो मेरी बेहतरीन बिखरी अमानत
बेचारगी,लाचारगी भरी दिल्लगी खरीदो ,

मुझे नकारा न समझो अरे दुनिया वालों
बस मुकद्दर का मारा हुआ एक इंसान हूँ
असमंजस के भंवर में डूबता उतराता रहा
तुम्हें क्या पता कैसी हस्ती और पहचान हूँ ।

                                     शैल सिंह


Tuesday, 23 June 2015

फ़तह की चिट्ठी सीमा से घर आई है









'' फ़तह की चिट्ठी सीमा से घर आई है''


डर सताती रही ख़ौफ़ की हर घडी
फ़तह की चिट्ठी सीमा से घर आई है
मन मतवाला गज सा हुआ जा रहा
ख़ुशी चल एक विरहन के दर आई है ,

बिछ गए हर डगर पर पलक पांवड़े
उनके आने की जबसे खबर आई है
सरसराहट हवा की प्रिय आहट लगे
उनके कदमों की ख़ुश्बू शहर आई है ,

महकने लगी हर दिशा हर गली आज़
जिस्म का उनके चन्दन पवन लाई है
लीन सांसें आज़ स्वागत में पागल हुईं
कोई राह रोके ना जिंदगी भवन आई है ,

उठे निष्पन्द वदन में भी अंगड़ाइयां
सूनी अँखियों में अंजन संवर आई है,
मन का हिरना कुलांचे भरने लगा है
मन समंदर में हलचल लहर आई है ,

भोली आशाएं कबसे तृषित थीं सनम
वही परिचित सा झोंका जिगर भाई है
चाँद,तारों,सितारों की बारात का बिंब
लगे नीले नभ से धरा पर उत्तर आई है ,

मुख मलिन था दिखाता सदा आइना
उसी में सौ रंग ख़ुशी के नजर आई है
तार झंकृत दृग के इक झलक वास्ते
पथ निरख हर बटोही के गुजर आई है ,

सज कलाई में सावन की चूड़ियाँ हरी
बोल अधरों पर कजरी का भर लाई है
कितने कुर्बा हए सुहाग वतन के लिए
गेह इस सधवा की रोली मगर आई है ,

                                    शैल सिंह





दो क्षणिकाएँ

                            ( १ )

देखिये गौर से अब गरीबी नहीं कहीं देश में
बहरूपियों की आदत गरीबी के चोले में है
अलहदी बना दिया है बी. पी. एल. कार्ड ने
उसपे आरक्षण की सौगात भी  झोली में है ,
असाध्य बीमारी हुआ है आरक्षण का कोढ़
बौद्धिकता का स्तर खतरे की टोली में है                        
जिन्हें मिल जा रहा सब कुछ बैठे बिठाये
उनमें आ गया नक्शा अहंकार बोली में है  ।

                 ( २ )

कभी किसी का बुरा हम नहीं चाहते
इतना देना भगवन कि ईर्ष्या ना हो
महके चाहत के फूलों से जीवन मेरा
पंख उड़ानों को देना कि ईर्ष्या ना हो
सारे जग का पिता एक तूं ही ख़ुदा है
बस एक सी नजर हो कि ईर्ष्या न हो
तुम्हारी तराशी हुई हम भी तस्वीर है
कर चित्र इक सा उकेरे कि ईर्ष्या न हो ।
                                       कर -हाथ
                                     शैल सिंह

Saturday, 30 May 2015

आज भी कोई प्रेमचंद फिर से लिखे गोदान

रीढ़ की हड्डी तोड़ रही कर्ज का भारी बोझ 
रंगदारी,दबंगई वसूली की जमात घर रोज   

अधमरे खेतों में पड़े औंधे बेजान निर्जीव
देख दुर्गति फसलों की उड़ गई है नींद 
तपे तवा सी धरती उगले सूरज आग 
कलप रहा किसान हाथ लिए सल्फास ,

मौसम हुआ हठीला निर्मम हुई हवाएं 
सारी मेहनत खाक़ हुई हथेली आपदाएं 
लुटा हुआ किसान निरख रहा आकाश 
प्राण आधे रह गए भूख लगे ना प्यास ,

