Wednesday, 17 December 2014

कुछ बंद


ऐ ख़ुदा --
                  ना तो हीरे रतन की मैं खान मांगती हूँ
                     चाँद,तारे,सूरज ना आसमान मांगती हूँ
                  मेरे हिस्से की धूप का बस दे दे किला
                      जरुरत की जीस्त के सामान मांगती हूँ ।

फाड़कर ना दे छप्पर कि पागल हो जाऊँ
     रूठकर ना दे मन का कि घायल हो जाऊँ
अपने दुवाओं की सारी कतरनें बख़्श देना
     कि तेरी बंदगी की ख़ुदा मैं क़ायल हो जाऊँ ।

              गुज़ारिश है आँखों में वो तदवीर बना देना
                    मेरी ख़्वाहिशों का मेरे तक़दीर बना देना
             टूटकर कोई तारा फ़लक़ से दामन आ गिरे
                    मेरी बदा में वो ख़ूबसूरत तस्वीर बना देना ।
   
                                                                        शैल सिंह

                
                   

Saturday, 6 December 2014

पुरनिमा की रात का पैबन्द आँखों में सी रहे थे

कश्मीर में मतदान के दौरान  .....

रुख़ बदल रही हवाएँ रुत बदल रही फ़िजां की
जद से ख़ौफ़ की निकल लौ जली नई शमां की
देखिये वादी-ए-कश्मीर मे मतदान हो रहा है ।

जाग उठा ज़मीर बदली सोच अब आवाम की
बर्फ सी  पिघलकर फांस खड़ी हुई चट्टान सी
देखिये वादी-ए-कश्मीर का इम्तहान हो रहा है ।

आतंक के साये में जीस्त मर-मर के जी रहे थे
पुरनिमा की रात का पैबन्द आँखों में सी रहे थे
देखिये वादी-ए-कश्मीर का यूँ विहान हो रहा है |
                                                    shail singh

मज़ार दियना जलाने फिर क्यूँ आये हो

खड़े फ़ख्र से तुम नुमायां कई घाट से
दम वफ़ाई का भरने फिर क्यूँ आये हो ,

क्या लौटा पाओगे यास के गुजरे दिन 
गिन उँगलियों पे काटे हैं जो रात-दिन 
बहारें तो आईं बहुत रंग भरने चमन 
पर इंतजार की जिस्म पर थी चुभन 
खण्डहर सी हुई अब वो नुरे-ए-महल 
झाड़-फानूस लगाने फिर क्यूँ आये हो । 

ओढ़ी ख़ामोशी,दीवारों की हर सतह 
जो सजी संवरी हवेली तुम्हारे लिए 
नाम की तेरे माला जो सांसों में थी 
उलझकर भी गुँथीं थी तुम्हारे लिए 
हो गई है मोहब्बत इन तन्हाईयों से 
ऐसी आदत छुड़ाने फिर क्यूँ आये हो । 

ख़्वाहिशों पर परत चढ़ गई जंग की 
हसरतों को बदा पर दफ़न कर दिया 
कोई शोला था भड़का वदन में कभी 
ढांपकर लाज़ का था कफ़न धर दिया 
जिस चाहत की अब ताब मुझमें नहीं 
ताब फिर वो जगाने फिर क्यूँ आये हो । 

इक पहर रोशनी की जरुरत बहुत थी 
अब अँधेरे में रहने की लत पड़ गयी है 
कभी सरे राह तकती थी जो ज़िन्दगी 
सूखकर लाश सी वो शज़र रह गई है 
जब जनाज़े को कांधा मयस्सर हुआ ना 
मज़ार दियना जलाने फिर क्यूँ आये हो ।  

दमकती कांति सूरत की कहाँ खो गई 
क्यूँ पूछते हो शबाब ढल जाने के बाद 
भींगे जंगल के मानिन्द सुलगती रही 
आज़ आये भी कितने ज़माने के बाद
मन की जर्जर दरकती सी मीनारों पर                               
वही रंग-रोग़न चढ़ाने फिर क्यूँ आये हो । 

कौन सी ऐसी नायाब वो जाने महक 
शाख़ की इस कली फूल पर ना मिली 
जिसे मेहरूम किया नादान भौंरा तूने 
नज़र आई उसी पर क्यूँ शहद की डली 
जिन दरख़्तों में अब दीमकों का बसेरा 
वहाँ आशियाना बनाने फिर क्यूँ आये हो । 
                                                           
                                                शैल सिंह 








Friday, 5 December 2014

लाड़ली सुता का इक फ़कीरा मैं पिता हूँ

'' लाड़ली सुता का इक फकीरा मैं पिता हूँ ''

न इंसान सुन रहा है न भगवान सुन रहा है 
धीरज भी अब तो जैसे बलवान खो रहा है। 

धूर्त वक़्त का परिंदा हाथों से निकला जाए
किसको बताएं कैसे क्या अंतर की वेदनाएं
न शुभ काम हो रहा न शुभ विहान हो रहा है,
धीरज  ....।
पल-पल पहाड़ जैसे लगती लम्बी काली रैना 
आँखों से नींद गायब,ग़ायब सुकून ओ चैना
न सुजलाम हो रहा न कुछ सुफलाम हो रहा है,
धीरज ...।
तक़दीर का सितारा आँगन में किस चमन के 
बंधेगा साथ बन्धन किसके जनम-जनम के 
न शीलवान मिल रहा न दयावान मिल रहा है,
धीरज …।
लिपटी अंधेरी चादर में लगें चारों ही दिशाएँ
गली-गली की ख़ाक़ छानी बुझी ना तृष्णाएँ
न मन का मुक़ाम मिल रहा अरमान रो रहा है,
धीरज …। 
मन की गिरह खोलूं किसकी उदारता के आगे
विधाता लेखा-जोखा बेटी के भाग्य की बता दे
न अनजान सुन रहा न ही पहचान सुन रहा है,
धीरज ...।
दुःखी लाड़ली सुता का इक फ़कीरा मैं पिता हूँ
लाडो की फ़िक्र में ही मैं सोता और जागता हूँ
न व्यवधान टल रहा न तो समाधान हो रहा है,
धीरज .... । 
उसके हाथ की लकीरें क्या भाग्य की रेखाएं
बस देर है अन्धेर नहीं यह मन को समझाएँ
न स्वप्न की उड़ान को आसमान मिल रहा है,
धीरज …।
मृगमरीचिका सी प्यास क्षार-क्षार हर तरफ़
बहुत बेज़ार हूँ जाने कोई परेशानी का सबब
न कुछ निदान हो रहा मन हलकान हो रहा है,
धीरज ...।
इम्तहान मेरे सब्र का इतना भी लो ना साईं
निष्काम विफल हो रही सारी वास्ता दुहाई
न वरदान मिल रहा न अभयदान मिल रहा है,
धीरज ...।

                                                         शैल सिंह

Saturday, 29 November 2014

'' ग़ज़ल ''

'' ग़ज़ल ''

महक से हो गई तर हमारी गली
उनके आने की आहट हवा दे गई,

जिस्म की डाल पर रंग चढ़ने लगे
बेसबर से नयन राह तकने लगे
ख़ुश्बू राहे-जुनूँ पर जहाँ ले गई ,

खुली आँखों में सपने संवरने लगे
रात भी दिन मुझे आज लगने लगे
शबे-तारीक में चांदनी जवां हो गई ,

हरा हर शज़र आवाजे-पा है हुआ
ख़िज़ाँ के फूलों पे सुर्ख़ी आने लगी
ख़ुशी लग कर गले से घटा हो गई ,

प्यार में जाने क्या सिलसिले ये हुए
कंपकपाये तो थे लब गिले के लिए
पास आकर क्यूँ जाने कहाँ खो गई ,

छाँह आग़ोश की पाये अरसा हुआ
नेह से बाँह में भर जब मन को छुआ
हर छुवन दर्द की अचूक दवा हो गई ,

लौट कर शाद घऱ यार आया मेरा
शाम सुरमई गुलाबी सवेरा हुआ
सरे-मिज़गाँ बिठा कर रवा हो गई ,

टूटकर शाख़ से यास थे हम-नफ़स 
सद-गुहर पा फ़िरोजां हुई शैल अब
जीस्त वीरां ताबिन्दा-पाईन्दा हो गई ।

अर्थ--
राहे-जुनूँ--पगलाए हुए रस्ते ,शबे-तारीक--अँधेरी रात ,
आवाजे-पा--पांव की आहट ,शाद--प्रसन्न ,सरे-मिज़गाँ--पलकों पर ,
रवा--प्रभावित ,यास--मायूस ,सद-गुहर--हजारों मोती ,फ़िरोजां--चमक ,
ताबिन्दा--चमकदार ,पाईन्दा--स्थाई ,
                                                              शैल सिंह






Monday, 24 November 2014

माटी के रंग

                                 ''  माटी के रंग  ''

ये हकीकत है आज़ की ,माटी से टूटा है नाता सभी का ,
सोंधी-सोंधी ख़ुश्बूओं से परे ,बनावट के आवरण में वास्तविक गंध को भूल जाना,
आज का वातावरण,समाज एक ऐसा मुखौटा बन गया है 
जैसे गुलदस्ते में सजे फुल सरीखा खिले रहने के बनावटी अंदाज,
कैसा मुलम्मा चढ़ा लिया है ,खाली उजाड़ होकर भी चेहरे पर ,
हँसी पर साधनों का खेप डालकर अन्तर के आंदोलन का मातम मनाते हुए,
खोखला विद्रूप मन लिए कॉस्मेटिक का मोटा लेप चढ़ा कर ,
अन्तर में माटी की गंध को सीने से लगाये तड़पना ,
फलने-फूलने की अभीष्ट चाह अपनी माटी को तलाशती ज़िन्दगी क्या है,
असल जिंदगी की ख़ुशी का मानदण्ड क्या है । 
सब कुछ पाकर भी क्या खो दिया है भौतिकता और आधुनिकता के उसूलों में,
कितने कृत्रिम हो गए हैं हम कृत्रिमता हमें किस कदर आकर्षित कर रही है ,
स्थाई रस का अभाव मौलिकता का मटियामेट होना ,नैतिकता का पतन होना ,
कितने नैराश्य और निरंकुश हो गए हैं हम । 
इतने सारे गैजेट्स ,संसाधनों के पालनों में झूलते हुए हंसी को तरसते ,
समूह की तलाश में कभी-कभी कहीं-कहीं  जंगलों के बीच में ,
कुछ खिलते हुए मेरे जैसे पलाश के फूल नज़र आ जाते हैं 
तो साथ में जी लेते हैं ,जिंदगी भर के आनंद का अपार सुख ,
शायद फिर ये खिले पलाश मिलें या ना मिलें ।
प्रतिस्पर्धा की दौड़ में तरक़्क़ी के जोड़-तोड़ में ,सपनों की उड़ानों का आकाश में दौड़ लगाना ,
छीनते जा रहे हैं हमसे ,हमारे आस-पास से ,जीवन के मूल-मन्त्र ,
धरातल से जुड़ने की बजाय पैरों तले से जमीं खिसकती जा रही है ,
हम और हमारा समाज खुद को बिमुक्त कर लिए हैं अपनी माटी से । 
खुद में सिकुड़-सिमट कर चिन्ताओं और बीमारियों को आमंत्रण दे रहे हैं ,
वास्तविक जीवन शैली की तलाश में हम सहारा ले रहे हैं ,
बनावटी नकली `तत्त्वों का ,लॉफ्टर चैनल ,आर्ट ऑफ लिविंग ,
शाम सुबह की सैर ,योगा के शिविर में शरण ,डॉक्टरों की हिदायतें ,
तमाम नुस्ख़े तो आज़मा रहे हैं ,असल ख़ुशी की जड़-जमीं  त्यागकर । 
आतंरिक ख़ुशी तभी सम्भव है जब हम भावनाओं को अमली जामा पहनायें ,
 ख़ुशी की असली दुनिया तलाशें अपने में ,अपने लोगों में । 
काश वही पुराना जमाना लौट आये और दुनिया की आपाधापी ख़त्म हो जाये ।
पर यह अनमोल वस्तु तो असंभव की रेखा पर उस पार ही छूट गई है ,
मन की भटकन और बेचैनी वहीँ सुस्ता रही है ,जहाँ हमारी माटी का रंग है ,
आने वाले दिन और भी नई-नई बीमारियों का समूह,समाज खड़ा करेंगे,
नई-नई तकनीकियों के साथ ,डॉक्टरों की जमात के साथ । 
व्यस्तता और आपाधापी निगल रही है मनोरंजन और ख़ुश रहने के नुस्खों को ,
छीन रहा बच्चों का बचपन ,सुख,साधनों की शैय्या पर बबूल ,गुलाब के काँटे भी बिछे है
जो शगल बन रहे अनेकानेक अस्वस्थ सोच और मानसिकताओं के।
आज के सुख साधन भी कृत्रिम सुख दे रहे हैं तभी तो कोई भी मन से आह्लादित नहीं दिखता । 
अफ़सोस  …।                                                                               शैल सिंह

