Saturday, 18 November 2017

शेरों को दहाड़ने पर मजबूर जो कर दिया

भंसाली का बहुत-बहुत शुक्रिया,
राजपूतों के ज़मीर को जगा दिया,सदियों से सो रहे थे, राजपूतों के चरित्र को जितना गन्दा से गन्दा हो सके उतना सीरीयल्स फिल्म,मन गढ़न्त कहानियों के माध्यम से दर्शाया गया पर कभी किसी राजपूत ने अपनी कम्युनिटी के लिए आवाज नहीं उठाई, लेकिन जब एक माँ की अस्मिता पर एक क्षत्राणी की आन-बान पर आँच आई तो राजपूती लहू ने अपने क्षत्रिय होने का प्रमाण दिखा दिया ,शमशीरों को म्यानों से निकाल लिया, नहीं बहुत हो चुका अब बर्दाश्त नहीं, हमारे बलिदान और योगदान की क्या यही कीमत कि चन्द बिगड़ैल लोगों के चरित्र को पूरी राजपूत लावी पर चरितार्थ कर दिखा दिया जाता रहा, देश याद करें राजपूतों के त्याग को उनकी दानशीलता को जो और किसी में नहीं। हर समुदाय में अच्छे बुरे लोग हैं ,पर क्षत्रियों का ही किरदार क्यो  अत्याचारी,अनाचारी,व्यभिचारी, दुर्दांत,अक्खड़ पर्दे पर उतारा जाता रहा ,उसी का नतीजा है कि आज क्षत्राणियाँ भी कमर कस लीं कि अब राजपूत के मुंह में कोई उंगली डाल कर गुस्ताख़ी तो करें , ये होती है वर्चस्व की लड़ाई ।लीला भंसाली को धन्यवाद , शेरों को दहाड़ने पर मजबूर जो कर दिया

शैल सिंह

Friday, 17 November 2017

बेटियों की महत्ता पर कविता '' सुराख आस्मां में कर दें इतनी ताब हैं रखते हम ''

     '' बेटियों की महत्ता पर कविता ''

'' सुराख आस्मां में कर दें इतनी ताब हैं रखते हम ''


गर हम बेटियां ना होतीं विपुल संसार नहीं होता
गर ये बेटियां ना होतीं ललित घर-बार नहीं होता
गर बेटियां ना होतीं भुवन पर अवतार नहीं होता
गर हम बेटियां न होतीं रिश्ता-परिवार नहीं होता ।

हमने तोड़ के सारे बन्धन अपनी जमीं तलाशा है
दृढ़ इरादों के पैनी धार से अपना हुनर तराशा है
फहरा दिया अंतरिक्ष में हमने अस्तित्व का झंडा
सूरज के शहर डालें बसेरा मन की अभिलाषा है ।

झिझक,संकोच शर्म के बेड़ियों की तोड़ सीमाएं
हौसले को पंख लगा निडर उड़ने को मिल जाएं
सुराख आस्मां में कर दें इतनी ताब हैं रखते हम
बदलकर सोचों का पर्दा हमारी शक्ति आजमाएं ।

मूर्ख से कालिदास बने विद्वान् दुत्कार हमारी थी 
तुलसी रामचरित लिख डाले फटकार हमारी थी 
विरांगनाओं के शौर्य की गाथा जानता जग सारा 
अनुपम सृष्टि की रचना भी अवनि पर हमारी थी ।

इक वो भी जमाना था के इक नारी ही नारी पर
सितम करती थी घर आई नवोढ़ाओं बेचारी पर
संकीर्ण मानसिकता से उबार उन्हें भी संवारा है
पलकों पर बैठा सासूओं ने बहुओं को दुलारा है ।

क़ातर कण्ठों से करती निवेदन माँओं सुन लेना
मार भ्रूण हमारा कोंख में यूँ अपमान मत करना
क्यों हो गईं निर्मम तूं माँ अपने अंश की क़ातिल
हमें बेटों से कमतर आँकने की सोच मत रखना ।

हम जैसे ख़जानों को पराये हृदय खोलकर मांगें
हमारे लिए कभी रोयेंगे आँगन,दीवार ये दरवाज़े
हम परिन्दा हैं बागों के तेरे आँगन की विरवा माँ
रिश्तों की वो संदल हैं खुश्बू से दो घर महका दें ।

करें मुकाम हर हासिल गर अवसर मिले हमको
कर स्वीकार चुनौतियाँ हमने चौंकाया है सबको
अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पे फ़हरा दिया राष्ट्र का ग़ौरव
बेहतर कर दिखायें गर जगत में आने दो हमको ।

विपुल---विशाल , ललित---सुन्दर ,
भुवन---- जगत , अवनि----पृथ्वी ।

                                                       शैल सिंह 




Monday, 6 November 2017

'' वजह दिलक़श शह से तेरा मुझे बेज़ार कर देना ''

हिंदी ग़ज़ल '' वजह दिलक़श शह से तेरा मुझे बेज़ार कर देना ''


संदल सी महकती चलती पहलू से मतवाला कर
मदिरालय में निगाहों के निमंत्रण से दीवाना कर ,

तेरी आँखों के सागर में भी देखा इश्क़ की लहरें
सफ़ीना दिल का उतराये तेरे सागर में इस गहरे
आशिक़ाना मिज़ाज देखे इन उफनाती लहरों के 
साहिलों पर मिलें चल ज़माने के तोड़ सभी पहरे ,

