Saturday, 28 June 2014

तेरी अलबेली काया


तेरे खंजन नयन नशीले अधरों के बोल रसीले 
नागिन सी लट लहरे ललाट तिलस्मी चितवन बोले ,

किस दिव्य लोक से आई कल्पना में ख़लल मचाने 
मखमली भाव तरंगों पर मृदु मादक हाला बरसाने ,

जब से दृग ने देखी है अल्हड़ तेरी अलबेली काया 
चेतन अवचेतन तक को विस्मित कर भरमाया ,

मन-फटिक शिला प्रतिमा सुख देती संसार का जो 
चातक से प्यासे मन को अर्क मिला दीदार का जो ,

सुखी,ऊसर,बंजर बसुधा अंतर्मन की हो गयी उर्वर 
जीवन के मरुमय तट उन्मत्त उगने लगे हैं तरुवर । 
                                          शैल सिंह