Wednesday, 19 November 2014

ग़ज़ल

                                              '' ग़ज़ल ''

दिल के निगाहख़ाने कभी तो झाँक लेते 
इन्तज़ार मौसमे-रंग का करते ही रह गए ।

जख़्म देके पूछते हैं दर्द होता कहाँ है
पूछने से और भी अज़ाब होता जवां है
वक्त की अलामत हर जख़्म हो गए हैं
कैसे दिखाएं उनके निशां कहाँ-कहाँ हैं ।

ख़ुशी के फूल बांटती बज्में-रौनक थी जो
सैले-नज़र ढूँढ़ती हल्काए-ज़ंज़ीर जहाँ है
मवाद बनके टीसते हैं सुलूक़ों की दास्ताँ    
दिल में असास दमे-आखिर तक जमा है ।

दामन में नूर हैं तमाम मुअत्तर है जिंदगी
बू का क्या करें टूटा ख़्वाबों का कारवाँ है
दिल के हक़-तलब से वाक़िफ़ ही नहीं जो
मतलूब क्या मेरी कैसी इश्तियाकें रवां है ।

तक़ाज़े क्या ज़िन्दगी के क्या ख़्वाहिशें मेरी
कैसे कहें जुबां से किया हर्फों में सब बयां है
दस्तो-दर भटक रहे हैं ख़ुशी की तलाश में
वो भी जानते हैं बखूब जो दोनों के दरम्यां है ।

हाले-दिल सुना सके ना ग़ज़ल बना लिया  
गुमनाम हसरतों का गवाह आईना यहाँ है
कैसे करे हया साझा उरियानियों की बातें      
रेखाएं कुछ सीमाओं की बन्द रखा जुबां है  ।

दिल के निगाहख़ाने कभी तो झाँक लेते 
इन्तज़ार मौसमे-रंग का करते ही रह गए । 

शब्द अर्थ=
अज़ाब=कष्ट ,अलामत=भेंट चढ़ना सैले-नज़र=अश्रुधार ,
हलकाए-जंजीर=एकान्त रात का सन्नाटा ,जीस्त=जीवन ,
असास=दौलत ,दमे-आखिर=अंतिम समय तक ,
मुअत्तर=सुगन्धित ,हक़-तलब=सच्ची बात ,मतलूब=आवश्यकता
इश्तियाक=परम इच्छा ,तकाजे=इच्छा ,दस्तो-दर=घर बाहर ,
उरियानियों=नग्नता,अश्लीलता ,
                                                    शैल सिंह






Thursday, 13 November 2014

मन के शोर हैं या हक़ीक़त नहीं जानती

ये बंद हैं या शेरो शायरी मैं नहीं जानती
मन के शोर हैं या हक़ीक़त नहीं जानती ।

( १ )

रुत बदलती है मौसम बदलते हैं रोज,
दिन महीने और साल गुजरते हैं रोज
बस बदलती नहीं है घड़ी इंतज़ार की,
जाने कितने गली से गुजरते हैं रोज ।

( २ )

ग़मों का अम्बार इतना ज्यादा है कि
गम गैरों के सहलाने की फुरसत नहीं
गैरों की ख़ुशी से सरोकार मुझको नहीं
ख़ुशी मेरे दर का रुख़ जब करती नहीं ।

( ३ )

सितम ढाए हैं बहुत से सितमगर मगर
जख्म खा-खाकर दिल पर संभलते रहे
ग़मों में शामिल हुए ग़म हजारों मगर
अज़ाब शानों लिए रेगज़ारों पे चलते रहे ।

( ४ )

हवाओं का दरीचे से बेरुख़ी से मुड़ के जाना
आवारा सडकों पर सोचों की प्रायः टहलना
दिल का परदा हिलाना गवारा भी ना समझा
दरे-जाना से लौटकर हरीमे-ग़म में भटकना ।

अज़ाब -मुसीबतें । शानों--कांधा । रेगज़ारों--रेगिस्तान
दरे-जाना- प्रिय के द्वार । हरीमे-ग़म--दुःखों के सहन में ।

                                                            शैल सिंह

Tuesday, 11 November 2014

मन के उद्गार

मैं अपने मन की कुछ बात कहना चाहती हूँ बुद्धिजीवी लोगों से ,क्योंकि मैं भी अपनी बेटी के रिश्ते के लिए आजकल इन चोंचलों से अज़ीज आ रही हूँ ,कब लगाम लगेगी इन कुंडली के चक्करों की जोड़-तोड़ को ,ज्योतिषियों की भ्रामक प्रचारों को जिसका जहर टी. वी.पर हर चैनल पर प्रसारित किया जा रहा है इंटरनेट पर पंडितों की साइटों की भरमार है ,जिसे देख सुनकर जनता अंधविश्वासों की शिकार होती जा रही है ,मांगलिक और गुणदोष के चक्कर में लडके-लड़कियों की शादी की सही उमर ही निकलती जा रही है यदि पोथी,पत्रों वाली बातें इतनी ही सच होतीं तो हमारी पीढ़ी के लोग कितने परेशान हुए होते ,पहले हर दम्पति के चार,पांच ,छह ,आठ औलादें होती थीं इतने शिक्षित भी लोग नहीं होते थे कि अपने इतने संतानों की सही डेट ऑफ बर्थ का सही-सही लेखा-जोखा संरक्षित कर रख सकें । टी.वी. पर दिखाए जा रहे वास्तु शाश्त्र कुंडली के दोष गुण के उपाय अच्छे-अच्छों के दिमाग़ का गुड़गोबर कर दिया है ,पहले भी लोग मानते थे पर आजकल की तरह नहीं ,कितनों की दुकानें चल निकली हैं ,शादी व्याह की कितनी वेबसाईटें बेरोजगारों को रोजगार मुहैया करा रही है ,भोले भाले लोग इनके शिकार हो रहे हैं ,धूल फांक रहे हैं मनी खर्च करने वाले ,संयोग से किसी की गोटी फिट
हो गई तो वो आपको भी सलाह देंगे । फायदा कुछ नहीं होता उनकी रोटी रोजी फल फूल रही है । कितने अच्छे अच्छे रिश्ते इन ढोंग ढकोसलों के चक्कर में हाथ से निकलते जा रहे हैं और बच्चों की उम्र मुट्ठी से रेत की तरह ।  इसका कोई उपाय निकल सकता है या नहीं मैं नहीं जानती पर अपनी सुशिक्षित नौकरी पेशा सरल और परिपक्व बेटी के लिए एक सजातीय सुयोग्य सुदर्शन व्यक्तित्व वाले घर-वर की कल्पना अवश्य करती हूँ । आज का कैसा जमाना आ गया है कि लोग बेतक़ल्लुफ़ हो ये तक पूछते हैं कि क्या आप अपनी ही जाति में यानि राजपूत परिवार में ही शादी करेंगी अन्य जाति में नहीं ,सुनकर कितना अजीब लगता है आज के आधुनिक ज़माने की बेतुकी बातें । जमाना तो है लव मैरिज का ,लिव इन रिलेशनशिप का , तो लोग नसीहत तो देंगे ही । आजकल बेटियों का सच्चरित्र होना भी हंसी मजाक का मुद्दा है क्योंकि वह अपने घर परिवार के संस्कारों में बंधी गंवार लड़की साबित है वह ज़माने की आँधी में नहीं बही तो समझिए उल्लू है । आग लगे ज़माने की आंधी को और अन्धविश्वास की पराकाष्ठा को जिसमें अच्छे बुरे सभी दिशाहीन हैं । किसी को ठेस पहुँचाने का मेरा इरादा नहीं ये मेरे अपने मन के उद्गार हैं ।
                                                   शैल सिंह                                                                           
                                                                                                                     

Sunday, 9 November 2014

मत हमसे हमारी उमर पूछिये


उमंगें-तरंगे जवां धड़कने हैं अभी
अभी अंगड़ाईयाँ लेतीं हिलोरें घनी
मत हमसे हमारी उमर पूछिये

धुँधला जाये जिसे देख जौहरे-आईना
अभी भी बसद रंग हृदय के आबाद हैं
कल्पनाओं का व्यापर करती नहीं मैं
महफिलों में अभी भी नूर की धाक है

मन के सितारों का चमकता गगन देखिये
मत हमसे हमारी उमर पूछिये ।

रंग और रेशा शरीर के हैं जर्जर मगर
उजले केशों में शक्ति की वही धार है
वहशत वही आज़ भी मेरे हर लम्स में
जीस्त वही आज भी अज्जाए-बहार है

ढली शाम चांदनी का खुशरंग जुनूँ देखिये
मत हमसे हमारी उमर पूछिये ।

सदा वंचित रखा खुद को जिस बात से
क़ायम रिश्ता था भींगती सांवली रात से
बेमक़सद गंवाई जिंदगी थी हयाते दहर
अभागिनें इच्छाएं जागी हैं अब हो मुखर

मौज़-ए-खूँ देखिये बस रंगे-तरब देखिये
मत हमसे हमारी उमर पूछिये ।

मलय-मारुत लजाएँ गति वही आज भी
इन हाथों भुजाओं में है बल वही आज भी
धुंधला गई रौशनी जर्जर मलिन गात है
ज़िन्दा हासिल-ओ-लाहासील ज़ज्बात हैं

नंगे-पीरी शर्मा जाये नैरंगे-नज़र देखिये
मत हमसे हमारी उमर पूछिये ,

क्यों पोपले मुँह पर देख आड़ी झुर्रियाँ
काया की देख ठहरी शिथिल शक्तियाँ
ढले यौवन की देखते क्यों पीत पत्तियाँ
नकारने से पहले जरा देखिये सुर्खियां

गर्दिशे-अय्याम मगर हुस्न-मह देखिये
मत हमसे हमारी उमर पूछिये ,

निर्वहन करते-करते दायित्वों की श्रृंखला
कृषकाय जवां दिल की हो गई तन मेखला
हसरतों के द्वार थी दबी अधखिली कली
आज फ़ुर्सत में मुरादों की देखें बांछें खिली

गई ऋतु में भी आलम मुझमें वही देखिये
मत हमसे हमारी उम्र पूछिये ।
                                          शैल सिंह

शब्द अर्थ ---
जौहरे-आईना--दर्पण की चमक , बसद रंग--सैकड़ों रंग
लम्स--रोयां , अज्जाए-बहार--वसंत ऋतु
मौज़-ए-खूँ --रक्त की तरंग , रंगे-तरब--आनंद का परिवर्तनशील रंग
हासिल-ओ-लाहासील--प्राप्य और अप्राप्य
नंगे-पीरी --वृद्धावस्था को लज्जित करने वाली
नैरंगे-नज़र--दृष्टि का सौंदर्य , गर्दिशे-अय्याम--दिनों का फेर
हुस्न-मह--चाँद का सौंदर्य 