गर अल्फाज़ मुकर जाएं हृदय का हाल बताने से
झुका पलकें बता देना अन्तर का राज निग़ाहों से
अंतर की नदी का कल-कल नाद दिल सुन लेगा
हटा घूँघट हया की चाँद निकल आना घटाओं से ,

बसा गेसुओं के झुरमट में दिल आबाद कर देना
नज़राना आरजू को मेरी दिल में उतार कर देना
गुम मदहोश अदायें कीं आजकल नींद रातों की
वजह दिलक़श शह से तेरा मुझे बेज़ार कर देना ,

हमदर्द बनकर नब्ज मुक़म्मल टटोल लिये होतीं
मौन हसरतों,अहसासों का कुछ मोल दिये होतीं
छोड़ निकम्में लफ़्जों को बंदिशें तोड़ संशयों की
दिल बोझिल न यूँ रहता फ़ख्र से बोल दिये होतीं ।

                                             शैल सिंह



Saturday, 21 October 2017


सुना है आजकल लोगों की जुबान पर मेरे चर्चे बहुत हैं
मेरे चर्चों के पीछे लोगों की जुबान के बढ़े खर्चे बहुत हैं
क्या मैं इतनी अच्छी हूँ या कि इतनी बुरी हूँ
जो भी हो कसौटियों पर हमेशा उतरी खरी हूँ
                                                    शैल सिंह



Wednesday, 18 October 2017

दीवाली पर कविता '' आना हंसा पे सवार मेरे घर आँगना ''

      दीवाली पर कविता 


शत-शत अभिनन्दन माँ लक्ष्मी तेरा
आना हंसा पे सवार मेरे घर आँगना

हर्ष और उल्लास का पर्व दीवाली 
रिश्तों में खूब गर्माहट लाना
अंधेरा दूर भगा स्नेह लूटाना 
नभ तारे शरमायें हो पावन तेरा आना
शत-शत अभिनन्दन माँ लक्ष्मी तेरा
आना हंसा पे सवार मेरे घर आँगना

धवल ज्योति से उजियारा कर
नफ़रत की दीवार ढहाना
ईर्ष्या,द्वेष मिटा प्रेम,सौहार्द्र बरसाना 
रौनकता से शान्ति का साम्राज्य बिछाना
शत-शत अभिनन्दन माँ लक्ष्मी तेरा
आना हंसा पे सवार मेरे घर आँगना

काली रात अमावस की
कर आसुरी वृत्तियों का प्रतिकार
कण-कण प्रकाश बिखराना
अनन्त काल तक जग रहे तेरा दीवाना
शत-शत अभिनन्दन माँ लक्ष्मी तेरा
आना हंसा पे सवार मेरे घर आँगना

मन का भाव बतासे सा मीठा 
अन्तस्तल खील सा खिलाना  
खुशियों की सौगात लुटाकर
शुभागमन से पर्व ये परमानन्द बनाना 
शत-शत अभिनन्दन माँ लक्ष्मी तेरा
आना हंसा पे सवार मेरे घर आँगना ।

                             शैल सिंह 

Friday, 13 October 2017

गांव पर कविता '' भोजपुरी की मिठास में गांव बसता जहाँ है ''

            गांव पर कविता 


बासी-बासी  सी लगती  शहर की  फिज़ां है
मेरे गांव सी कहाँ मिलती यहाँ ताज़ी हवा है ,

सर्दी,गर्मी,वर्षा,वसंत भी अनूठे मेरे गांव के 
शहर के कोलाहल में दिन गुजरता कहाँ है
खुले आसमां के छत के तले दूर-सुदूर तक
लहलहाते खेतों में हरियाली दिखता जहाँ है ,

वो गाँव की रुखी रोटी का स्वादिष्ट निवाला
पिज्जा,बर्गर में तृप्ति का बोध होता कहाँ है
लगता रोज इतवार है देख गांवों की रौनक़ 
शिद्दत से इतवार का इन्तज़ार होता यहाँ है ,

कुटुम्ब-कुनबे संग गूँजता हँसी का ठहाका
चौपाल जगत पर इनारों की लगता जहाँ है
सड़कें,बिजली,मकां,पार्क फिर भी वीरानी 
दीयों के रौशनी में मेरा गांव हँसता जहाँ है ,

जहाँ चहचहा अगवानी पाँखी करें भोर की
महकते पुष्पों से वन-उपवन हर्षता जहाँ है
है भाईचारा जहाँ रेशमी डोरियाँ रिश्तों की
भोजपुरी की मिठास में गांव बसता जहाँ है ,

नीम,बरगद,पीपल की जहाँ छाँव का मज़ा  
शहरी प्रदुषण में दम हरदम घुटता जहाँ है
न चौबारे आंगन,सहन,यहाँ की इमारतों में
गांव प्रकृति की मुग्धता में विहंसता जहाँ है ,

रसीला सावन  नशीला फागुन मेरे गांव का
बेख़बर मज़हबी द्वेषों से गांव रहता जहाँ है
त्यौहारों का उल्लास शुद्ध स्वच्छ पर्यावरण
विपत्ति में करुणा का सिन्धु बरसता जहाँ है ।

इनारों --कुआं
                                         शैल सिंह