बदहाली दुर्दिन की समझे कौन व्यथाएं 
अंतस में दफ़न हुई सूली लटकी वेदनाएं 
जुल्म की पूरी कहानी कह रही मरुभूमि 
उजड़ा हुआ माली,बुने सपने हुए यतीम ,

झूठी सांत्वना की पूँजी खोखली संवेदनाएं 
फितूर साबित हो रहीं हैं जन-धन योजनाएं 
मौन का ताला लटका ओहदोँ की शाख पर 
मर्म पर मरहम कहाँ पट्टी पड़ी आँख पर ,

अन्नदाता कुण्डली उल्कापात,ओले पानी 
फिर से पुनर्जीवित हुई होरी की नई कहानी 
आज भी कोई प्रेमचंद फिर से लिखे गोदान 
ठंडे बस्ते धूल फांकें बौने आंकड़े औ प्लान ,

क्षतिपूर्ति के समाधान पर टंगा घना अँधेरा 
हाहाकार मिटाने कब आयेगा सुखद सवेरा 
राजधानी हृदयहीन यथार्थ पतन का जाने 
जीवन खाली कैनवास रंग भरना ना जाने । 

                                            शैल सिंह 

Tuesday, 26 May 2015

बेपनाह मोहब्बत हर शै लुटाने लगी है


बेपनाह मोहब्बत हर शै लुटाने लगी है 

इक तासीर दिल को जब से मिली है
ज़िन्दगी झूम कर मुस्कराने लगी है

अमां का कासा मिला मिली जिंदगी
गीत ख़ुशी के जुबां गुनगुनाने लगी है

इनाम मुझे मेरी परस्तिश का मिला
सांसों-सांसों में मस्ती समाने लगी है

सप्तरंगों में दुनिया सज़ी ख़्वाबों की
उन्नींदी रातें चांदनी में नहाने लगी है

झनझनाने लगे हैं सभी तार मन के
सुर टूटे तारों की वीणा सजाने लगी है

मोतियों में हुईं आँसू की बूंदें तब्दील
उदासी वैरागन नग़मा सुनाने लगी है

खुलुश मिल गया है शाद दिल है मेरा
फिर आरजूवें महफिल सजाने लगी हैं

दर्दों में डूबी थी जो आज तक बंदगी
आ के सपनों में ताबीर पिराने लगी है

रातें सितारों से जगमग मेरी हो गईं
लहरें किनारों से बातें करानें लगी हैं

आके देखो वाहयातों मेरी नाचीज़ पर
बेपनाह मोहब्बत हर शै लुटाने लगी है

ठहर सी गयी थी जो ज़िंदगी मोड़ पर
वो ही रास्ता कई अब दिखाने लगी है

तलाश में जिसकी बेजां हम दर-दर हुए
आके मकसदें सामने सर झुकाने लगी हैं

कैसे-कैसे गमें-दौरां से गुजरे हम शैल
सबा नूर सहन-ए-ख़िज़ाँ बरसाने लगीं हैं ।

सहने-ख़िज़ाँ--पतझड़ के देहरी
अमां का कासा--चैन संतुष्टि का कटोरा

                                                 शैल सिंह















Saturday, 23 May 2015

" गजल "

मेरे ख़्वाबों में आना दबे पांव तुम
चराग़-ए-वफा बुझ ना जाए कहीं

झिलमिला रहे लम्हें हंसीं यादों के
लम्हा ये तन्हा गुजर ना जाए कहीं

अश्कों से गीली पलक की जमीं है
मोहब्बत में हम मिट ना जायें कहीं

माना मजबूर तूं पर मोहब्बत नहीं
अहदो-पैमान ही रह ना जाए कहीं

चांदनी शब में ढूंढतीं हैं निगाहें तुझे
वीरां मुंडेरों टिकी रह ना जाएं कहीं

नींद से रहती बोझिल मगर जागती
दर से आहट वो मुड़ ना जाए कहीं ।

अहदो-पैमान--वादे कसमें

                       शैल सिंह




बचपन की उन्हीं गुफ़ाओं में

''बचपन की उन्हीं गुफ़ाओं में''


