Saturday, 21 June 2014

कुछ ऐसी भी हैं पीड़ाएँ


            कुछ ऐसी भी हैं पीड़ाएँ 

झंकृत होतीं जब भाव तरंगें रेती फूल हृदय के उगते 
विकृत होती नैसर्गिकताएं जब निर्मम हो तुम हँसते ,

छोटी -छोटी अभिलाषायें हर ऱोज उमग कर मुर्झातीं
मौन भाषा की गहराई क्या सचमुच समझ नहीं आती
क्यों ढींठ बने कोमल भावों की सुलगाते नित हो छाती ,
             
स्नेही बाँहों का हार लिए आओगे हर रात गुजर जाए
मनमोहक पुष्प खिला जाएं कितनी भोली हैं आशाएं
क्यों अधरों पर लाई नहीं जायें कुछ ऐसी भी हैं पीड़ाएँ ,

मन का सिंगार समझते हृदय के तार स्वयं जुड़ जाते
अनजान बने तुम खूब पता गए वक्त नहीं फिर आते
काश अंतरंग बातें व्यथित तुमसे मुक्त कंठ कह पाते ,

संवाद बिना भी मच रहा बवंडर मन की खाई गहराई
कुछ तो हो नूतन अलग-विलग दिल में गूंजे शहनाई  
जीवन की संध्या बेला सम्बंधों में लायें नूतन रअनाई ।

रअनाई--कोमलता,सुंदरता


                                                शैल सिंह 

Thursday, 19 June 2014

कल्पना का रूप

        (१ )

तुझे रिझाने मन्दिर आई
पूजा अर्चन थाल सजाई
हे निष्ठुर भगवान सुनो
मेरी रीति गागर भर दो ।

कैनवास के कोरे फ़लक पर
कल्पना ने इक चित्र उकेरा है
मन के भावों पर अनुरंग चढ़ा
तूलिका ने बहु रंग बिखेरा है ।

          (२)

जिस मंजिल की तलाश मुझे
ऐ  राह  ले  चल  उस   तलक
कब  तक  भटकना  है लिखा
किस  लोक  में  है मेरा जहाँ
मन  है  कि  सपना  बुन रहा
कहीं ठहरा नहीं है अब तलक ।

इक आयाम  चाहत को मिले
साकार  कल्पना  का  रूप हो
गुलशन  में  मेरी  जिदगी के
हर रंग ,छाँह ,खिली धूप हो
तूं तो मन की सब है जानता
ऐ रब दे मन का मेरे भूप हो ।
                                   शैल सिंह 

ऊफ़ ये कैसी गर्मी मुहाल हुआ जीना

ऊफ़ ये कैसी गर्मी मुहाल हुआ जीना

तपती दुपहरी चुवे तर-तर पसीना
जेठ का महीना हाय जेठ का महीना 
बेचैन धरती चटके चातक का सीना 
तरास काँहे बुझे ना बादल कमीना । 

बिवाई सी दरार सूखा-सूखा कोना-कोना 
डोले ना रईन तनिक छत पे कैसे सोना 
यहाँ-वहाँ विरहिन कैसे कोई नवयौवना 
ज़माना ख़राब बिछाए खुले में बिछौना । 

मग़रूर मेघा उमड़-घुमड़ आये जाये 
दो बूँद जल के लिए हाय जिया तरसाये 
मुश्किल में किसान माथ धर कसमसाये
ऊसर हुआ परती खेत अन्न क्या उगाये । 

निर्मोही बदरा की ऊफ़ बेदर्द चितवन 
घेरि -घेरि काली घटा उगले है अदहन 
नभ पनघट से झर निर्झर ओरे निर्धन 
हरषे त्रस्त जीवन सरसे जग उपवन । 
                                             शैल सिंह