Friday, 5 September 2014

दहशत में है गाँव


जबसे देश में उत्पाद बढ़ा खाद्यान्न का
नरभक्षी भेड़िया और भी हो गया इन्सान 
डर है भूख क्षुधा की कहीं और ना बढ़ जाये 
आदमखोर आदमी और भी हो जाये हैवान ,

वह युग नहीं देखा इस पीढ़ी ने जिसमें लोग   
एक-एक दाने के लिए थे असहाय मोहताज़ 
सतुआ,भुट्टा,ककड़ी,कभी रस पी खा चबैना 
साथ रहते मेल-भाव से ख़ुश उम्दा था अंदाज ,

मुँह का कौर निवाला रख कठिन जतन से 
ख़ुद रुखा-सूखा रह बच्चों का भरते थे पेट 
हँसी-ख़ुशी से दिन बीतते बैर-भाव ना द्वेष 
आज सक्षम होकर भी सब कुछ मटियामेट ,

पिचके गालों पपड़ियाए होंठों पर भी तब तो
गुरबत में भी खिला करती थी हँसी मुस्कान 
मिल बैठ के दुःख सुख सब साझा कर लेते थे
दोनों जून सजती थी ठिठोली की हॉट दूकान ,

निर्भीक,निडर सोया करते थे खुली हवा में
सब बाग़-बग़ीचे ,ट्यूबवेल ,नीम की छाँव
बिजली,बत्ती ना पंखा घर ,डर से कैसे आज़
कोठरी भीतर दुबके रहते दहशत में है गाँव ,

ये कैसा युग आया घर में घर के लोगों से डर
सीमा पर दुश्मन के छल-कपट-छद्म का गढ़
मौत का स्वयम्बर रचा करते दुष्ट देश पड़ोसी
आतंकी उत्पात अनर्थ अत्याचार सभी की जड़
                                                         शैल सिंह ।  

Wednesday, 3 September 2014

मोदी जी के नाम


मैं आम आदमी हूँ
मुझे आम रहने दो 
जो मुझमें खास है वो खास 
मुझमें खास रहने दो,

छू लूँ बुलंदी रहे पर 
पांव जमीं के घास पर 
ईमानदार,साखदार बनूं 
रहे आँख समग्र विकास पर,

रत देश,जन सेवा में रहूँ 
सरलता हो संगी दूजी 
सहनशीलता रहे आभूषण 
ताजिन्दगी इमान मेरी पूँजी,

चाय बेचना गुनाह ग़र 
तो ये गुनाह बार-बार करूँगा 
मिले मरने के बाद जन्म ग़र 
तो फिर चाय वाला ही बनूँगा,

चाय ने ग़रीब को दिया   
जमीं से उठा अर्श पर मुक़ाम 
कमाल छोटे से पायदान का  
ईनाम में दिया हस्ती,शोहरत नाम । 

                                          शैल सिंह 



इक वक्त था जब


मुर्गे की बाँग से प्रारम्भ विहान होता
पक्षियों के कलरवों से सूर्योदय का भान होता
अब नहीं चहकतीं बुलबुलें भी वैसी बाग़ में
मोर-मोरनी के नहीं वैसी रोमांच नाच में
कोयल भी मीठी कूक सुनाती नहीं है रात में
अब नहीं वो बात जो बात पहले थी
जल रही है दुनिया ना जाने कैसी आग में।
                                              शैल सिंह  

Tuesday, 2 September 2014

''दिल्ली और मुंबई के रेप कांड पर मेरी ये कविता''

दुष्कर्म जैसे वारदात और नाबालिगों को शह देती व्यवस्था पर

ऐसे अपराधियों की सजा पर बिना मतलब बार-बार बहस क्यों छिड़ती है।कम उम्र का बच्चा अपना पौरुष बल दिखलाकर एक किशोरी का ,अपने से बड़ी उम्र की महिला का अस्मत तार-तार करने में सक्षम होता है ,
उस समय तो अपनी उम्र से बड़ा हो जाता है फिर इतने जघन्य अपराध के लिए सजा के वक्त नाबालिग क्यों करार दिया जाता है और सभी लोग मनोवैज्ञानिक क्यों बन जाते हैं ,इसी लिए बार-बार ऐसी घटनाएँ दुहराई जाती हैं ,इसका निदान तभी सम्भव है जब बालिग ,नाबालिग का मोहरा ना इस्तेमाल कर अपराध के बदले कड़ी से कड़ी सजा सुनिश्चित की जाये। 

                  ''दिल्ली और मुंबई के रेप कांड पर मेरी ये कविता'' 

कलुषित हो रही संस्कृति मानवता का ह्रास होता
सुरभित उपवन है आज समरसता का सार खोता
चमन से मद में सौरभ नीले अम्बर बहक गया है
कली-कली हर सुमन जंगल-जंगल दहक गया है।