Thursday, 30 October 2014

मैं सीपी के मोती जैसी



हमराह में साथी नहीं संगी कोई अपना
भरे जो रंग गहबर सा अधूरा ही रहा सपना

मिले मंजिल मेरी मुझको 
अभिलाषाएं भटकती हैं 
महत्वाकांक्षा रही सिसकती 
उमर पल-पल गुजरती है ,

गगन के सितारों सी चमकने की कल्पना थी 
जमीं पर पांव चाहत चाँद छूने की तमन्ना थी । 

अपनों ने दिखा दिवा सपना 
कंचन सा विश्वास ठगा मेरा 
खुद की धुरी के चारों ओर 
बस डाल रही अब तक फेरा ,

घायल मन की व्यथा मिटा यदि कोई बहलाता 
चाहे अनचाहे सपनों की यदि मांग कोई भर जाता । 

सागर से भरी गागर है 
मन रीता-रीता सा ही 
मोती सी तरसती तृष्णा 
घर संसार सीपी सा ही ,

टूटे साजों पर गीत अधूरे किस्मत काश संवर जाए 
चाहत पर चातक की शायद स्वाति की बूँद बरस जाए । 

कस्तूरी जैसी महक मेरी 
ये जागीर न देखा कोई 
असहाय साधना की राहें 
ऐसी तरूण कामना खोई ,

घरौंदों को आयाम मिले कब किरण भोर की आएगी 
कब कसौटियों पर खरी उतर शख़्सियत गर्द मचाएगी । 

विराट कलाओं की पूँजी 
रेतमहल सी धराशाई 
क्या सपनों का सिंगार करूँ 
मधुमय मादकता अलसाई ,

नगीना कुंदन सा निखरता यदि होता जौहरी कोई 
कीचड़ में खिला कमल ड्योढ़ी मंदिर की सौंजता कोई । 

मजबूर अभावों में पल-पल 
लीं कोमल उड़ाने अंगड़ाई  
कद्रदान तराशे होते अग़र 
इन उद्गारों की सुघराई ,

अब समर्थ किस काम अहो शाम ढली सूरज की 
हे री मन वीणा की चिर पीड़ा झंकार उठी धीरज की । 

कहाँ चाह पहाड़ों के कद सी
कब मांगी सूरज के तेवर 
घटते वसंत लघु जीवन के 
कहाँ मन के धरूँ धन ज़ेवर ,

हाशिये पे रखने वालों कभी ना आंकना कमतर 
खुद में ऐसी रवानी पानी सी राह बना लेगी बहकर । 
                                                    शैल सिंह 



Wednesday, 29 October 2014

मन का सुखौना


कब नजरें इनायत फ़ना कब नज़र
कब ख़ुशी लब हँसी क्या हमें ये ख़बर ।

अभी तक तो खिली धूप थी आँगने
की बादलों ने चुबौली रुख़ घटा डालकर
अभी मन का सुखौना ज्यों डाली ही थी
ओदा कर दी घटा और भी झमझमाकर ,

कुछ सिमसिमाहट होगी दूर था सोचकर
भांपकर मिज़ाज़ मौसम का रुख देखकर
मन की तिजोरी से सारा जिनिस काढ़कर
दहिया लगाई ख़ुशफ़हमी दिल नाशाद कर , 

रुत बदलती है रंग पल में जाना ना था 
रुख हवा का किधर कब हो जाना ना था
धूप बदली की कितनी सुहानी लगी थी 
खेल धूप-छाँव का दिल ने जाना ना था ,

ग़र अहसास होता फ़िजां के इस अंदाज़ का 
साँस महकी ना होती बहकी पुरवा ना होती 
कैसे होते हैं शाम औ सुबह रूप के जान लेते 
ग़र शमां को रौशनी की ऐसी परवा ना होती ,

फ़ुर्सत से मिली थी नज़र जो दो घड़ी के लिए 
ख़ुलूस मिला उल्फत मिली दो घड़ी के लिए 
मेरी महफ़िल में बैठ भी कभी दो घड़ी के लिए 
देख अजनवी की तरह ही सही दो घड़ी के लिए। 
                                          शैल सिंह  


रुत बदलती  रंग पल  ना था जिनिस काढ़कर  


Wednesday, 22 October 2014

मन से मावस की कारी रात भगाएं

आओ मिल जुलकर हम सब ,दीप जलाएं नेह का तम् के नीचे

भरें तमस के आँचल उजियारा ,घर-घर पूनम का चाँद बुलाएं
स्नेह में बोरें माटी का तन,मन से मावस की कारी रात भगाएं ,

दुःख दर्द गले मिल बांटें आओ ,इक दूजे के गम शूल खींचकर
सुपर्व मनाएं दीवाली शुभ ,कण-कण प्रकाश की लौ बिखेरकर ,

हम करें बात तो लगे गीत सा ,फुलझड़ियों के जैसे फूटे सितारे
रोमांच भरा हो मिलन हमारा ,लगे पटाखों की लड़ियों से नज़ारे ,

मिलें बंधुजनों के घर-घर जाकर, मतभेद मिटाकर दें बधाईयाँ
खुशियों की मन में लहर जगाएं खाएं खिल बताशे औ मिठाइयाँ ,

महान पर्व ये बरस-बरस का ,कड़वाहट का आओ म्लेच्छ भगाएं
स्नेह धार से नवकिरण बार हम एकता का जग-मग दीप जलाएं ।

                                                                                          '' शैल सिंह ''

Friday, 17 October 2014

''शायद यही हो मेरा आत्मबोध-आत्मबोध''

लेखनी लिखने को आतुर 
पर शब्द छिन गए हैं 
उसके अस्तित्व की सार्थकता 
स्त्रीत्व के दायरे में जकड़ी 
अपने निजत्व से निकलकर 
स्वयं को पहचानने के लिए व्यग्र 
पर घर की सीमा 
परिवार की गरिमा 
कायम रखने के लिए 
उसकी चिर-परिचित 
धरोहर का भष्म होना 
क्या यही नियति है । 
सबके लिए दीपशिखा सी जलते रहना 
उसकी तपिश में केवल 
नारी होने की जड़ता का द्वन्द 
शेष उसका अपना । 
कितना तल्ख़ी भरा है स्त्रीधन,
अर्थहीन रेगिस्तान सा विवश 
नैसर्गिक विकास 
क्रियात्मक ऊर्जा को 
हवा दे देकर 
दाल भात के वाष्प में 
प्रतिभा का शोषण 
पूर्णता को निहलती रसोई 
आत्म विश्वास का 
तार-तार होते देखते रहना 
क्या यही है उसकी नियति । 
पर नहीं,एक तलाश है 
इस लीक से हटकर 
मन्सूबों को निखारने के लिए 
जो अपने हैं उसके अपने 
पथरीली पगडण्डियों पर चलकर 
संकल्प की टहनियों में 
मर्म की स्याही भरकर ,
कुछ शब्दों को उधार लेकर ,
छितराये शब्दों को समेटकर 
मन के मंथन को 
काग़ज़ कलम के समन्वय से 
स्वत्व को ठोस विश्वास
दिलाने के लिए 
कुछ लिखना है 
केवल लिखना है । 
अन्तःपीड़ा को दर्शाने के लिए 
क्षत-विक्षत पंक्तियों को 
शब्दों का जामा पहनाकर  
बिखरी हुई अभिरुचियों की 
कतरनों को बटोरकर 
भावों के सुन्दर पैचवर्क से  
पैबन्द ही सही 
अहसासों को उकेरना है 
इस लेखनी से ,
अंतर के गहन प्रसव से ,
निस्तेज ज्ञान विभा के
 विकिरण में ,
अकथ मनोव्यथ से 
कविता को जन्म देना है 
शायद यही हो मेरा आत्मबोध-आत्मबोध । 
                                            ''शैल  सिंह'' 

Thursday, 16 October 2014

शुद्ध भाव कुम्हलाने लगे क्यों

शुद्ध भाव शुचिता से
सींच ले रे मन मानव ,

उत्कृष्टता भरी कूट-कूट कर
अन्तर्जगत के भाव हैं इसमें  ,
सादा जीवन उच्च विचार रख 
सम्पन्नता की खान है इसमें

अवमूल्यन कर क्षरण कर रहे हो
क्यों भाव जगत को शुष्क बनाकर
भौतिकता,सम्पन्नता श्रेठ हो गई
आज़ उच्चता विचारों की छोड़कर ,

शुद्ध भाव कुम्हलाने लगे क्यों
देख बाह्य जगत की चमक-दमक
प्रेम,दया,परोपकार,सहिषुणता पर
हावी हो गई सम्पन्नता की धमक ,

हर गाँव,नगर,घर,गली,मोहल्ला
सभी ग्रसित हैं इससे सर से पांव
इस दौड़ में शामिल होकर सब ही
भूल गए हैं अन्दर झांकने के ठाँव ।
                                           शैल सिंह 

Wednesday, 8 October 2014

मैं तो ऐसी नगीना थी ऐ संग दिल तराशकर हीरे सा तुम निखारे तो होते


मैं तो ऐसी नगीना थी ऐ संग दिल
तराशकर हीरे सा तुम निखारे तो होते

आती अवरोधों की तोड़ जंजीरें सब
कभी आवाज़ दे तुम पुकारे तो होते ,
टूटे दिल की किरिचें संभाले है रखा
जोड़कर रेज़ों को तुम निहारे तो होते

मैं तो ऐसी नगीना थी ऐ संग दिल
तराशकर हीरे सा तुम निखारे तो होते ।

भोली मस्ती थी नादां से अहसास थे
नाज़-नखरे कभी तुम संवारे तो होते ,
मोम की गुड़िया सी मैं जाती पिघल
प्यार की आँच से तुम दुलारे तो होते ,

मैं तो ऐसी नगीना थी ऐ संग दिल
तराशकर हीरे सा तुम निखारे तो होते ।

छोटी-छोटी मेरे ख़्वाहिशों की मीनारें
मन समंदर उतर तुम विहारे तो होते ,
हद-ए-बेरूख़ी पर सब्र का बांध तोड़ा
गाल गीले कभी तुम पुचकारे तो होते ,

मैं तो ऐसी नगीना थी ऐ संग दिल
तराशकर हीरे सा तुम निखारे तो होते ।

भावों की बह नदी डूबी उतरायी मैं 
भावों की लहरों पर तुम उतारे तो होते ,
जग के ताने, छींटे, व्यंग्य,फिकरे सहे
तंज के झंझावात से तुम उबारे तो होते ,

मैं तो ऐसी नगीना थी ऐ संग दिल
तराशकर हीरे सा तुम निखारे तो होते ।

तुम ज़िद पर अड़े मैं अपनी उम्मीद पर
कशमकश की ढहा तुम दीवारें तो होते ,
आस की ज्योति आँखों में होठों पे नाम
आ कर दहलीज़ पाटे तुम दरारे तो होते ,

मैं तो ऐसी नगीना थी ऐ संग दिल
तराशकर हीरे सा तुम निखारे तो होते ।

फासले सब मिटा सुन सदा ज़िन्दगी की
दरमियां मुश्क़िलों के तुम सहारे तो होते ,
कभी प्रीत के हर्फ़ से नम व्यथा कंचुकी
दर ज़ज्बातों के आ तुम निथारे तो होते ,