तन्हाई के पहरों पर जब यादें देतीं हैं दस्तक
बहती यादों की पुरवा में खो जाती हूँ हद तक,

ओ अतीत की खूबसूरत तस्वीरों मत आया करो मेरी सुप्त शिराओं में
वक्त के आईने में ढल सकी ना भटकती हूँ बचपन की उन्हीं गुफ़ाओं में ।

खुल जाता खुशनुमा पिटारा बचपन की उन सँकरी गलियों का
जहाँ न कोई आपाधापी,प्रतिस्पर्धा,ईर्ष्या होतीं बस अतीत की
अच्छी बुरी झलकियाँ ,गिल्ली डंडा,कंचे और बाग़ की अमियाँ ,
सुन घनघनाती घंटी कुल्फी,बरफ बेचने वाले की ,दौड़ना चोरी से
धान,गेहूँ से भरकर डालियाँ ,

यादें पुरानी जब चित्र उकेरतीं मन की दरकती दीवारों पर ,फिर तो
जिवंत हो उठतीं बीते दौर की कितनी बातें ,दौड़ती भागती जिंदगी
की मीनारों पर ,यादें नहीं देखतीं वक्त मुहूर्त,संरक्षित रखतीं यादों के
सन्दूक में सारे सूत्र ,डायरी के पन्नों पर लिखे इबारत,पत्रों की पोटली
कविताओं की कच्ची कड़ियाँ,

सहेजे हुए फोटोग्राफ के सभी पुलिंदे जो भारी पड़ते आज के फेस बुक ,
जीमेल चैट पर ,भावों की भंगिमा खो गई नई-नई तकनीकों की सैट पर
मासूमियत भरे दौर धराशाई हो गए ख्वहिशों के बड़े-बड़े महलों में दबकर
मुखर हो गयी वही पुरानी याद आज फिर जिंदगी के शो केस में सजकर
बन फूलों सी कोमल कलियाँ ,

छोटे शहर ,गाँव की पृष्ठभूमि से कभी जुदा नहीं होने देते यादों के ख़ुश्बू इत्र
कागज के टुकड़ों पर लिखे भूले बिसरे गीत वो पल सुहाने भूले नहीं चलचित्र
घर के पिछवाड़े बाग़ बगीचे की सैर,नदी,पोखरा घाट नहाना धूल भरा वो पैर,
जामुन की दाग से रंगे लिबास,खेल-खेल में बैर ,हाथ में बाबा का मोटा डंडा  
लुका छिपी खेल की घड़ियाँ,

आज समाज के बंजर मरुभूमि में नहीं दिखाई देता वैसा छतनारा सा पेड़
जहाँ बैठ सुकून से लगे ठहाके ,गपशप ,ना पता चले गर्मी की छुट्टियां ना
दिखें कहीं बकरियां भेंड़,खुलकर आनन्द लेने के दिन लद गए ,रह गए बस
निन्यानबे के फेर ,पूर्वजों की धरोहरें कौन सहेजे ,जने-जने के शहर-शहर में 
बंगले गाड़ीयों की लड़ियां ,

बन्ना बन्नी के गीत ना भूले ,दादी बाबा चाचा चाची की प्रीत ना भूले ,वक्त
की भीड़ में भूले खुद को पर परम्परा और रीत ना भूले ,एकल परिवार से सारे
रिश्ते गायब ,निरा अकेलापन तन्हाई का दंश,,सारी जगहें रिक्त पड़ीं हैं जिसे
भर नहीं सकते मोबाईल कम्प्यूटर के अंश,आँखों सम्मुख फीकी लगे ,अतीत
के आगे ये पर्याप्त सामग्रियाँ ,

रीति रिवाज संस्कार हुए गुम ,नई पौध ने बदल दिया समाज ,ये कैसा आगाज़
बिखरते परिवार की देख मलानत अब मौसम में भी नहीं बहती पहले सी बयार
नेह प्रेम के भावों में भी सच्ची नहीं फुहार,सांय-सांय दोपहरी ताश का खेल नीम
तले बैठें मिल यार ,सामाजिक मुद्दों पर चर्चा कौन करे ,सुख-दुःख की परवाह
किसे ,मन में गाँठ की झड़ियाँ ,