विद्रूप हो रहा है समाज का मन फटिक सा दर्पण
हृदय पात्र क्यों है रीता कर अधर किसलय अर्पण
जहाँ कलरव स्वछन्द विचरते कोलाहल चीत्कारें
जीवन की जहाँ प्रत्यूषायें बरसतीं हलाहल अंगारें।

मस्तिष्क की शिराओं में वासना का वास भरता
मन के मचानों पर उन्मत्त राक्षस निवास करता
क्यों सोच का फलक इतना शापग्रस्त हो गया है
व्यभिचार की मण्डियों में ओछा सहवास करता।

संदल सुवास सा गमकता अमर मधुर वो बंधन
हर कोण को कलंकित करता सदी का परिवर्तन
रिश्तों की क्या परिधियाँ आज हो रहा उल्लंघन
कपटी विकृतियों का दंगल कर रहा अभिनन्दन।

आशनाईयाँ कैसी माँ-बहन-बेटियों की आबरू से
शुचिता कंचनी सिसकती हैवानियत की रूबरू से
सांद्रतायें दुर्भिक्ष हो रही नदी में दुर्भावना के बहके
मन कछार तट तोड़ के आत्मावलोकना की बहते।

नाबालिगों को शह देती लचर कानून की व्यवस्था
क्यों कुकृत्य करते वक्त आड़े आती नहीं अवस्था
जघन्य अपराध की मिले कड़ी सज़ा अपराधियों को
बहसों के खलिहान मत भटकाईये असल मुद्दों को।

अभद्रता की सीमाएं लांघते नाबालिग सयाने बनके
अस्मिता को रौंदते जब सोलहवें साल के घड़े भरके
नाबालिग करार देकर सजा का प्रावधान गर घटेगा
ऐसी दरिंदगी का हिसाब समाज खुद से ही कर लेगा।

                                                                   शैल सिंह


                                                             


Sunday, 31 August 2014

हम कश्मीर नहीं देंगे


चाहे जितनी चले शमशीर
हम कश्मीर नहीं देंगे
कश्मीर भारत माँ का चीर
हम मिटने तस्वीर नहीं देंगे ।

कश्मीर कोई मसला नहीं
कि समाधान खोजा जाये
कश्मीर कोई ज़ायदाद नहीं
कि व्यवधान बोया जाये

अलगाववादी मांगे जाके भीख
कांसा लेकर पाकिस्तान से
उठ रही ताल ठोंक कर चीख
समूचे हिन्दुस्तान से

कश्मीर लिए जां देंगे लाखों वीर
बनने मन्सूबों की खीर नहीं देंगे
कश्मीर भारत माँ का चीर
हम मिटने तस्वीर नहीं देंगे ।

कश्मीर देश की मूँछ,शान,
सिरमौर,जान हमारा है
भारत की ममतामयी गोद का
अहम अंग आन दुलारा है

इतना नाक में मत कर दम
ना घोंप घात कर पीठ में तीर
कश्मीरी हवा,फ़िजा भी मेरी है
हद पर फोड़ देंगे नकशीर

छलनी कर देंगे टांगे सीना चीर
बनने मन्सूबों की खीर नहीं देंगे
कश्मीर मेरी भारत माँ का चीर
हम मिटने तस्वीर नहीं देंगे ।
 
कितने नमकहराम भिखमंगे ये
खुदा के फ़रिश्ते धूर्त हैं जाना
खाते-पीते भारत भूमि का
गाते पाकिस्तान का गाना ,

हम कहते जियो और जीने दो
रहो चैन से ना घोलो मन पीर
हम शेरौं की पैदाईश छेड़ो मत
फकीर बन पीटते रहो लक़ीर ,

निचोड़कर बहा देंगे बवासीर
बनने मन्सूबों की खीर नहीं देंगे
कश्मीर मेरी भारत माँ का चीर
हम मिटने तस्वीर नहीं देंगे ।

पापी पाक को लिखता तहरीर
एक निशाने से छोड़ेंगे दो-दो तीर
बहा देंगे तेरी नानी के भी नीर
रटना छोड़ दे पृथक कश्मीर

मन को समझा ले धर के धीर
भारत माँ के लाखों बलवीर
तुझे पाकिस्तान पहुँचा देंगे
पहना कर हथकड़ियाँ जंज़ीर

सुप्त चेतनाएं जाग गई हैं
बनने मन्सूबों की खीर नहीं देंगे
कश्मीर मेरी भारत माँ का चीर
हम मिटने तस्वीर नहीं देंगे ।
                            शैल सिंह





                   




  

बन्दे मातरम


माँ-बाप ,भाई-बहन ,पत्नी, बेटे-बेटी, गाँव की
सीमा के प्रहरियों तुम्हें सलाम देश जहान की
रख जान हथेली पे रखते लाज माँ के आन की
बुते तेरे महफ़ूज गुलिस्ताँ,चमन हिंदुस्तान की ।

''बन्दे मातरम'' ,''भारत माता की जय''
                                           शैल सिंह