मैं तो ऐसी नगीना थी ऐ संग दिल
तराशकर हीरे सा तुम निखारे तो होते ।

                                       शैल सिंह














Saturday, 4 October 2014

मन के द्वारे लगा सांकल सारी दुनिया

हँसी के फौव्वारे ठहाकों की दुनिया
कहाँ खोई जाने चौपालों की दुनिया ,

ठहर सी गई आ कहाँ ज़िन्दगी ये
मन के द्वारे लगा सांकल सारी दुनिया ,

गुड्डे-गुड़ियों का खेल बन्ना-बन्नी के गीत
थाप ढोलक के नाचती नज़ारों की दुनिया ,

त्योहारों की रौनक वो गँवईं का मेला
फुलौड़ी,लकठा,जलेबी गुब्बारों की दुनिया ,

चवन्नी,अठन्नी में सारे ख़ुशी के सामा
ख़रीद सकती कहाँ अब दौलत की दुनिया ,

गिल्ली-डंडा,कबड्डी,ताश की वो दोपहरी
खेत-खलिहान,बगिया चहकती वो दुनिया ,

मोबाईल चाण्डालिन चुड़ैल टी.वी.,नेट ने
चट कर दी सामाजिक समरसता की दुनिया ,

लकठा-बेसन का बना हुआ गुड़ में पगा
       
                                                  शैल सिंह


Tuesday, 30 September 2014

गिरदाब में है नैया

''गिरदाब में है नैया''

दर-दर भटक रही अर्से से आसेबों से बचा ले
कहाँ है मेरी मंज़िल,मंज़िल से खुद मिला दे ,

जिस चीज की तलाश में पागल बनी हूँ फिरती
चुपके से आके फूल वो आँचल में खुद गिरा दे ,

लड़खड़ाती आस ,वक़्त के गिरदाब में है नैया
बुझती हुई उम्मीदों के पलक दीप खुद जला दे ,

पड़ गए हैं आबले अब तो धैर्य के भी पाँव में
अज़्मे-सफ़र में रब अमां के ग़ुंचे खुद खिला दे ,

न असास मांगती हूँ ना शम्सो-क़मर ही माँगा
नवाज़िशों से ख़ुदा किश्ते-दिल को खुद सजा दे ,

आशाओं की दहलीज पर शिकस्त बस है खाई
अब किस दर पे लेके कांसा जाऊँ तूं खुद बता दे ,

साईल बना दिया है कहाँ-कहाँ न झख है मारा
बेताबी-ए-एहसास बेदर्द दुनिया को ख़ुद दिखा दे ,

नकारते हैं वह भी जो नहीं कहीं से मेरे क़ाबिल
दबा तक़दीर का पुलिंदा कहाँ सुराग़ खुद बता दे ,

मौसम के साथ-साथ उम्र खिसक रही पल-पल
तक़ाज़े का राग मेरे अंदाज़ के साज़ खुद सुना दे ।

आसेबों -भटकन , गिरदाब -भंवर , आबले-छाले
अज़्मे-सफ़र--अभिलाषा,यात्रा ,  अमां -संतुष्टि
असास-दौलत , शम्सो-क़मर-चाँद,सूरज,
नवाज़िशों-कृपा , क़िश्ते-दिल -हृदय भूमि
कांसा -भीख का कटोरा , साईल -भिखारी                                                             शैल सिंह
तक़ाज़े -इच्छाओं ,





Saturday, 27 September 2014

गुजरे ज़माने की बातें

                     '' काल खण्ड की बातें ''

सब कुछ आज है पास मेरे 
नहीं जो साथ रहा करते थे
हम बाबूजी की पर्णकुटी में 
आनंद विहार किया करते थे ,

थोड़ा ही सुख था तो भी क्या 
दुःख थोड़ा ही किया करते थे 
बैठ कुटुम्ब कबीला संग,नव 
प्रेरक सद्भाव बहा करते थे ,

अभावग्रस्त था जीवन फिर भी 
लघु दीप जला करते आदर्शों के 
अनुकम्पा असीम देवों की बरसती 
लक्ष्य होते बस घर, रोटी, वस्त्रों के ,

नत शीश हृदय से अंजुरियाँ 
प्रभु का आह्वान किया करते थे 
देवत्व,साधना,तप,स्तुति में नयना 
शाश्वत सुख अभिराम किया करते थे ,

तृप्ति थी संतुष्टि अपार भी 
अवसाद नहीं दबाव था कोई 
नेह,दया,अनुराग अलख भाव 
मन आँगन करुणा पूँजी बोई ,

नहीं ईर्ष्या,द्वेष,क्लेश किसी से 
नहीं भय , दंभ , लोभ था कोई 
पाट की खाट पे सारी रतिया 
सबने सुख की निंदिया सोई ,

साधन,सम्पति,समृद्धि सब कुछ 
हृदय घट ही क्यों है सूख गया 
जिस पनघट पर सब मिलते थे 
अलमस्त आलम कहाँ मीत गया ,

मनवांछित वैभव के रस में पग 
प्रशांत नगर ही बह गया कहीं 
तनावग्रस्त,दुःख घोर यातना में 
संसार निराला ही बह गया कहीं ,

विश्वास,आस्था,नेह,आनन्द 
निर्वासित हो गए जीवन से 
शान्ति ने ली वनवास सदा की 
हुए संग्रह प्रत्याशा में निर्धन से ,

अंतर्मुखी लोक का बुर्ज ढह गया 
बहिर्मुखी दुनिया का वरण कर 
फिर क्यों घोर निराशा,नीरस मन 
मिला जो सुख तज,निज तर्पण कर ,

उपलब्धियाँ थीं जीरो जब तक 
अनगिनत विभूति के मालिक थे 
आकण्ठ मिठास थी रिश्तों में भी 
पूर्व की निधियाँ दीर्घकालिक थे ,

बिखरी संस्कारों की सब कड़ियाँ 
बैरी अहंकार नरेश के शासन में 
मूल्यों का चीरहरण प्रत्यक्ष हो रहा 
निर्लज्य होती असभ्यता के हाथों में ,

व्यर्थ लालसा,कामना,तुलना में 
मानवता भंवर जाल फँस खोई 
अंतहीन संपदा की ख्वाहिश 
बुनता ख़ुद मकड़जाल हर कोई ,

न लेकर जग में आया कुछ कोई 
ना लेकर ऊपर कोई कुछ जाना है 
गया सिकंदर भी खाली हाथों बंधु 
मूलमंत्र निहित जग जाना-माना है ,

पद का मद समृद्धि की सत्ता 
सामर्थ्य शक्ति और भौतिकता में 
बेमानी हो गए नाते बातें सारी 
करता बोध,लोप अकर्मण्यता में ,

छोड़ प्रलोभन संग्रह का साथी 
सीखो जीवन ख़ुशहाल बनाना रे 
बस अभिरक्षक ,संरक्षक बनकर
साथी न्यासी का फ़र्ज़ निभाना रे । 
                                   शैल सिंह 



Friday, 26 September 2014

कुछ क्षणिकाएँ

''हे मेरे अन्तर्यामी''

 जीवन के  सूने स्वप्न सदन में 
 सृष्टि  की  समरसता  भर  दो 
 उद्भ्रान्त पथिक के विवर मन में          
 शाश्वत जीवन का रंग भर दो ,

लगता मेरा दुःख सबका दुःख है 
सबका दुःख मेरा अपना दुःख है 
तभी तो  राग एक  है रंग अनेक 
और भाव एक है बस अंग अनेक ,

हम सब जलती आग के ईंधन हैं 
मरना सबको इक दिन सत्य यही 
क्षणिक मिलन के मोद में भूलें ना 
मिलने औ बिछड़ने के तथ्य कहीं ,

दृढ़ प्रतिज्ञ हों तन-मन से यदि 
तो नहीं असम्भव होता कुछ भी 
जीतनी विकट हो राह लक्ष्य की
पथ हो जाती सुगम कंटकमय भी ,

कभी लक्ष्य नहीं देखता 
   धुप,ताप,छाँह,बिजलियाँ 
      पग चल पड़ते हैं बेपरवाह
         दिशा की खोज में अन्जान 
            चाहे लाख काँटों भरी हों 
               जीवन की हर पगडंडियाँ । 
                                             शैल सिंह 




Thursday, 25 September 2014

                                                                             ''माँ अम्बे''

 
शिलाएं तो बेजान ये शिल्पी की रचना
क्यूँ भटकती रही आज तक द्वारे-द्वारे
माँ के दर्शन को प्यासी ये दोनों आखें
जगदम्बे बसी जब कि उर में हमारे ,

मन में विश्वास का एक मन्दिर बनाकर
कल्पनाओं में साकार प्रतिमा सजाकर
सच्ची लगन का दीया,धूप,चन्दन,अगर
अखण्ड श्रद्धा की रोली,अक्षत चढ़ाकर ,

विश्व संताप के शमन को हवन हैं किए
सुख शांति औ समृद्धि अमन के लिए
आरती भी उतारी पूजन,अर्चन किया
शीश चरण में झुकाया नमन के लिए ,

जग की तरिणी डांवाडोल अब हो रही
देवभूमि से संस्कृति विलुप्त हो रही
हम सबकी आधार माँ बस तू-ही-तू
टूटी कश्ती की पतवार इक तू-ही-तू ,

दोनों कर जोड़ती अर्चना सुन ले माँ
स्याह फैला अँधेरा धरा पर मिटा दे
मन से मन के सभी टूटे तार जोड़कर
प्रेम की घर में पावन सी गंगा बहा दे ,

मन के दुर्भाव कर भष्म नैन ज्वाला से
जग में सद्भाव भर दे अभय हस्त से
हम सन्मार्ग पर ही सदा चलते जाएं
कभी जिसपे न आँधी औ तूफान आए ,

भाव भक्ति का भर सदाचारी बना
स्वार्थ सारे मिटा परोपकारी बना
शिष्य तेरे सभी सत्यपथ पर चलें
लाली नवयुग की बन दमकें;खिलें ,

विश्व की वेदना का हम चिन्तन करें
और विकल हो उठें जग के भय पीर से
दिव्य अहसास का बोध जन-मन को हो
निर्मल हिय से सदा बांट लें दर्द को ,

ज्ञान के यज्ञ में स्वाहा कल्मष करें
साथ सब मिल हँसें भाव ऐसा भरें
ऐसी दुनिया बना दे जो लागे भली
नेह की बाती जलती रहे हर गली ।
                                 शैल सिंह 

Monday, 22 September 2014

''अपनों ने जो दर्द दिया''

कहना तो चाहुँ बहुत कुछ मगर
सम्भल जाये ज़ुबाँ तो मैं क्या करूँ ,

शब्द शिकवे के बड़े ही लचीले यहाँ
अर्थ का अनर्थ हो ना जाए कहीं
मोड़ एक पड़ाव तक जो ठहरे अभी हैं
परे हटकर कुछ हो ना जाये कहीं
मैं अनुरक्त उनकी वो समझ ना सके
भ्रान्ति मन में उठे तो मैं क्या करूँ ।

लाख दे दो हमें तुम बद्दुवाएं मगर
साये से अपने विरत ना करना कभी
प्रश्नों की झड़ियाँ लगाने से पहले
अरे परखा तो होता विश्वास को भी
क्या-क्या पृष्ठ पीछे गुल खिल गया
आप मुझसे छुपाएं तो मैं  क्या करूँ ।

उस ग्रन्थि को कैसे सुलझाऊँ भला जो
रंग-रंग में निपुणता से बोई पिरोई गई
मिलेगा कहाँ रंग-रोगन खुद ही बता दो
पालिश कला में ये जुबां जो डुबोई नहीं
मुझे तूलिका में सही रंग भरने न आया
हजार रंगों की है दुनिया तो मैं क्या करूँ ।

अब समझने को बाक़ी कुछ भी नहीं
भाषा भावों की आती है पढ़नी मुझे
विवश,धैर्य का ज़ाम थामे घुटती रही
सही समय की प्रतीक्षा ने रोका मुझे
कौन कितना ग़लत कौन कितना सही
आप इतने अन्जान हैं तो मैं क्या करूँ ।

विनती हमसे ग़िला कभी करना नहीं
लाचार वजूद की कोई अहमियत नहीं
अति साधारण बेक़सूर इंसान हूँ मैं
पर स्वाभिमान मरा नहीं जिन्दा हूँ मैं
आप पूछते हैं कि ये सब क्या चल रहा है
बेहिचक कह ना पाऊँ तो मैं क्या करूँ ।


