Friday, 22 August 2014

गिर-गिर संभल गया


ओ मुझे रिन्द कहने वालों
मैंने तो सिर्फ शराब पी है
ख़ुद कि वाहयात नज़र देखो
जिसने छक के शबाब पी है ,

मैं तो समां का लुत्फ़ लेकर
गिर-गिर संभल गया
देख खुद नज़र की करामात
सरे-राह क्यूँ फिसल गया ,

थे अश्क़ मय में शामिल
सबने जाम का सुरूर देखा
मग़र इस खुमार में नहीं क्यों
किसी ने मेरा कोहिनूर देखा ,

बहक कर नशे में मैं तो
कभी खोया नहीं था आपा
ना ढोंगी योगी बन किसी
नक़ाब डाला कभी था डाका ,

गम भूलाने के लिए तो मैं
तिल-तिल जल जा रहा हूँ
डर है कहीं जल ना जाए,जो
अमानत दिल में छुपा रहा हूँ ,

इक वो भी वक्त था नजर से
पीया ,था जमाल उनका साक़ी
अब वो वो रहे ना हम हम रहे
रह गया मैं और गिलास बाकी ।

रिन्द --पियक्कड़
                                 शैल सिंह 

Tuesday, 19 August 2014

प्रीति की रेशम डोर वास्ते



प्रीति की रेशम डोर वास्ते

नफ़रतें-रुसवाईयाँ जहाँ,जिधर देखो उस तरफ 
पश्चिमी तहज़ीब हमें ले जा रही है किस तरफ 
खुदगर्ज़ी सोई हुई बेफ़िक्र नेकियों की लाश पर 
दूर होता जा रहा आदमी ,आदमी से हर तरफ।

दायरा नफ़रतों की आग का बढ़ता ही जा रहा 
सिलसिला बेबाक हादसों का बढ़ता ही जा रहा 
खता पर खता इन्सान करता रहा ईमान बेचकर 
वेदना की परवाह किसे एहसास मरता जा रहा । 

गुलिस्ताँ से ख़ुशबूवें आज़ बेज़ार होती जा रहीं 
कैसा हुआ ज़माना दामनें दाग़दार होती जा रहीं  
धधक रहा जगत धर्मान्ध हो हैवानियत के हाथों  
कहाँ खोया अमन जिंदगी लाचार होती जा रही । 

भय,जुल्म,आतंक मुक्त जग, दारुण शोर वास्ते  
निडर इब्तिदा करें मिलकर खूबसूरत भोर वास्ते 
गिले-शिक़वे ना हो मन मुहब्बत ही मुहब्बत हो      
आओ नज़ीर पेश करें प्रीति की रेशम डोर वास्ते ।
                                              शैल सिंह