Wednesday, 20 September 2017

क्षणिका

कुछ लोगों ने महफिलों में
ये आभास कराया
जैसे पहचानते नहीं ,
मैंने भी जता दिया
जैसे मै उन्हें जानती नहीं ,
                 शैल सिंह

Monday, 18 September 2017

क्षणिका

क्यूँ इतना वक्त ली ज़िन्दगी
खुद को समझने औ समझाने में
समझ के इतने फ़लक पे ला
छोड़ दी किस मोड़ पे ला विराने में
बोलो अब उम्र कहाँ है वक्त लिए
वक्त बचा जो खर्च कर रही तुझे बहलाने में।
                               शैल सिंह

तन्हाई पर कविता , " गुजरे मौसम की याद दिलाती "

यादों के शुष्क बिछौने पर
भीगीं-भीगीं सिमसिम रात
तन्हाई से करती बातें
नैनों की रिमझिम बरसात 
जाने कहाँ-कहांँ भटकाती रात ,

पलकों की सरहद तक आ
नींद काफूर हो जाती है
बेचैन रात की आलम का
सिलवट दस्तूर बताती है
उन्नीदी आंँखों में बीति सारी रात ,

हठ करती बचपन की क्रिड़ायें
अबोध अल्ह़ड़पन यौनापन का 
काश कि मुट्ठी में बंद कर रखती
कुछ हसीं पलों के छितरेपन का
कभी बावफा ना होती इतनी रात ,

हर पहर रैन की कातिल होकर 
गुजरे मौसम की याद दिलाती 
बेदर्द वीरानी हमदर्द बन   
रख पहलू में हँसाती और रुलाती
तन्हा और बनाती तन्हाई की रात ,

ना जाने क्यूँ तन्हाई में यादें
ज़िक्र करती हैं पुराने मंजर का
तल्खी और उदासी भर देतीं
काम करती हैं जादू-मंतर का
ख़्यालों में डूबी,उतराई सारी रात
                                 शैल सिंह







Sunday, 17 September 2017

'' तिरंगा तन सजा सोचा न था तेरा मन दुखा दूं माँ ''

 '' एक शहीद की अन्तर्व्यथा माँ के लिए ''


ऐ मेरे मित्रों मेरे गांव तुझसे मेरे हिन्द ये कहना है
शहीदों के मज़ारों पर जलाके नित दीये रखना है ,

याद आए मेरी दिल को जरा समझा लिया करना
लगा सीने से तस्वीरों को मन बहला लिया करना
हर्गिज़ कोसना मत देश को ऐ त्यागमयी माताओं
लाल देश का था तेरा मन को बतला दिया करना ,

समझना गहरी नींद सोया हूँ तेरी लोरी सुन के माँ
जां कुर्बान वतन पर की कि तेरा कर्ज़ चुका दूँ माँ
आँसू अच्छे नहीं लगते वीरों की माँ की आँखों में
तिरंगा तन सजा सोचा न था तेरा मन दुखा दूं माँ ,

माँ तेरे कोंख का मैं ऋण चुका पाया नहीं तो क्या
प्रिये का साथ जीवन भर निभा पाया नहीं तो क्या
भारत माँ के चरणों में थी चाहत वीरगति हो प्राप्त 
अमर बलिदान की गाथा लिख सोया नहीं तो क्या ,

राष्ट्र के ग़ौरव लिए तेरा लाड़ल़ा माँ प्राण गंवाया है
नमन कर लो उन्हें जिनने तुझे आजादी दिलाया है
कायर आँसुओं से क्यों भिगोती दामन धरा का माँ
जंगे-मैदां ने रण-बांकुरों को तेरे फौलादी बनाया है ,

राजगुरु,सुखदेव,भगत भी किसी के लाल थे न माँ
जिनके शौर्य की गाथायें सुन हम बेहाल हुए थे माँ
वतन की गोद में सोने का गौरव जो मिला है आज
वही आशीष दो जो फ़ौज़ में जाते वक्त दिए थे माँ।

                                             शैल सिंह




Thursday, 14 September 2017

मंच पर कविता आरम्भ करने से पहले,समां बांधने के लिए

मेरी आंँखों का पीके मय
सभी मदहोश बैठे हैं
नशा नस-नस तरल कर दी
सभी खामोश बैठे हैं,

पलकें हो गईं शोहदा
झपकना भूल बैठी हैं
जब से आई हूँ महफ़िल में
सभी खो होश बैठे हैं,

गर हो तालियों की गूँज
तो भंग तन्द्रा सभी की हो
महफ़िल हो उठे जीवन्त
करतल ध्वनि सभी की हो,

बंधन खोल हथेली का
सुर साजों से नवाजें गर
हो अन्दाजे-बयां कविता
वाह-वाह धुन सुना दें गर,

शब्दों से करूं सराबोर
महफ़िल हो जाए गदगद
गर दें हौसला रंच भी
मन के तार छेड़ूं अनहद,