ओ अतीत की खूबसूरत तस्वीरों मत आया करो मेरी सुप्त शिराओं में
वक्त के आईने में ढल सकी ना भटकती हूँ बचपन की उन्हीं गुफ़ाओं में ।

                                                                                            शैल सिंह


Friday, 22 May 2015

वो बेवफ़ा

      ''वो बेवफ़ा''

मेरी वफ़ा का सिला क्या ,तूने दिया वो बेवफ़ा
अच्छी निभाई यारी ,संग यार के वो बेवफ़ा,

पूछते सभी सवाल मुझसे अनुत्तरित जुबां है
बदनीयत पे हैरां हूँ मैं ,वो इकरारे रुत कहाँ है
वो इकरारे रुत कहाँ है
रुसवा किया है तुमने ख़यालात को वो बेवफ़ा ,

जिस तरह से रेजा-रेजा मेरी अर्से-वफा हुई है
तूं भी रोये खूँ के आँसू अना घायल मेरी हुई है
अना घायल मेरी हुई है
हो ज़न्नत मुझे नसीब तुझे दोज़ख़ वो बेवफा ,

चकाचौंध दौलतों की तूने गिरवी ईमान रखा
बड़ी सादगी से मेरी शराफत पर अज़ाब रखा
शराफत पर अज़ाब रखा
इस गुनाह की तुझे खुद ख़ुदा सजा दे वो बेवफा

दिखाया नकली चेहरा ऐतबार का कतल कर
फूलों से ज़ख्म खायी काँटों से बच के चल कर
काँटों से बच के चल कर   
तेरा आशियां जले मेरा घर रौशन हो वो बेवफा ।

                                                             शैल सिंह

Saturday, 9 May 2015

'' किसानों की बेबसी ''

'' किसानों की बेबसी ''

ओ रे मेघा बरसकर बेमौसम
तूने कैसी क़हर बरपाई
ओला वृष्टि कर बेवक़्त तूने
की चौपट हा श्रम की कमाई ,

क्यों अकड़ में तूं अन्धा हुआ रे
मुर्दा हसरतों पे ऑंख डबडबाई
ताब में इतना पागल हुआ है तो जा
देख आ सूखी बंजर धरा की बिवाई ,

सपनों का आधार फसलों की पूंजी
क्यूँ ना क्षति से रूह तेरी कसमसाई
थी बेटी के हाथों की हल्दी जिस बूते
वो बल तोड़कर किया तूने धराशाई ,

गले फसरी लगाने को मजबूर कर दी
कहाँ गई तेरी भलमनसाहत भलाई
संवेदनाविहीन हुआ झमाझम बरसकर
क़र्ज़ कैसे चुकायेंगे तबाह कृषक भाई ।

गिरवी गहने ,घर बंधक उधारी की मार
दशा दीन हीन देख भी शरम नहीं आई
रंक फकीर बेबस बनाया रे मक्कार घन
देख ले अन्न की तूं भी दुर्दशा ओ कसाई ।






Saturday, 11 April 2015

देवी उपाधि नहीं मन भाती


जब-जब होती हूँ तनहा 
काटे कटता नहीं जब लमहा
तब-तब कलम सखी बनकर
शब्दों का जामा जाती पेहना  ।

मेरे अनुरागी मानस पर
जब वैराग औ राग उफनते हैं
आँखों के आँसू स्याही बनकर
अंतर का दर्द उगलते हैं ।

नारी शब्द से नफ़रत होती है
अबला नाम से होती घृना
बंधन बिंदिया,पायल,कंगन
ताक़त इनसे होती बौना ।

त्याग,तपस्या,ममता की मूरत
देवी उपाधि नहीं मन भाती
वात्सल्य की मोहरा बन नारी 
बैरी जग से छली है जाती ।

तुझे दुवा दे या करे शुक्रिया अदा
बता ऐ अपराधी,अन्यायी ख़ुदा
आँचल में दूध औ आँख में पानी
क्यों लिखी उसकी ही ऐसी बदा ।