मेरे ख़्वाबों की दुनिया है छोटी मगर
बदसूरत और कुरूप बिलकुल नहीं
अतीत हमसाया बनकर सदा साथ है
समझना ना सपनों की महफिल नहीं
सृजन के विस्तार का ख़ूबसूरत आकार है
राह काँटों भरी दुर्गम तो मैं  क्या करूँ ।

अधर खुलते नहीं तो मूक वाणी नहीं
स्वस्थ मस्तिष्क बीमार है ना बेज़ार है
हो ना जाना ख़फ़ा फिर किसी बात से
मान लेना कि दिल का ये गुब्बार है
दिल पर इल्ज़ाम की चोट खायी हुई हूँ
बिफरे क़लम की जुबाँ तो मैं क्या करूँ ।

टीस गहरी चुभन जिसमें कसक तेज भी
कितना मरहम लगाऊँ ऐसे नासूर पर
घर उनका भी जलेगा इक दिन जरूर
जिसने फेंकी चिंगारी है मेरे फूस पर
लगातीं काकी बुझाती ये क़िस्सा सही
फन ऐसे मुझमें नहीं तो मैं क्या करूँ ।

स्वार्थ में शख़्स क्यों इतना मगरूर है
चाटुकार,लोलुप,मिथक औ बेईमान भी
जो प्रतिमा स्थापित उर के तख़्त पर
फांस मन में मेरे प्रति क्यों चुभोई गई
पाट सकने में जिसे दक्ष ईंट गारे नहीं
मन की खरोंचे,दरारें तो मैं क्या करूँ ।

हमपे सितम की जो बिजली गिरी है
बदली घिरी है हवाओं से छंट जाएगी
वो तो सराबोर भींगेंगे उस दिन जरूर
जिस दिन बरखा झमाझम बरस जाएगी
कितने बेचैन हम वो आजकल चैन में
सुकून मुझसे जो रूठा तो मैं क्या करूँ ।

आपके वास्ते क्या से क्या सह गए
जुबां ख़ामोश थी और वो सब कह गए
आप भी जिनसे वाकिफ़ बहुत ख़ूब हैं
फर्क इतना वो नज़दीक हम बहुत दूर हैं
स्वयं पर संयम तो रखा बहुत आपने
पर कड़वा आभास हो तो मैं क्या करूँ ।

कहने को अपने बहुतेरे सफर में मिलेंगे
वक्त के दहलीजों पर ढूंढ़ेगी आँखें सदा
कौन कितना पराया सगा कौन कितना
ये तो बताएगी वक़्त पर समय की वफ़ा
आप अपने थे रहेंगे हमेशा हमारे मगर
आग ये दुनिया लगाये तो मैं क्या करूँ ।

इतनी लिखने की धृष्टता मैंने जो की
माफ़ करना कोई जो भूल मुझसे हुई
आप उकसाते थे प्रायः कविता लिखो
उर के उद्गार वास्ते कवयित्री बन गई
बहुत रोका-टोका मनाया भी लेकिन
बदमाश पोरें ना मानें तो मैं क्या करूँ ।
                                           शैल सिंह


Saturday, 20 September 2014

ग़ज़ल

चलती थी सड़कों पे बेनक़ाब
हुस्न  ने  परदा  गिरा  दिया 
जब   याद  ज़माने  ने  मुझे 
उम्र  का   दरजा दिला दिया । 

जरा  कैद कर लो हिज़ाब  में 
शोख़ अदाएं ये मस्त जवानी 
कह - कह कर बुज़ुर्गों  ने  मेरे
ज़िस्म  का  ज़र्रा जला  दिया । 

मुड़ -मुड़  के  देखते  थे  लोग 
जिस गली से  कूच करती थी 
मेरी  बेबसी का ऐ  खुदा  तूने 
अंजाम  ये कैसा  सिला दिया । 

नालाकाश में बताइए ज़नाब 
मुस्कराएं तो भला हम  कैसे 
कहाँ से आई ये पाग़ल शबाब  
जो हमें परदानशीं बना दिया । 

रुख़ पे कैसा लगा ये रूवाब 
किन अल्फ़ाज़ में कहूँ लोगों 
इस बेकसूर  नूरे हूर  को बस 
तसब्बुर का आईना बना दिया  । 

                                   शैल सिंह 

Thursday, 18 September 2014

कुछ शेर


छोड़कर अपना सामा शहर  आपके
छोड़कर जब चली मैं शहर आपका
अहदे-वफा के महके रस्ते वो लम्हें 
साथ आया याद का कारवां आपका ,

तेरी अता करूँ या परस्तिश मौला
कभी तो गुजारिश मेरी भी सुन ले
भर दे अज़ाब राहें मता-ए-ऐश से
मुज्ज़तर बहुत तारीक मेरी हर ले ,

वक्त ने तो भर दिए हर ज़ख़्म लेकिन 
वक़्त गुजारने में क्या-क्या गुजर गई
उन्हें क्या मालूम शबे-फ़िराक़ की सदा
ख़ामशी ना जाने क्या-क्या निगल गई ।

अता--तारीफ़ , अज़ाब--मुश्क़िल ,
मता-ए-ऐश--सुख चैन की पूंजी
मुज्तर--घायल,दुखी ,
तारिक--अँधेरा,
                                  शैल सिंह   

Friday, 12 September 2014

हे प्रभो

आस्था श्रद्धा की अविरल बौछार प्रभो
जलधार समझ कर पी लेना ,

मेरी निष्ठा,नैतिकता ,पुनीत कर्म प्रभो
अगर,अक्षत गंध बना लेना ,

मेरी साधन क्षमता ही तेरा नैवेद्य प्रभो
सम्पदा का चन्दन घिस लेना ,

करुणा दया सद्दभाव समझ भोग प्रभो
सद्द्गुणों का दीप जला लेना ,

सामर्थ्य का पुष्प चरण रज अर्पित प्रभो
अनुकम्पा असीम बरसा देना ,

ग़र अस्तित्व तेरा जग अन्तर्यामी प्रभो
अद्वैत चमत्कार दिखला देना ,

तिरोहित मन का मनोरथ कर देना प्रभो
विश्वास बलवान बना देना ।
                                                   शैल सिंह 

जाने क्या हश्र हो

ओ मेरी गुड्डी,तारा,मैना राना
ना अँखियों में ख़्वाब सजाना 
सात समन्दर के उस पार का 
धोख़े फ़रेबी नीरस संसार का ,

सब्ज़बाग के कितने रंग दिखा
ले जायेंगे बहेलिये बहला कर 
मक़सद हासिल कर देंगे छोड़ 
हाशिये पे बदनसीब बेहाल कर ,
                                
बजेगी शहनाई द्वारे ढोल नगाड़े 
भाड़े के टट्टू आएंगे बाराती सारे
विश्वास छलेगी छल की दुनिया 
ठगे से हाथ मलेंगे हितैषी बिचारे ,

इतनी बेताब ना हो अरे बालाओं 
विदेश की सैर लिए कर पीले हाथ 
जाने क्या हश्र हो मंजिल पर तेरी 
पता चलेगा ख़्वाब बिखरने के बाद  , 

किससे करेंगी शैल बयां हाले-दिल 
सब अवरुद्ध मार्ग जब हो जाएंगे
चमक-दमक दम घोंटू आबो-हवाएं    
निगलेंगी अपने भी पराये हो जाएंगे ,

जब असलियत का होगा पर्दाफ़ाश 
क्या होगा तूफानों में घिर जाने पर 
निष्ठुर परदेश भी देगा गुड़िया दगा 
क्या होगा सामां समूल खो जाने पर ।   

                                                शैल सिंह 

Thursday, 11 September 2014

उनका कोई मुझे पता दे

काशी क़ाबा,मंदिर-मस्ज़िद औ अज़ान कुरान सब देख लिया
शंख-घंटियाँ,पूजा-पाठ,गीता ग्रन्थ,वेद पुराण सब देख लिया
दान-पुण्य कर पितृ पिण्ड दान कर चारों धाम सब देख लिया
कर्म प्रधान है फल देंगे भगवान कर श्रमदान सब देख लिया
कहाँ गए ईसा,रहिमन,राम सबका भज नाम सब देख लिया
कहाँ है अगम अगोचर अन्तर्यामी का ग्राम कोई मुझे बता दे
लिख भेज दूँ मन की सारी दास्तान उनका कोई मुझे पता दे ।
                                                                    शैल सिंह 

Tuesday, 9 September 2014

इंतज़ार कीजिए

बदल रही है आबो-हवा,फ़िज़ा मेरे देश की
जल्द आएंगे अच्छे दिन इंतज़ार कीजिए

भूखमरी मिटेगी ग़रीबी भी दूर होगी देश की
जीस्त सबके आएगी बहार इंतजार कीजिए

मुल्क होगा रौशन अमन के चराग़ से,ख़त्म
जुल्मों-सितम की जमात इंतजार कीजिये ,

ना तो आँख में आँसू किसी मजबूर बेबस की
दौर आएगा  ऐसा बरखुरदार इंतजार कीजिये ,

जमीं उगलेगी सोना सौ गुना खेती लहलहाएगी
खिलेंगे फूल ख़ुशी के मन द्वार इंतजार कीजिये,

ना ही कोई आँख तरेरेगा ना सहेंगे धौंस किसी की
अजी करेंगे दुश्मनों को खबरदार इंतजार कीजिये,

हमारे लुत्फ़ो-करम के आधीन नत विश्व भी होगा
कभी सुनेंगे बुलेटिन पर समाचार इंतजार कीजिये ,

अभी तो हुए हैं बस जुम्मा-जुम्मा चार दिन ज़नाब
ना कीजिये इतने प्रश्नों की बौछार इंतजार कीजिये ,

जिसके आवाज़ में जादू अंतर्मन छू लें जिसके भाव
देश को मिला ऐसा नगीना दमदार इंतजार कीजिये ,

                                                                        शैलसिंघ 

Friday, 5 September 2014

दहशत में है गाँव


जबसे देश में उत्पाद बढ़ा खाद्यान्न का
नरभक्षी भेड़िया और भी हो गया इन्सान 
डर है भूख क्षुधा की कहीं और ना बढ़ जाये 
आदमखोर आदमी और भी हो जाये हैवान ,

वह युग नहीं देखा इस पीढ़ी ने जिसमें लोग   
एक-एक दाने के लिए थे असहाय मोहताज़ 
सतुआ,भुट्टा,ककड़ी,कभी रस पी खा चबैना 
साथ रहते मेल-भाव से ख़ुश उम्दा था अंदाज ,

मुँह का कौर निवाला रख कठिन जतन से 
ख़ुद रुखा-सूखा रह बच्चों का भरते थे पेट 
हँसी-ख़ुशी से दिन बीतते बैर-भाव ना द्वेष 
आज सक्षम होकर भी सब कुछ मटियामेट ,

पिचके गालों पपड़ियाए होंठों पर भी तब तो
गुरबत में भी खिला करती थी हँसी मुस्कान 
मिल बैठ के दुःख सुख सब साझा कर लेते थे
दोनों जून सजती थी ठिठोली की हॉट दूकान ,

निर्भीक,निडर सोया करते थे खुली हवा में
सब बाग़-बग़ीचे ,ट्यूबवेल ,नीम की छाँव
बिजली,बत्ती ना पंखा घर ,डर से कैसे आज़
कोठरी भीतर दुबके रहते दहशत में है गाँव ,

ये कैसा युग आया घर में घर के लोगों से डर
सीमा पर दुश्मन के छल-कपट-छद्म का गढ़
मौत का स्वयम्बर रचा करते दुष्ट देश पड़ोसी
आतंकी उत्पात अनर्थ अत्याचार सभी की जड़
                                                         शैल सिंह ।  

