Thursday, 13 November 2014

मन के शोर हैं या हक़ीक़त नहीं जानती

ये बंद हैं या शेरो शायरी मैं नहीं जानती
मन के शोर हैं या हक़ीक़त नहीं जानती ।

( १ )

रुत बदलती है मौसम बदलते हैं रोज,
दिन महीने और साल गुजरते हैं रोज
बस बदलती नहीं है घड़ी इंतज़ार की,
जाने कितने गली से गुजरते हैं रोज ।

( २ )

ग़मों का अम्बार इतना ज्यादा है कि
गम गैरों के सहलाने की फुरसत नहीं
गैरों की ख़ुशी से सरोकार मुझको नहीं
ख़ुशी मेरे दर का रुख़ जब करती नहीं ।

( ३ )

सितम ढाए हैं बहुत से सितमगर मगर
जख्म खा-खाकर दिल पर संभलते रहे
ग़मों में शामिल हुए ग़म हजारों मगर
अज़ाब शानों लिए रेगज़ारों पे चलते रहे ।

( ४ )

हवाओं का दरीचे से बेरुख़ी से मुड़ के जाना
आवारा सडकों पर सोचों की प्रायः टहलना
दिल का परदा हिलाना गवारा भी ना समझा
दरे-जाना से लौटकर हरीमे-ग़म में भटकना ।

अज़ाब -मुसीबतें । शानों--कांधा । रेगज़ारों--रेगिस्तान
दरे-जाना- प्रिय के द्वार । हरीमे-ग़म--दुःखों के सहन में ।

                                                            शैल सिंह

Tuesday, 11 November 2014

मन के उद्गार

मैं अपने मन की कुछ बात कहना चाहती हूँ बुद्धिजीवी लोगों से ,क्योंकि मैं भी अपनी बेटी के रिश्ते के लिए आजकल इन चोंचलों से अज़ीज आ रही हूँ ,कब लगाम लगेगी इन कुंडली के चक्करों की जोड़-तोड़ को ,ज्योतिषियों की भ्रामक प्रचारों को जिसका जहर टी. वी.पर हर चैनल पर प्रसारित किया जा रहा है इंटरनेट पर पंडितों की साइटों की भरमार है ,जिसे देख सुनकर जनता अंधविश्वासों की शिकार होती जा रही है ,मांगलिक और गुणदोष के चक्कर में लडके-लड़कियों की शादी की सही उमर ही निकलती जा रही है यदि पोथी,पत्रों वाली बातें इतनी ही सच होतीं तो हमारी पीढ़ी के लोग कितने परेशान हुए होते ,पहले हर दम्पति के चार,पांच ,छह ,आठ औलादें होती थीं इतने शिक्षित भी लोग नहीं होते थे कि अपने इतने संतानों की सही डेट ऑफ बर्थ का सही-सही लेखा-जोखा संरक्षित कर रख सकें । टी.वी. पर दिखाए जा रहे वास्तु शाश्त्र कुंडली के दोष गुण के उपाय अच्छे-अच्छों के दिमाग़ का गुड़गोबर कर दिया है ,पहले भी लोग मानते थे पर आजकल की तरह नहीं ,कितनों की दुकानें चल निकली हैं ,शादी व्याह की कितनी वेबसाईटें बेरोजगारों को रोजगार मुहैया करा रही है ,भोले भाले लोग इनके शिकार हो रहे हैं ,धूल फांक रहे हैं मनी खर्च करने वाले ,संयोग से किसी की गोटी फिट
हो गई तो वो आपको भी सलाह देंगे । फायदा कुछ नहीं होता उनकी रोटी रोजी फल फूल रही है । कितने अच्छे अच्छे रिश्ते इन ढोंग ढकोसलों के चक्कर में हाथ से निकलते जा रहे हैं और बच्चों की उम्र मुट्ठी से रेत की तरह ।  इसका कोई उपाय निकल सकता है या नहीं मैं नहीं जानती पर अपनी सुशिक्षित नौकरी पेशा सरल और परिपक्व बेटी के लिए एक सजातीय सुयोग्य सुदर्शन व्यक्तित्व वाले घर-वर की कल्पना अवश्य करती हूँ । आज का कैसा जमाना आ गया है कि लोग बेतक़ल्लुफ़ हो ये तक पूछते हैं कि क्या आप अपनी ही जाति में यानि राजपूत परिवार में ही शादी करेंगी अन्य जाति में नहीं ,सुनकर कितना अजीब लगता है आज के आधुनिक ज़माने की बेतुकी बातें । जमाना तो है लव मैरिज का ,लिव इन रिलेशनशिप का , तो लोग नसीहत तो देंगे ही । आजकल बेटियों का सच्चरित्र होना भी हंसी मजाक का मुद्दा है क्योंकि वह अपने घर परिवार के संस्कारों में बंधी गंवार लड़की साबित है वह ज़माने की आँधी में नहीं बही तो समझिए उल्लू है । आग लगे ज़माने की आंधी को और अन्धविश्वास की पराकाष्ठा को जिसमें अच्छे बुरे सभी दिशाहीन हैं । किसी को ठेस पहुँचाने का मेरा इरादा नहीं ये मेरे अपने मन के उद्गार हैं ।
                                                   शैल सिंह                                                                           
                                                                                                                     