बाँहें पालना अङ्क सुखों की शैय्या
जिसकी गोदी में सुखद बसेरा
दिन-रात जली जो दीपशिखा सी
अंतस में क्यों उसके गहन अँधेरा ।

                                              शैल सिंह

Wednesday, 18 March 2015

जिन अधरों ने उनको पुचकारा


औरत कितनी बदक़िस्मत हाय 
मर्दों के हाथ का मात्र खिलौना है  ,

जिस माँ ने जनकर मर्द तुझे
इक मर्द होने का नाम दिया
उसी का मान सम्मान मसल
तुमने सरेआम बदनाम किया ,

औरत कितनी बदक़िस्मत हाय
मर्दों के हाथ का मात्र खिलौना है ,

उस पुज्यनिया की लूट आबरू 
दर्पित होकर अभिमान किया
चिथड़े-चिथड़े कर अस्मत के
उसे सरेबाज़ार निलाम किया ,

औरत कितनी बदक़िस्मत हाय
मर्दों के हाथ का मात्र खिलौना है  ,

तूमने जान कोख़ में कन्या भ्रूण
इक माँ को बेवश मजबूर किया
कचरे का ढेर समझ निरीहा को
अस्तित्व बिन जने ही चूर किया ,

औरत कितनी बदक़िस्मत हाय
मर्दों के हाथ का मात्र खिलौना है  ,

घर का चिराग़ इक मर्द ही हो
ताकि मर्द बने बेगैरत तुझसा
माँ,बहन,बेटी की अस्मत लूटे
चिल,कौव्वा,गिद्ध बन तुझसा ,

औरत कितनी बदक़िस्मत हाय
मर्दों के हाथ का मात्र खिलौना है  ,

बाप,बेटा,भाई,का फ़र्ज भूलाकर
मर्द तूमने दानवता का रूप धरा
तूमने मानवता को शर्मसार कर
विकृत सोच से मानस कूप भरा  ,

औरत कितनी बदक़िस्मत हाय
मर्दों के हाथ का मात्र खिलौना है  ,

ख़रीद-फ़रोख़्त में वही बिकी रे 
नंगी शोभा बनी दर-दरबारों की
संसार के लिए वह वस्तु हो जैसे
भोग की साधन इज्ज़तदारों की,

औरत कितनी बदक़िस्मत हाय
मर्दों के हाथ का मात्र खिलौना है  ,

पीर ज़ज्ब कर हर जुल्म सहे वो 
हर खता पर बस नाम उसी का
मर्दों के सेज़ की कामुकता पर
हा अस्मिता सजे चिता उसी का ,

औरत कितनी बदक़िस्मत हाय
मर्दों के हाथ का मात्र खिलौना है ,

हक़ सारा प्रभु ने मर्दों को दिया
औरत के लिए सजा जीवन भर
जिन अधरों ने उनको पुचकारा
उसका व्यापार किया जीवन भर ,

औरत कितनी बदक़िस्मत हाय
मर्दों के हाथ का मात्र खिलौना है ,

जिस लहू ने कोख़ में तुझे तराशा 
उसका कैसा ये मोल दिया तुमने
जिसने दर्द सहा पल्ल्वित किया
उसे सरेबाज़ार तोल दिया तुमने ,

औरत कितनी बदक़िस्मत हाय
मर्दों के हाथ का मात्र खिलौना है ,

इस्मत के बदले एहसान जताया  
टुकड़े-चीथड़ों पर पालकर अपने
ख़ुद तपकर सृष्टि की रचना की
उसी के चूर किया खारकर सपने ,

औरत कितनी बदक़िस्मत हाय
मर्दों के हाथ का मात्र खिलौना है ,

मर्दों के हवस की शिकार बनी और
कुलटा पापन कहलाई अंधे जग में
हद पार करी हर बेशर्मी की मर्दों ने
दाग लगाकर छोड़ी गई दलदल में,

औरत कितनी बदक़िस्मत हाय
मर्दों के हाथ का मात्र खिलौना है ,

जब सब्र तोड़ता ग़ुरबत औरत का 
हारकर चकलों में जा लेती पनाह
अधम पेट ,मर्दों के भूखे उदर लिए
बैरी जग का सीने में समेटती आह ,