Wednesday, 3 September 2014

मोदी जी के नाम


मैं आम आदमी हूँ
मुझे आम रहने दो 
जो मुझमें खास है वो खास 
मुझमें खास रहने दो,

छू लूँ बुलंदी रहे पर 
पांव जमीं के घास पर 
ईमानदार,साखदार बनूं 
रहे आँख समग्र विकास पर,

रत देश,जन सेवा में रहूँ 
सरलता हो संगी दूजी 
सहनशीलता रहे आभूषण 
ताजिन्दगी इमान मेरी पूँजी,

चाय बेचना गुनाह ग़र 
तो ये गुनाह बार-बार करूँगा 
मिले मरने के बाद जन्म ग़र 
तो फिर चाय वाला ही बनूँगा,

चाय ने ग़रीब को दिया   
जमीं से उठा अर्श पर मुक़ाम 
कमाल छोटे से पायदान का  
ईनाम में दिया हस्ती,शोहरत नाम । 

                                          शैल सिंह 



इक वक्त था जब


मुर्गे की बाँग से प्रारम्भ विहान होता
पक्षियों के कलरवों से सूर्योदय का भान होता
अब नहीं चहकतीं बुलबुलें भी वैसी बाग़ में
मोर-मोरनी के नहीं वैसी रोमांच नाच में
कोयल भी मीठी कूक सुनाती नहीं है रात में
अब नहीं वो बात जो बात पहले थी
जल रही है दुनिया ना जाने कैसी आग में।
                                              शैल सिंह  

Tuesday, 2 September 2014

''दिल्ली और मुंबई के रेप कांड पर मेरी ये कविता''

दुष्कर्म जैसे वारदात और नाबालिगों को शह देती व्यवस्था पर

ऐसे अपराधियों की सजा पर बिना मतलब बार-बार बहस क्यों छिड़ती है।कम उम्र का बच्चा अपना पौरुष बल दिखलाकर एक किशोरी का ,अपने से बड़ी उम्र की महिला का अस्मत तार-तार करने में सक्षम होता है ,
उस समय तो अपनी उम्र से बड़ा हो जाता है फिर इतने जघन्य अपराध के लिए सजा के वक्त नाबालिग क्यों करार दिया जाता है और सभी लोग मनोवैज्ञानिक क्यों बन जाते हैं ,इसी लिए बार-बार ऐसी घटनाएँ दुहराई जाती हैं ,इसका निदान तभी सम्भव है जब बालिग ,नाबालिग का मोहरा ना इस्तेमाल कर अपराध के बदले कड़ी से कड़ी सजा सुनिश्चित की जाये। 

                  ''दिल्ली और मुंबई के रेप कांड पर मेरी ये कविता'' 

कलुषित हो रही संस्कृति मानवता का ह्रास होता
सुरभित उपवन है आज समरसता का सार खोता
चमन से मद में सौरभ नीले अम्बर बहक गया है
कली-कली हर सुमन जंगल-जंगल दहक गया है।

विद्रूप हो रहा है समाज का मन फटिक सा दर्पण
हृदय पात्र क्यों है रीता कर अधर किसलय अर्पण
जहाँ कलरव स्वछन्द विचरते कोलाहल चीत्कारें
जीवन की जहाँ प्रत्यूषायें बरसतीं हलाहल अंगारें।

मस्तिष्क की शिराओं में वासना का वास भरता
मन के मचानों पर उन्मत्त राक्षस निवास करता
क्यों सोच का फलक इतना शापग्रस्त हो गया है
व्यभिचार की मण्डियों में ओछा सहवास करता।

संदल सुवास सा गमकता अमर मधुर वो बंधन
हर कोण को कलंकित करता सदी का परिवर्तन
रिश्तों की क्या परिधियाँ आज हो रहा उल्लंघन
कपटी विकृतियों का दंगल कर रहा अभिनन्दन।

आशनाईयाँ कैसी माँ-बहन-बेटियों की आबरू से
शुचिता कंचनी सिसकती हैवानियत की रूबरू से
सांद्रतायें दुर्भिक्ष हो रही नदी में दुर्भावना के बहके
मन कछार तट तोड़ के आत्मावलोकना की बहते।

नाबालिगों को शह देती लचर कानून की व्यवस्था
क्यों कुकृत्य करते वक्त आड़े आती नहीं अवस्था
जघन्य अपराध की मिले कड़ी सज़ा अपराधियों को
बहसों के खलिहान मत भटकाईये असल मुद्दों को।

अभद्रता की सीमाएं लांघते नाबालिग सयाने बनके
अस्मिता को रौंदते जब सोलहवें साल के घड़े भरके
नाबालिग करार देकर सजा का प्रावधान गर घटेगा
ऐसी दरिंदगी का हिसाब समाज खुद से ही कर लेगा।

                                                                   शैल सिंह


                                                             


Sunday, 31 August 2014

हम कश्मीर नहीं देंगे


चाहे जितनी चले शमशीर
हम कश्मीर नहीं देंगे
ये मेरी भारत माँ का चीर
मिटने तस्वीर नहीं देंगे ।

कश्मीर कोई मसला नहीं
कि समाधान खोजा जाये
कश्मीर कोई ज़ायदाद नहीं
कि व्यवधान बोया जाये
अलगाववादी मांगे जाके
भीख पाकिस्तान से
उठ रही है ताल ठोंक कर
चीख हिन्दुस्तान से
जान देंगे लाखों वीर
बनने मन्सूबों की खीर नहीं देंगे
ये मेरी भारत माँ का चीर
मिटने तस्वीर नहीं देंगे ।

कश्मीर देश की मूँछ,शान
सिरमौर जान हमारा है
हिंदुस्तान की गोद का
अहम अंग आन दुलारा है
दम मत कर नाक में
ना पीठ पीछे घोंप तीर
धूर्तों फोड़ देंगे नकशीर
मगर कश्मीर नहीं देंगे
देंगे टांगे सीना चीर
बनने मन्सूबों की खीर नहीं देंगे
ये मेरी भारत माँ का चीर
मिटने तस्वीर नहीं देंगे ।

नमकहराम होते भिखमंगे
ये कैसे लोग हैं हमने जाना
खाते-पीते यहाँ का हैं पर
गाते कहीं और का गाना
अरे जियो और जीने दो
रहो चैन से मन घोलो ना पीर
तेरी मूर्खों बदल देंगे तकदीर
ग़र हिम्मत है तो आगे आओ
मरोड़कर बहा देंगे बवासीर
बनने मन्सूबों की खीर नहीं देंगे
ये मेरी भारत माँ का चीर
मिटने तस्वीर नहीं देंगे ।

पापी पाक को ना दे तहरीर
वरना छोड़ेंगे ऐसी तीर
बहा देंगे तेरे नानी की भी नीर
रटना छोड़ अलग कश्मीर
समझा ले मन को धर के धीर
भारत माँ के लाखों बलवीर
पहना देंगे हथकड़ियाँ जंज़ीर
हम कश्मीर नहीं देंगे
मर जायेंगे मिट जायेंगे
बनने मन्सूबों की खीर नहीं देंगे
ये मेरी भारत माँ का चीर
मिटने तस्वीर नहीं देंगे ।
                            शैल सिंह





                   




  

बन्दे मातरम


माँ-बाप ,भाई-बहन ,पत्नी, बेटे-बेटी, गाँव की
सीमा के प्रहरियों तुम्हें सलाम देश जहान की
रख जान हथेली पे रखते लाज माँ के आन की
बुते तेरे महफ़ूज गुलिस्ताँ,चमन हिंदुस्तान की ।

''बन्दे मातरम'' ,''भारत माता की जय''
                                           शैल सिंह 

Friday, 22 August 2014

गिर-गिर संभल गया


ओ मुझे रिन्द कहने वालों
मैंने तो सिर्फ शराब पी है
ख़ुद कि वाहयात नज़र देखो
जिसने छक के शबाब पी है ,

मैं तो समां का लुत्फ़ लेकर
गिर-गिर संभल गया
देख खुद नज़र की करामात
सरे-राह क्यूँ फिसल गया ,

थे अश्क़ मय में शामिल
सबने जाम का सुरूर देखा
मग़र इस खुमार में नहीं क्यों
किसी ने मेरा कोहिनूर देखा ,

बहक कर नशे में मैं तो
कभी खोया नहीं था आपा
ना ढोंगी योगी बन किसी
नक़ाब डाला कभी था डाका ,

गम भूलाने के लिए तो मैं
तिल-तिल जल जा रहा हूँ
डर है कहीं जल ना जाए,जो
अमानत दिल में छुपा रहा हूँ ,

इक वो भी वक्त था नजर से
पीया ,था जमाल उनका साक़ी
अब वो वो रहे ना हम हम रहे
रह गया मैं और गिलास बाकी ।

रिन्द --पियक्कड़
                                 शैल सिंह 

Tuesday, 19 August 2014

प्रीति की रेशम डोर वास्ते



प्रीति की रेशम डोर वास्ते

नफ़रतें-रुसवाईयाँ जहाँ,जिधर देखो उस तरफ 
पश्चिमी तहज़ीब हमें ले जा रही है किस तरफ 
खुदगर्ज़ी सोई हुई बेफ़िक्र नेकियों की लाश पर 
दूर होता जा रहा आदमी ,आदमी से हर तरफ।

दायरा नफ़रतों की आग का बढ़ता ही जा रहा 
सिलसिला बेबाक हादसों का बढ़ता ही जा रहा 
खता पर खता इन्सान करता रहा ईमान बेचकर 
वेदना की परवाह किसे एहसास मरता जा रहा । 

गुलिस्ताँ से ख़ुशबूवें आज़ बेज़ार होती जा रहीं 
कैसा हुआ ज़माना दामनें दाग़दार होती जा रहीं  
धधक रहा जगत धर्मान्ध हो हैवानियत के हाथों  
कहाँ खोया अमन जिंदगी लाचार होती जा रही । 

भय,जुल्म,आतंक मुक्त जग, दारुण शोर वास्ते  
निडर इब्तिदा करें मिलकर खूबसूरत भोर वास्ते 
गिले-शिक़वे ना हो मन मुहब्बत ही मुहब्बत हो      
आओ नज़ीर पेश करें प्रीति की रेशम डोर वास्ते ।
                                              शैल सिंह

Thursday, 14 August 2014

भीषण अपराधों के मालिक तुम


भीषण अपराधों के मालिक तुम



हे गर्वित निष्ठुर भगवान सुनो
क्यों बैठ के लीला देख रहे तुम
आँखें मूँद हिमालय चोटी पर
पत्थर दिल द्रवित नहीं होता रे
क्यों समाज के करुण शोर पर ,

साधना अवहेला कर दी घायल
सृष्टि रचने वाले ईश कहाँ तुम
कैसे भाव अभाव से भरे हृदय में
जहाँ इंसा इंसा का मोल न जाने
मर्यादाएँ लहूलुहान दाग़ दामन में ,

अर्चना दुहाई कब मन भाई निर्दय
क्यों पाप-पुण्य की खिंची रेखाएं
सब तेरी ही मर्जी का खेल तमाशा
जग जीवन त्रस्त,अस्त-व्यस्त,क्या 
पाषाणी जाने तूं क्लान्त की भाषा ,

भीषण अपराधों के मालिक तुम
तुम्हीं संतापों के निपुण रचयिता
क्या कभी ग़ौर से देखा भी तुमने
हादसों ,हत्याओं के कालसर्प को
चीरहरण की चीखें वीभत्स दर्द को ,

कूटनीतिक व्यूह सब तेरी चाल का
सांसों की आजाद तरंगे भय से बंदी
चाँद-सूरज पे भी आतंकों का साया
जीवन गिरवी भी तेरे हाथों भिखारी
हिंसा के दावानल में भी तेरी माया ,