Sunday, 9 November 2014

मत हमसे हमारी उमर पूछिये


उमंगें-तरंगे जवां धड़कने हैं अभी
अभी अंगड़ाईयाँ लेतीं हिलोरें घनी
मत हमसे हमारी उमर पूछिये

धुँधला जाये जिसे देख जौहरे-आईना
अभी भी बसद रंग हृदय के आबाद हैं
कल्पनाओं का व्यापर करती नहीं मैं
महफिलों में अभी भी नूर की धाक है

मन के सितारों का चमकता गगन देखिये
मत हमसे हमारी उमर पूछिये ।

रंग और रेशा शरीर के हैं जर्जर मगर
उजले केशों में शक्ति की वही धार है
वहशत वही आज़ भी मेरे हर लम्स में
जीस्त वही आज भी अज्जाए-बहार है

ढली शाम चांदनी का खुशरंग जुनूँ देखिये
मत हमसे हमारी उमर पूछिये ।

सदा वंचित रखा खुद को जिस बात से
क़ायम रिश्ता था भींगती सांवली रात से
बेमक़सद गंवाई जिंदगी थी हयाते दहर
अभागिनें इच्छाएं जागी हैं अब हो मुखर

मौज़-ए-खूँ देखिये बस रंगे-तरब देखिये
मत हमसे हमारी उमर पूछिये ।

मलय-मारुत लजाएँ गति वही आज भी
इन हाथों भुजाओं में है बल वही आज भी
धुंधला गई रौशनी जर्जर मलिन गात है
ज़िन्दा हासिल-ओ-लाहासील ज़ज्बात हैं

नंगे-पीरी शर्मा जाये नैरंगे-नज़र देखिये
मत हमसे हमारी उमर पूछिये ,

क्यों पोपले मुँह पर देख आड़ी झुर्रियाँ
काया की देख ठहरी शिथिल शक्तियाँ
ढले यौवन की देखते क्यों पीत पत्तियाँ
नकारने से पहले जरा देखिये सुर्खियां

गर्दिशे-अय्याम मगर हुस्न-मह देखिये
मत हमसे हमारी उमर पूछिये ,

निर्वहन करते-करते दायित्वों की श्रृंखला
कृषकाय जवां दिल की हो गई तन मेखला
हसरतों के द्वार थी दबी अधखिली कली
आज फ़ुर्सत में मुरादों की देखें बांछें खिली

गई ऋतु में भी आलम मुझमें वही देखिये
मत हमसे हमारी उम्र पूछिये ।
                                          शैल सिंह

शब्द अर्थ ---
जौहरे-आईना--दर्पण की चमक , बसद रंग--सैकड़ों रंग
लम्स--रोयां , अज्जाए-बहार--वसंत ऋतु
मौज़-ए-खूँ --रक्त की तरंग , रंगे-तरब--आनंद का परिवर्तनशील रंग
हासिल-ओ-लाहासील--प्राप्य और अप्राप्य
नंगे-पीरी --वृद्धावस्था को लज्जित करने वाली
नैरंगे-नज़र--दृष्टि का सौंदर्य , गर्दिशे-अय्याम--दिनों का फेर
हुस्न-मह--चाँद का सौंदर्य