औरत कितनी बदक़िस्मत हाय
मर्दों के हाथ का मात्र खिलौना है ,

कैसी क़िस्मत पाई बेचारी औरत
कैसी तकदीर की निकली खोटी
कैसी बदनसीब हा सृष्टिदायिनी
अपने बेटों की सेज सजीं माँ,बेटी,

औरत कितनी बदक़िस्मत हाय
मर्दों के हाथ का मात्र खिलौना है ,

वह तो रस्मों रिवाज़ की वेदी चढ़ी
ऐश का सारा हक़ नाम तुम्हारे मर्द
जिन्दा जलने को तूने मजबूर किया 
बलिदान कहा देकर उसे तुमने दर्द ,

वज्र की छाती वाली धरती माँ सी
मर्दों के लिए हा मात्र खिलौना बस।
                                             शैल सिंह






Sunday, 8 March 2015

'' महिला दिवस पर ''

'' महिला दिवस पर ''

व्यवधानों से करके दोस्ती
दिक्कतों की परवा न की  
तोड़ कर पांव की बेड़ियां
हौसलों को ऊँची उड़ान दी  ,

संघर्ष बन गई ताक़त मेरी
तय की दूरी अंतरिक्ष की
पाल पोस कर ख़्वाब को
ख़ुद मन्सूबों को निखार ली ,

सशक्त कर भूमिकाओं को
ख़ुद को इक नई पहचान दी
मानकों की तोड़ दीं परिधियाँ
कुचले ज़ज्बों को संवार ली ,

ख़ाहिश नहीं महिमामण्डन की
ना कोई चाहतें सहानुभूति की
भभक उठी सदियों की वेदना
उबली सिसकियाँ जो दबी थीं ,

बेहतर समाज की हैं भागीदार
प्रगतिशील हुईं आज़ नारियाँ
परम्पराओं की तोड़ सींखचें
प्रतिभावान हुईं हमारी बेटियाँ ,

जरुरत है समाज की सोच में
संकीर्ण नजरिये में बदलाव की
वरना हो विवश लेंगी हाथ में 
ख़ुद निडर कमान क़ानून की ।
               
                                 शैल सिंह



अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर मेरे ये वक्तव्य

'' अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर मेरे यह वक्तव्य ''

माँ,बहन,बेटी,पत्नी,प्रेमिका का
मत हममें बस फर्ज तलाशिये
आन्तरिक ताक़त पहचानिये
बस हमारा ज़ज्बा निखारिये। 

क्यों हमारे लिए ही केवल 
तय किये गए मानक
क्यों हमारे लिए ही केवल 
खींची गईं रेखाएँ 
क्यों खुदा ने भी की
बेईमानी लिंगभेद कर 
मानक और पाबंदियाँ 
दोनों लिङ्गों के लिए क्यों नहीं 
क्योंकि ख़ुदा भी मर्द है
हमें कमजोर पहलू की 
स्वामिनी बनाकर क्यों ?
पुरुष को हैवानियत और 
दानवता का दर्प दिया 
जब-जब दर्द मिला 
मौला तेरे लिए बद्दुवा निकली 
तुमने किया भेदभाव और 
नारी मुखर हुई मजबूत होकर 
अगर नारी सशक्त हुई है 
अगर नारी क़ामयाब हुई है 
अगर नारी ने अन्याय के ख़िलाफ़ 
आवाज़ उठाई है ,बेहूदे समाज से 
यदि जंग लड़ी है ,तो खुद को जगाकर 
भगवान उसमें तेरा क्या योगदान
ये ज़ज्बा जागा है तो अन्याय के कारण 
अगर नारी सुदृढ़ हुई है तो भेदभाव के कारण 
तुमने तो हमें गाय और देवियों की उपाधि देकर
हमें दबाने और कुचलने का स्वांग रचा 
हमारी अस्मिता जब कुत्ते नोचते हैं 
तूं लिलाहारी बनकर लीला देखता हैं
असली गुनहगार तो तूं है
दुआँख्खा कहीं का
हमीं चढ़ें दहेज़ की बलि 
हमारा ही हो बर्बरता से शोषण 
छेड़छाड़ अत्याचार हमीं पर 
सभ्य व्यवहार की उम्मीद हमीं से 
जहाँ हमारे सम्मान की रक्षा नहीं 
जिस समाज द्वारा हमारी हिफ़ाजत नहीं
ऐसे समाज को थू 
गन्दी मानसिकता को थू 
हमने अब हथियार उठा लिया है 
वीणा उठा लिया है नारी सशक्ति का
नारी सशक्ति का ।
                           शैल सिंह    