भेदभाव कर नर-नारी के अवयव
देख शर्मनाक दृश्य स्व करनी का
तेरे बंदे ही डाका डाल रहे लाज पर
रूह कँपाते हाथ तेरे आपदा त्रासदी
काश होता हवालात दोष निर्माण पर ।


                                  'शैल सिंह 

Wednesday, 13 August 2014

ऐसा है हमारा वतन

ऐसा है हमारा वतन

हमारे वतन के आगे भला क्या बिसात और देश की
गोदी में जिसकी खेलतीं हजारों जातियाँ रंग,भाषा,वेश की।

हमारे वतन के आगे भला क्या बिसात और देश की
सोहबत में जिसके विहँसते हैं सदा नदी रेगिस्तान रेत भी।

हमारे वतन के आगे भला क्या बिसात और देश की
जहाँ मन्दिरों में गूँजे घण्टियाँ सुनाई दे मस्ज़िद अज़ान की।

हमारे वतन के आगे भला क्या बिसात और देश की
जहाँ ईसा को मिले मान हो सम्मान गुरु गोविन्द महान की।
                                                                         'शैल सिंह'

Monday, 11 August 2014

अव्यक्त हृदय के आँसू


अव्यक्त हृदय के आँसू 


जब बड़ों में ही कोई नहीं बड़प्पन
तो क्या सीखेगा रेशम सा बचपन ।

कोई संयम का तटबन्ध है तोड़ा
और हृदय विदीर्ण किया है आज,
मन छलनी कर ज्वाला भड़काई
खण्ड-खण्ड कर रिस्तों का साज़ ।

ग़र नहीं दे सकते वह किसी को
दो मीठे बोलों की अमृत का बूंद
हँसके कटाक्ष कर कस फब्तियाँ
ना बनायें और सम्बन्धों को ठूँठ ।

कहीं ख़ाक न कर दे अहंकार यह
डर है अहंकारी का समूल विनाश
कुछ सीखे ले प्रकृति सौरभ से जो
हरदम महकाती प्रतिकूल सुवास ।

कुछ अर्ध विक्षिप्त से अपने है जो
सभी को नीचा दिखलाया करते हैं
नसीहत उसी सुनाने वाले को खुद
क्यों नहीं सुनने का माद्दा रखते हैं ।

सहने सुनने की भी इक सीमा होती
जब हिम्मत की औक़ात बताने की
क्यों तिलमिला कर आग बबूला हुए
बहरूपिया हैं रंग बदलना आदत सी ।

अपने कुत्सित भावों का परिचय दे
सदा सभी पर गरल उँड़ेलते हरदम
वो बहुरंगी अभिनय के वैभवशाली
सीखें लें जहाँ पियूष बरसते हरदम ।

क्यों आदर्श पुरुष बन जग सम्मुख
महान साबित करते खुद ही खुद को
मानवता विहीन,संवेदन हीन पता है
बहुत ख़ुश होते आहत करके सबको ।

कोई नहीं किया प्रतिवाद तो खुद को
सर्वोपरि मान करते सबका अपमान
ऐसे अभिमानी को ये बतलाना होगा
कौन दबा पाँव तले जो देगा सम्मान ।

अव्यक्त हृदय के आँसू बहे काव्य में
कवि ने पन्नों पर विफर व्यथा दर्शा   
द्रवित भावों के क़तरों ने शब्द तराशा 
मूक लेखनी ने असीम शांति बरसा |

                                       शैल सिंह 



Thursday, 7 August 2014

शायरी


ग़र मुस्करा दो जानेमन,जानेजां
गुल गुलशन के सारे निखर जाएंगे,

तेरे चलने से आये खिजाँ में बहार
शमां दिल की जलाओ ठहर जाएंगे,

गर बिखरा दो जुल्फों की काली लटें
मस्त मुनव्वर घटा में नजर जायेंगे ,

दिल गर छेड़ दे प्यार की दो ग़ज़ल
गम के लम्हें भी सर्र से गुजर जाएंगे,

तलब तेरे भी आँखों में देखी है, ग़र
हक़ीक़त बयां हो दिल में उतर जाएंगे ।

                                  शैल सिंह 

Monday, 4 August 2014

मेरे गाँव सी



जब भी शहर आया कोई गाँव से हमारे
मानो यादों की गठरी लाया बचपन की सारे,

भोर की गुनगुनी धूप साँझ की लालिमा
खिल के परिदृश्य नाच उठते अँखियों के द्वारे ,

मित्रों की मण्डली टीला गाँव के छोर का
उछल-कूद नदी,बाग़,गपना पोखरों के किनारे ,

बेल,झरबेरी,जामुन,ईमली आम का टिकोरा
मछलियों का पकड़ना ओ फंसा कंटियों में चारे ,

थपकी आजी की माँ की झिड़की मीठी-मीठी
बाबूजी का नेह काका बाबा के दुलारों की फुहारें ,

दूध,दही,दाना,रस,मट्ठा,महुवा का ठेकुवा
हाट-बाट,राम लीला,नाटक,मेला गाँव के चौबारे ,

होली का हुड़दंग,दशहरा,दीवाली के पटाखे
बाइस्कोप ,गिल्ली-डंडा,झूला,कंचे तैरते नज़ारे ,

मजूर शलगु दादा,मुंशी धोबी,महजू काका
महरिन काकी का पानी भरना नित साँझ-सकारे ,

यहाँ कब उगता सूरज ढलती है शाम कब
कब नहाती चांदनी में रात जगमगाते कब सितारे ,

कैसे होते पड़ोसी रखते पट बंद खिड़कियां
कहाँ जानते हैं शहर वाले मेरे गाँव जैसे भाई-चारे ,

है शहर की कहाँ सोंधी महक मेरे गाँव सी
फिरती रही भीड़ भरे नगर में भी मायूस मारे-मारे ,

                                                                        शैल सिंह

चाँदनी सी शीतलता


चाँदनी सी शीतलता


चाँदनी सी शीतलता जब मन ना घुली
तो चाँद पर पहुँच जाने से क्या फ़ायदा ,

मानवता ने मानवता जब छुआ नहीं
खुद महानता दर्शाने से क्या फ़ायदा ,

दिल को आहत करे जो हर लफ्ज़ से
उसे महात्मा बन जाने से क्या फ़ायदा ,

छोटे-बड़ों का आदर सम्मान ही नहीं
तो उसके धनवान होने से क्या फ़ायदा ,

जो हाथ ग़ुरबत में भी देना सीखा सदा
गुर धनवान ना सीखा तो क्या फ़ायदा ,

खुद के लिए जीते करते हैं संग्रह सभी
किया जग के लिए ना तो क्या फ़ायदा ,

क्यों झुकी रहती है डाली फलों से लदी
मगरूर ओहदा न जाने तो क्या फ़ायदा ,

सुख समाये ना जिसमें हर ख़ुशी के लिए
माल,दौलत और शोहरत से क्या फ़ायदा ,

दिल दुखे ना जिसका दीन दुःखी के लिए
भला धर्म,कर्म,दान,पुण्य से क्या फ़ायदा ।
ग़ुरबत--ग़रीबी
                                           शैल सिंह

Wednesday, 30 July 2014

नौमीद मत होना जहाँ आफ़री साथ तेरे


घबराकर तुम कभी ग़म-ए-हयात से
जिंदगी बेबस दूभर ना खुद बना लेना
हर भयावह रात बाद रंगेशफक़ सवेरा
होगा, बात सोज़ दिल को समझा लेना ,

असंख्य गुलाबों की बाग़ है ये दुनिया 
फूल चुनना शूलों से दामन बचा लेना 
ये दुनिया है फर्श चिकना चौंधियाकर 
फिसल ना जाना खुद को संभाल लेना ,

महरूमी-ए-किसमत पर हँसे जमाना 
जुल्में-दुनिया से हाले दिल छुपा लेना
ऐतबार,वफा ,खता आग के दरिया हैं 
इरादों का अपने ना ख़्वाब जला लेना ,

मायूस हो मुश्किले-हालात से हरगिज़
न खुद को ग़म के आईने में ढाल लेना
वक्त के ज़ालिम हाथ की कठपुतलियां
हम,किस्मत रंग लाएगी आज़मा लेना ,

यही इम्तिहान की कठिन घड़ी है दोस्त 
आस्मां पे लक्ष्यों का उगा अरमान लेना 
जिंदगी इक जंग है संघर्ष अनवरत सही 
ठोकरों की नोंक पे अंगड़ाई जवान लेना ,

जो काबिल नहीं तेरे तरज़ीह भी ना देना
इन फ़िक्रे-दिल-फ़िगारों से मुँह फेर लेना
गिरगिटों की तरह मवाली हैं रंग बदलते
बेवफाओं की जुदाई का मातम देख लेना ,

नौमीद मत होना जहाँ आफ़री साथ तेरे
वारिस्ता होकर अपना मुक़ाम बना लेना
मयस्सर नहीं खुशियाँ उसे परलोक भी
मरेगा वो तेरी ही मकरमत् पे जान लेना ,                                                                   

मर्दों की नस्ल का है ईमान बड़ा ज़ाहिल 
मेहरो-मुरव्वत से पहले जरूर जाँच लेना 
रहमत ख़ुदा की होगी जहान की ख़ुशियाँ 
खुद आँचल में आ गिरेंगी बात गाँठ लेना । 

फ़िक्रे-दिल-फ़िगारों --दिल दुखाने वाली सोच
नौमीद--हताश , जहाँ आफ़री--संसार रचने वाला  ,
वारिस्ता --आजाद , स्वछंद  ,मकरमत्--दया ,अनुग्रह ,
मेहरो-मुरव्वत--मेल,मुलाक़ात,
                                               शैल सिंह

हम ऐसे फूल हैं ख़िज़ाँ में महकेंगे ख़ुश्बू सदा बनके ।

हम ऐसे फूल हैं ख़िज़ाँ में महकेंगे ख़ुश्बू सदा बनके 

 

मेरी ख़ुद्दारी पे बन आई खुदा खुद्दार बनाये रखना
क़ुर्बान जाऊँ इसपे लाज परवरदिगार बचाये रखना ,
क़ाईल मौजे हवा से हूँ वो बदलते मौसम से हो गए 
चेहरा-ए-अय्याम देखे कमाल बेदार इसी से हो गए ,

सई-ए-मुक़र्रर को सहने की अब ताब नहीं मुझमें 
तज़कारा से क्या फायदा कोई अब चाव नहीं उनमें ,
  
उनकी फितरत ही ऐसी खुदशनास भी होंगे खुद से 
यही अज्ज होता है रस्मो-राह रखना रज़ील रुत से ,
कैसे सैय्याद हैं दहर में समय से जान लिया अच्छा 
ऐसे सुकूत से ज़िंदगी को निजात मिल गया अच्छा ,

अवारगाने-शहर में वो रूप का ज़ेवर सजाये रक्खें  
ग़लतफ़हमियों के आईने में ऐसे तेवर सजाए रक्खें ,

शाहकार बहुत दहर में ख़ुदा की इनायत सदा हमपे 
हम फूल हैं ऐसे ख़िज़ाँ में महकेंगे ख़ुश्बू सदा बनके । 

क़ाईल--संतुष्ट ,चेहरा-ए-अय्याम--लोगों के चेहरे 
सई-ए-मुक़र्रर--किसी होनी के दुबारा घटने का अंदेशा 
तज़कारा--बहस करना ,चर्चा ,खुदशनास-- खुद को पहचानना 
अज्ज--परिणाम ,रस्मो-राह--वास्ता रखना ,रज़ील--क्षुद्र ,नीच 
सैय्याद--शिकारी ,सुकूत--व्यवहार ,हयात--जीवन ,
अवारगाने-शहर--शहर में आवारा घूमने वाले।,
 शाहकार--प्रशंसक,चाहने वाले                                                  