गणमान्य अतिथियों का
करूं भरपूर मनोरंजन
दर्शक दीर्घा में बैठे सज्जनों
करुं शत-शत नमन बन्दन ‌।
                     शैल सिंह

हिंदी पर कविता '' हिंदी का हो राज्याभिषेक '

हिंदी पर कविता '' हिंदी का हो राज्याभिषेक ''


हिंदी की ख़्याति बढ़ाने को
इसे सशक्त,समृद्ध करना है
सहर्ष अपना इसे प्रतिष्ठित कर
विश्वपटल पर प्रसिद्द करना है ,

हिंदी है भारत का गौरव
हिंदी सुराज की धार है
भाल सजा बिंदिया हिंदी
करती हिंदुस्तान का श्रृंगार है ,

गंगाजल सी पावन हिंदी
उर्दू,संस्कृत से भी मिलनसार है ,
सीधी,सहज,सरल,मधुर
हिंदी हृदय का उद्गार है

रिश्तों की डोरी,ऊष्मा प्राणों की
हिंदी मौसमी गीतों की फुहार है
हिंदी का विस्तार करें हम
ऋषि,मुनियों की वाणी का टंकार है ,

मन से मन के तार जोड़ती 
हिंदी मधुर,मनोहर रसधार है
कण-कण में है घुली हुई
हिंदी कल-कल बहती जलधार है ,

देश,दुनिया में भी गूंज रही
आज़ हिंदी की ललकार है
बांधती सुर में गीत,ग़ज़ल को
हिंदी मीठी कर्णप्रिय झंकार है ,

भावों में करुणा,पीर पिरोने वाली 
हिंदी एकमात्र आधार है
सब भाषाओँ पर भारी पड़ती
हिंदी जब भरती हुंकार है ,

स्वतः उतरती मन के आँगन
कवि मन के कृतियों का संसार है
हिंदी का हो राज्याभिषेक
हिन्दुस्तान की पुकार है ,

भावों की प्रेयसी,प्रखर वक्ता भी 
हिंदी तेरा जय-जयकार है 
परचम हिंदी का लहर रहा
बह रही दिशा-दिशा बयार है ,

हिंदी मणि है हिंदुस्तान की 
परिष्कृत सम्प्रेषणीय उदार है
जन मानस को करती जागरूक
हिंदी हृदय से तेरा सत्कार है।

                     शैल सिंह 




Wednesday, 13 September 2017

शिद्दत से तराशें गर हम हौसलों को
कद आसमां का खुद-बख़ुद झुक जायेगा
राह कोसों हों मन्जिल की चाहे मगर
खुद मंजिलों पे सफर जाकर रुक जायेगा।

                                            शैल सिंह

Tuesday, 12 September 2017

'' देश लिए शहीद हुए एक सैनिक की भावना ''

'' देश लिए शहीद हुए एक सैनिक की भावना ''



तेरी आन लिए प्रान क़ुरबान किया प्यारे देश मेरे
मेरे प्रति तेरा भी तो देश कुछ फ़र्ज होना चाहिए ,

किस हाल में महतारी हाल क्या है प्राण प्यारी की
किस हाल में दुलारा हाल क्या जी राजकुमारी की 
जिस बूढ़े पिता ने सहारा देश तेरी आन लिए वारा
उस घर का भी तुझपे देश कुछ क़र्ज़ होना चाहिए ,

तेरे सम्मान,आन,बान लिए माता ने उजाड़ी कोख़
ज़िन्दगी भर लिए आँचल रखी जिसने समेट शोक
जिसने राखी की कलाई भेंट दी देश की भलाई पे    
दुख के पहाड़ का भी देश कुछ अर्ज़ होना चाहिए ,

जिसके गाँव का चराग बुझा मुरझाये फूल बाग़ के
ध्वजा में लपेटी आई जिस द्वारे पर अर्थी संवार के  
जिन आँसुओं की धार नहीं टूटे भाई को निहार के
दर्द बलिदानी गांव का देश कुछ दर्ज़ होना चाहिए।

                                                शैल सिंह 

Sunday, 3 September 2017

कविता '' सच्चाई ने जीती बाज़ी ''

        '' सच्चाई ने जीती बाज़ी ''


दिन भर आग उगल सूरज जला नहीं निढाल हो गया
सारी रात जला एक दीप जल कर भी निहाल हो गया ,

गम सीखा सहना मैंने नीरव रजनी के गहन अंधेरों से
नीरस ज़िंदगी करने वाला भी खुद ही कंगाल हो गया ,

रंगा नहीं कभी किसी भी रंग में मैंने अपने अंदाज को
जब छोड़ी नहीं  ख़ुद्दारी भी क़ुदरत भी बेहाल हो गया ,

देखो अपना ढलता सूरज मेरे किस्मत से खेलने वालों  
सच्चाई ने जीती बाज़ी कहने लगे लोग कमाल हो गया ,

नमन उगते सूरज को करने वालों भूला दिए भोर मेरा
देखो बुरे लम्हों का साया खुद छूमन्तर पाताल हो गया।  

                                                    शैल सिंह