Saturday, 28 February 2015

'' मेरी वफ़ा बदनाम हुई ''

'' ओ दोस्त बेवफ़ा ''


बेवफ़ाई का कलमा लिखा
दोस्त तेरे लिए नज़ीर यही ,

हमें ना बहलाओ लोरी से
बालक नादान नहीं हैं हम
उद्भट विद्वान नहीं फिर भी
इतना भी ज्ञान नहीं है कम ,

शतरंज की गोट बिछाकर
नपुंसक चाल को दाद है दी
इस गुमां में मत रहना दोस्त
तेरे धूर्त विसात ने मात है दी ,

बड़ी बेहया से मेरी अना को
तूने दर्द की जो सौगात है दी
तुझे तेरे किये की मिले सजा
बददुवा तुझे दगाबाज़ जो की ,

ख़ुदा क्या बख़्शेगा तुझे कभी
चतुर चाल पड़ेगी तुझपे भारी
मेरे नये उड़ानों को पंख लगेंगे 
मुबारक तुम्हें तुम्हारी ग़द्दारी ,

तूमने ऐतबार का ख़ून किया
और मेरी वफा बदनाम हुई
ईमान तेरा रोये खून के आँसू
मेरी तल्ख़ जुबां अब आम हुई ,
                                    शैल सिंह

Friday, 27 February 2015

'' ख़ुमार फागुन का ''


अँखिया निहारे पन्थ
करती निहोरा कंत
पुरवा लगे अनन्त
आ जा परदेशी कंत ,
 
चढ़ गया रंग फागुन का मन पे
तन रंग गया वसन्ती रंग
सराबोर भींजि जाये चुनरिया
हर रंग में चोलिया अंग ,

बदला मौसम का ढंग
पुरवा लगे अनन्त
काहे बने हो संत
आ जा परदेशी कंत ,

मंद-मंद बहे पछुवा रसीली
गुलाबी सिहरन भरे उमंग
ग़जब मुस्की मारे पतझर गुईंया
चौपड़ खेले बहारों संग ,

मधुमासी पी के भंग
पुरवा लगे अनन्त
काहे बने हो संत
आ जा परदेशी कंत ,

पीत वसन में गहबर सरसों
लगे नई नवेली नार
कलियों ने घूँघट पट खोला
मोहक कर सिंगार पटार ,

रसिक मिज़ाज भृंग
रसीला तितली संग
काहे बने हो संत
आ जा परदेशी कंत ,

नरम तेवर भये पूस माघ के
ठंडी शनैः-शनैः निष्पन्द
नया कलेवर ले पाहुन आये
सुस्त शिराओं में उठे तरंग ,

आ जा लगा के पंख
पुरवा लगे अनन्त
काहे बने हो संत ।
मोरे परदेशी कंत ,

                          शैल सिंह








हमारे गाँव की होली

बदलते मौसम की तरह
बदल गए सब रीत रे
कहाँ वो फगुवा बैठकी
कहाँ जोगिरा गीत रे ,

'' हमारे गाँव की होली ''


ढोल,मंजीरे,झाल थाप पर
अब हुरियारों की टोली
झूमते,नाचते,गाते कबीरा
कहाँ हम जैसे हमजोली ,

गली,मोहल्ले की भऊजाई
खोल झरोखा ताक-झांक में
नटखट देवरा कब गुजरेगा
साँझ-सवेरे इसी फिराक में ,

डाल घूँघट मुख दौड़ें दुवारे
मुट्ठी मा करिया रंग दबाय ,
बुरा ना मानो होली है,बहुवें 
कहि बुढ़वों को देवर बनाय ,