                                                                     शैल सिंह

Tuesday, 22 July 2014

अनवार दिल पे सितम ढा रहे हैं


अनवार दिल पे सितम ढा रहे हैं


रात चाँदनी में नहाई हुई है
झिलमिल सितारे जगमगा रहे हैं
नागवार दिल को लगे ये नज़ारा
अनवार दिल पे सितम ढा रहे हैं।

नज़रों की खुराफ़ात खता दिल से हो गई
सदमा सिवा दिल पे जुदा तुमसे हो गई
कौन हूँ मैं तेरी क्या वाबस्ता तुझसे मेरा
सोच तरदीद तेरा निशात सहज़ हो गई ,झांकते हैं पलकों की बन्द झिर्रियों से
अबस यादों के गुस्ताख़ गुजरे ज़माने
यादों के पाँखी मन क़फ़स में फड़फड़ाये
रक़्स करते हैं जख़्म जवां हो पुराने ,

ये जलवे फिज़ा के ये शब की गहनाई
मंज़र वही पर रौनक़े-महफिल नहीं है
हसी ग़ुंचे वही सबा, पेशे गुलशन वही है
मगर जलवा-ए-नुरेज-अज़ल वो नहीं है ,आहिस्ता-आहिस्ता ये रात ढल रही है
रुख पे डाले नकाब चाँद छिप रहा है
आसमां के जुगनू सितारे सो गए सब
दिल बहलाने के वो सहारे खो गए सब ,

शेर --

गुजरे किस दौर से हैं फिर भी मुस्कराये
तख़लीफ़ कर हम खुद-बख़ुद गुनगुनाये
तंज कसते मजरूह दिल पे अहबाब सा
रेअसास जख्मों का रखा है दिल से लगाये ।

                                      शैल सिंह


Monday, 21 July 2014

कितने मौका परस्त तुम


कदम-कदम पे भरोसे को आघात मिला 
वफा को मेरी बेवफाई का सौगात मिला ,

मेरी शाइस्तगी का बेजां इस्तेमाल हुआ  
ख़ाकसार होना क्या गुनाह बदहाल हुआ ,

शिद्दत से ऐतबार करना ही जुर्म था मेरा
पुरदर्द,पुरसोज से सम्मान गर्क हुआ मेरा ,

ऐसी बशारत दे बिस्मिल किया क्यूँ दोस्त 
वाकिफ बरगस्तगी से बुरहान मत दे दोस्त ,

इस बदअहदी का खुदा ही जवाब दे अच्छा 
तेरी बदनीयत पर रग़म रहना मेरा अच्छा ,

अर्से की भली दोस्ती का मख़ौल खुद उड़ाया
बाज़ीच मेरा दिल क्या तोड़ जश्न जो मनाया ,

क्या कहेगी दुनिया ऐ खुदगर्ज़ ये ना जाना 
हम भी होंगे ख़ुश इक़बाल आके देख जाना ,

ख़यानत तुझे मुबारक़ मेरी सादगी ही देखी 
कितने मौका परस्त तुम ये वानगी भी देखी । 

शाइस्तगी--शिष्टता,सभ्यता                
ख़ाकसार--विनीत,विनम्र               बुरहान--युक्ति ,सफाई 
पुरदर्द--दर्द से भरा हुआ                  बदअहदी--वादा खिलाफी 
पुरसोज--जलन और तपन             रग़म--घृणा ,नफ़रत 
बिस्मिल--आहत                            बाज़ीच--खिलौना 
बशारत--प्रसन्नता                         ख़यानत--विश्वासघात 
बरगस्तगी--विमुखता                     ख़ुश इक़बाल--सौभाग्यशाली 

                                              शैल सिंह 



Sunday, 13 July 2014

रिमझिम सावन जो बरसे

रिमझिम सावन जो बरसे 


एक तो किल्लत बिजली की
उसपे हवा भी गुम हो
मौसम की मार सही ना जाए
कैसी बेशरम गर्मीं तुम हो ,

करत निहोरा मानसून का
बीता मास आषाढ़
सावन उमस में काट रहे
कब होगी नदियों में बाढ़ ,

पेट की अगन बुझाने को
मरना खपना बदा रसोई में
टपर-टपर टिप चुवे पसीना
दम निकले आटा की लोई में ,

बड़े बुज़ुर्ग दुवरा दालान में
रुख पे डाले घूँघट कनिया
कोठरी भीतर अऊंस रही
लेके हाथ में डोले बेनिया ,

डीह-डिहुआरिन पूज रहे सब
टोटका करि करि मेंह बुलावे
मँहगाई करे हाल बेहाल
कैसे जल बिन जिनिस उगावें ,

जरई सुख रही क्यारी में
रोपनी मूसलाधार को तरसे
प्यासी धरती निष्ठुर मौसम
भींगे रिमझिम सावन जो बरसे ।

कनिया--दुल्हन ,अऊंस--उमस
     शैल सिंह



Wednesday, 9 July 2014

धरा को मौसम की सौगात तो दो


टकटकी लगाये देखें आँखें 
बस अम्बर की ओर
कड़क तड़क कर ललचाये
काली घटा घेरी घनघोर ,

ख़फा-ख़फा क्यों बरखा रानी
कर दो ना थोड़ी मेहरबानी
लेकर उधार कजरारे बादल से
नियत समय बरसा दो पानी ,

कृषक बेहाल हैं सुखी धरती
खेत कियारी पड़े हैं परती
कहीं दिखे ना हरी दूब औ चारा
भेड़ बकरियां गायें क्या चरती ,

घर नहीं अन्न का एक भी दाना
ठाला पड़ा कोठिला का कोना
रहम करो ओ बादल राजा
लगा लो गुदड़ी का अन्दाजा ,

घर जला नहीं है कबसे चूल्हा
फटका कबसे नहीं है राशन कूला
सुखा कंठ हैं क्षुधा है भूखी
काट रहे दिन खाके रूखी-सूखी ,

सूरज बहुत हो गई तेरी वाली
तपन से झुलसी देह की बाली
कृपा कर सूनो मानवता का शोर
कब होगी धुँधलाई आँखों में भोर ,

क्यों कंजूस बने हो मेघराज जी
धरा को मौसम की सौगात तो दो
बोवनी का समय खिसक ना जाए
गायें सभी मल्हार बरसात तो दो ,

आमंत्रण स्वीकार करो आह्लाद से
छोड़ बेरुखी घन धमक दिखाओ ना
टर्र-टर्र करती मेंढकी ,चर-अचर के
भी,मन की,बूँदों प्यास बुझाओ ना ।

कियारी--क्यारी ,परती--बिना बुवाई जुताई
कोठिला--अनाज रखने का हौज
फटका--पछोरना ,कूला--सूप

                                    शैल सिंह 

Tuesday, 1 July 2014

विदेशी भाषा अंग्रेज़ी

                   विदेशी भाषा अंग्रेज़ी


हिंदुस्तान में ही जब शाख़ नहीं हिंदी की तो कैसा हिंदुस्तान
जिस भाषा को ढाल बना लड़ा ये देश था स्वाधीनता संग्राम

जहाँ की रीति,प्रीति,संस्कृति,प्रकृति में कण-कण बसी है हिंदी
विदेशी भाषा अंग्रेज़ी ,भारतीय सभ्यता की अभिव्यक्ति है हिंदी

जैसे ब्रिटिश सत्ता के साथ आई थी अंग्रेज़ी बनकर यहाँ मेहमान
यहाँ हिंदी के धुरंधर विद्वान बहुत हैं अंग्रेज़ी विदा करें ससम्मान

राजभाषा को सुदृढ़ करने हेतु देश के नागरिकों को आगे आना है
मधुरस घोलने वाली हिंदी को फलक तक सबल,सशक्त बनाना है

जयललिता ,करूणानिधि अंग्रेजी की करें हिमायत रहें हितैषी
राजभाषा के राजद्रोहियों के विलाप को करना है ऐसी की तैसी

अंग्रेजी भक्त पी.चिदंबरम खूब करें तीमारदारी और तरफदारी
हिंदुस्तान में नहीं होगी बाहरी भाषा की बाईज्जत खातिरदारी

अंग्रेजी मोहित लोग यहाँ से जाकर करें ग़ुलामी अंग्रेजों के देश
देश भक्तों को अपनानी अपनी राजभाषा जो लगती सबसे श्रेष्ठ

क्षेत्र है इसका व्यापक इतना आसानी से बोला समझा जाता है
हिंदी के प्रचार,प्रसार पर क्यों राजनीति करने वाला घबराता है

जिसे गाँधी जी ने अपनाया मोदी ने महिमा मण्डन कर दी इतनी
नहीं रहेगी अंग्रेजी की नानी चाहे उसकी हनक ठसक हो जितनी

अंग्रेजी उपभोक्तावाद की जननी सुसंस्कृत नागरिक बनाती हिंदी
सौंदर्यबोध कराती भारत के मन का सर्वसम्पन्न वर्णमाला हिंदी

जिसने कवि हृदय को भाव दिया विराट सम्मोहन में सबको बाँधा
उसी साम्राज्य में आधिपत्य जमा अंग्रेज़ी ने हिंदी को कितना साधा

जिसको गांधी ने पाप कहा नेहरू ने कहा जिसको बरदाश्त से बाहर
देश के विशाल भौगोलिक क्षेत्र से उसे बेदखल कर कर देना है बाहर ।

                                                                          शैल सिंह






हिंदी नहीं तो हिंदुस्तान कैसा

हिंदी नहीं तो हिंदुस्तान कैसा

जब दूर होगी हिंदुस्तान से हिंदी
फिर अंग्रेज़ी के साथ हमारा क्या होगा
गंगा जमुनी तहज़ीब संस्कृति सभ्यता
सनातन धर्म का आगे फिर क्या होगा
अंग्रेजी आबाद रहे इसके हिमायतियों ने  
हमें नाशाद किया है कितना
हमारी सांस्कृतिक विरासत के गढ़ को
इस मुई ने बर्बाद किया कितना
अंग्रेजों को तो खदेड़ दिया
ठाठ से यहाँ अंग्रेजी पोषित होती रही
ग़फ़लत में इस सौतन भाषा संग
सनातनी हिंदी शोषित होती रही
अंग्रेजी की वक़ालत करने वालों की
है मुट्ठी भर ही तादात यहाँ 
करोड़ों भारतीयों की जुबां की रानी
पराई को कैसे करें बरदाश्त यहाँ
जिसके रंग-ढंग में तहजीब नहीं
छोटे-बड़ों का आदर-भाव नहीं
हिंदी का मुकाबला करेगी क्या ये
जिसमें भारतीयों को रंच भी चाव नहीं
अवांछनीय नहीं है कोई भाषा
ना ही भाषा ज्ञान बुरा है
पर राष्ट्र को स्वभाषा में बांध कर
रखना ही हमारी परम्परा है
हिंदी का पोषण कर इसका प्रचार,प्रसार
संवर्द्धन कर इसे अर्श पर लाना है
भारतीय संस्कृति के सनातन प्रवाह को
राष्ट्र भाषा का दर्जा देकर अक्षुण्ण बनाना है । 
                                               शैल सिंह



Saturday, 28 June 2014

तेरी अलबेली काया


तेरे खंजन नयन नशीले अधरों के बोल रसीले 
नागिन सी लट लहरे ललाट तिलस्मी चितवन बोले ,

किस दिव्य लोक से आई कल्पना में ख़लल मचाने 
मखमली भाव तरंगों पर मृदु मादक हाला बरसाने ,

जब से दृग ने देखी है अल्हड़ तेरी अलबेली काया 
चेतन अवचेतन तक को विस्मित कर भरमाया ,

मन-फटिक शिला प्रतिमा सुख देती संसार का जो 
चातक से प्यासे मन को अर्क मिला दीदार का जो ,

सुखी,ऊसर,बंजर बसुधा अंतर्मन की हो गयी उर्वर 
जीवन के मरुमय तट उन्मत्त उगने लगे हैं तरुवर । 
                                          शैल सिंह