कीचड़ सनी बाल्टी उँड़ेलें
नेह से माथ लगा के रोली
सारा रा रा होली है धुन पे
करें चुटकी काट ठिठोली ,

भिनुसारे से ही भांग-ठंडई
ओसारे,अंगना नाऊ कहार
रगड़-रगड़ सिलबट्टे घिसें 
सखी गा-गा मस्त मल्हार ,

करूँ अपने ज़माने की बातें
आज की नई पीढ़ी दे घघोट
पश्चिमी सभ्यता निगली जैसे
गमछा,धोती ,जनेऊ ,लंगोट ,

प्रीत के रंग में रंगे वो रिश्ते
बदरंग होकर गए महुलाय
वक़्त ने तेज़ी से रफ़्तार धरी
इक्क्सवीं सदी गई सब खाय ।
 
जब-तब यादें बहुत सताती
घिर आती हैं आँखों में घटा
रिश्तों में जो तब मिठास थी
अब कहाँ वैसी रंगों में छटा ,

                                  शैल सिंह








 


Sunday, 22 February 2015

दस्तूर दुनिया का निभाना है ,


दुनिया भर की दुवाएं देकर
तुझे नए परिवेश सजाना है ,

बेटी छोड़ नगर नईहर का
सुख वैभव छोड़ पीहर का
नाज़ों पली मेरी राजदुलारी  
प्रितम का संसार बसाना है ,

करना हिया से पराई लाडो 
दुनिया का तो रीत पुराना है
कर पाषाण कलेजा गुड़िया
दस्तूर दुनिया का निभाना है ,

छोड़ के आँगन बाबुल का
ममता का छोड़ के आँचल
छोड़ तुझे वीरन का चऊरा   
विरवा रिश्ता नया बनाना है ,

निमिया का छोड़ बसेरा तुम  
सजन मुंडेर चहकना चिरई
घर पिया के आँखों की पुतरी
डोली चढ़के विदा हो जाना है ,

तेरे यादों की बदली जान मेरी 
उमड़-घुमड़ नयनों से बरसेंगी
ऑंखें फुलवारी की ओ फुलवा
तेरे दामन देख ख़ुशी भी हर्षेंगी ।
                    
                शैल सिंह

Saturday, 21 February 2015

ज़मीर नीलाम कर शर्म न आई

'' ज़मीर नीलाम कर शर्म न आई ''
                     [ १ ]     

ख़ामोशियों से मत मेरे अंदाज़ लगा लेना
कि हम भूल गए तुझे गुनहगार बता देना ,

बड़ी सादगी से ख़ंजर कर दिल के आर-पार
हमनफ़स तोड़ राब्ता की नई राह अख़्तियार ,

तुझसे निज़ात पाकर ख़ुश हम भी कम नहीं
वरना खाते ज़िन्दगी भर धोख़े कोई ग़म नहीं,

फ़ितरत का दिखाया तूने है बेहतरीन नमूना
फुर्सत में बैठकर ख़ुद को दिखा लेना आईना ,
                      
                         [ २ ]

ज़मीर नीलाम कर शर्म न आई नामुराद कितनी हुई रूसवाई

घात लगाकर तूने दिया है दोस्त ,धक्का विश्वास की सीढ़ी से
अर्से की वेरही बाड़ तोड़ ,नई बाड़ लगाई स्वार्थ की सीढ़ी से ,

सम्मानों की पसलियाँ चूर-चूर कर ,ख़ूब मान बढ़ाया रसूखों से
बेवफ़ाई का काँटा कैसे निकालूँ ,तेरे वेहयाई के ढींठ सुलूकों से ,

हम तो टिके रहे उसूलों पर ख़ैर ,तुम सिद्धांतों को रौंद बढ़े आगे
हमने ही मार्ग प्रशस्त किया औ ,हमीं को शिक़स्त दे छल से भागे ,

सरे बाज़ार मख़ौल उड़ावाया है ,क्या ख़ूब बेमिसाल सम्बन्धों का
ज़मीर नीलाम कर शर्म न आई , सहारा बेतुके तर्क के कन्धों का ,

                                                                शैल सिंह