Saturday, 12 August 2017

पन्द्रह अगस्त पर्व मनायें हम प्रण प्यार से

बोली-भाषा से इतर,जाति-धर्म से ऊपर
दिल में राष्ट्रभक्ति अभिमान देश की भू पर
भले शीश कट जाये कभी शीश नहीं झुकायेंगे
चाहे जो देनी क़ुरबानी मातृभूमि पर प्राण लुटायेंगे 
देश की अस्मिता लिए हम आपसी भेदभाव मिटायेंगे  
अखंडता,एकता की जला मशालें विकसित राष्ट्र बनायेंगे  
भारत के उज्जवल भविष्य हेतु नौनिहालों को हमें जगाना है    
हिन्दवासियों को बाँध एक सूत्र में हिन्दुस्तान को स्वर्ग बनाना है
सकुशल जन-जन,अमन,चैन हो भारत माँ पर सर्वस्व लूटायेंगे हम 
वीर शहीदों के शौर्य की गाथायें गाकर उरों-उरों में क्रांति लायेंगे हम 
नमन तुम्हें वतन पे मिटने वालों सरहदों पे रहने वालों तुझे मेरा सलाम 
वतन महबूब मेरा,करते जी-जान से मोहब्बत माँ भारती तुझे मेरा सलाम 

                                                               शैल सिंह

Wednesday, 2 August 2017

सावन पर कविता

सावन पर कविता, मेरी 

है सावन के महीने की अजी बात निराली
मन्त्रमुग्ध कर देता क्षिति बिखेर हरियाली ,

तोड़ संयम बूँद-बूँद बरसे सावन झमाझम
उसर,बंजर,परती धरती का करे सीना नम ,

बाढ़,आपदा, भूकम्प से करता छलनी मन
धानी चूनर में जगत को बनाता नई दुल्हन ,

इन्द्रदेव करते सावन में हर्षित हो जल वर्षा
गाते मोर ,दादुर,पपिहा मोरनी नाचती हर्षा ,

घटा कारी नभ से गरज बिजलियां गिराती
इतरा क्षुद्र नाले,नदियां,नौले उफ़ान मारतीं 

कजरी,तीज,झूला,मेघ,मल्हारों भरा मौसम
नजारा देख हरा-भरा लगा मन को मनोरम ,

विरहन का तन जलाता विरह की अगन में
सावन प्रेम का अंकुर उगाता युवा जहन में ,

मस्तानी धूप बदली की,सुहानी लगती भोर
माटी की महक सोंधी पवन शोख करे शोर ,

नागपंचमी,जन्माष्टमी,रक्षाबंधन के त्योहार
सब मौसमों में लगे सावन सबसे खुशगवार ।

   क्षिति---धरती                                शैल सिंह






Tuesday, 1 August 2017

उमड़े-घुमड़े उद्गारों की


खो न जाएँ भाव कहीं
कलम हाथ ने गह ली 
दर्द, खुशी, गम ,तन्हाई,
उदासी शब्दों ने पढ़ ली
उमड़े-घुमड़े उद्गारों की
लेखनी नब्ज़ पकड़ ली
अनकही अभिव्यक्ति मेरी
काव्य कड़ी में गढ़ दी
मन की मौन कथा व्यथा
पन्नों पे हमने जड़ दी ।

                    शैल सिंह


Friday, 28 July 2017

मैं नेह की शीतल समीर हूँ

मैं नदी हूँ मन की नदी, 
बहुत कुछ अपने अतल अंतर में समेटे हुए, 
मुझमें भी समुद्र सी लहरें हैं उफान और तरंगें हैं,
मैं समन्दर की तरह भीतर के अबोध रेत को ,
किनारों पर उगल ऊंची-ऊंची छलांगें नहीं लगाती। 
मैं नदी हूँ मन की नदी शान्त, चिर स्निग्ध ,
अपने विस्तार को, मन के परिसर में ,
चुप्पी की चादर में ओढ़ाकर ,
बाह्य जगत से दूर रखती हूँ।
जब कोई शरारती कंकड़ ,
मेरी सतह से छेड़खानी करता है ,
मैं एक बुलबुला छोड़ उस परिदृश्य को ,
जज्ब कर लेती हूँ ,अपने मन के भूगर्भ में ,
पर उस शरारती तत्व को पथरी के रुप में,
वही पथरी जब अतिशय बड़ी हो ,
असहनीय दर्द का आकार लेती है ,
तब कहीं मैं फूटकर टेढ़ा-मेढ़ा राह बनाती हूँ ,
और कर देती हूँ नदी को छिछला ,
मैं नदी हूँ ,मुझमें रहस्य है ,मर्म है,संयम है ,
एक सीमा तक स्थिरता और सहनशीलता भी
मैं बावड़ी हूँ, बावली नहीं, उतावली नहीं
प्रात में मेरे मन के विशाल प्रांगण में
सूर्य किरणों संग अठखेलियां करता है
सांध्य में चाँद मेरी गहराई में समां
तारे सितारों संग रंगरेलियां करता है
मैं नेह की शीतल समीर हूँ
मैं खारी नहीं, मैं सूखी कछार भी नहीं,
मैं समंदर की तरह उफनाती चिंघाड़ती भी नहीं
बस बिचलित होती हूँ ,जब आहत होती हूँ ,
मैं नदी हूँ, मन की मौन नदी ,मुझे नदी रहने दो 
मुझमें समा समझने की कोशिश करो या ना करो ,
मैं नदी हूंँ , स्थिरता मेरी परिपाटी मेरी विरासत ।

                                शैल सिंह

Tuesday, 25 July 2017

तक़दीर टमाटर की

आसमान इंसान ही नहीं छू रहे,सब्जियां भी आसमान छू रही हैं
टमाटर नासा पहुँच अध्ययन कर रहा है लोग विश्लेषण कर रहे
आश्चर्यजनक उछाल भरे सब्जियों में रंग बघारने वाले टमाटर जी
तक़दीर जब संवरती है ना तो शीर्ष पर बैठा देती है किसी को भी
कभी लहसुन तो कभी प्याज को,तो कभी अरहर की दाल को भी ।
     
                                                                शैल सिंह


घूँघट जरा उलटने दो

    '' घूँघट जरा उलटने दो ''


आयेंगे मेरे प्रियतम आज आँख में अंजन भरने दो
संग मेरे प्रतिक्षित संगी-साथी आज मुझे संवरने दो ,

घर की ड्योढ़ी साजन को पल भर जरा ठहरने दो
दिवस कटे दर्पण सम्मुख नयन में उनके बसने दो ,

जी भर किया सिंगार उन्हें जी भर जरा निरखने दो
वो हों थोड़ा बेजार उर उनका भी जरा करकने दो ,

देखें चांदनी का शरमाना वो घूँघट जरा उलटने दो
संग खेलूं सावनी कजरी बांहें डाल गले लिपटने दो ,

अपलक देखूं उन्हें मुझे वो थोड़ा आज बहकने दो
देखूं चन्दा की भाव-भंगिमा थोड़ा आज परखने दो।

                                               शैल सिंह 

सम्पूर्ण जगत में बस एक ही भगवान हैं

एक ही हैं भगवान मगर हैं नाम अनेकों गढ़े गए
नाम के चलते ही हृदय बहुत हैं विष भी भरे गए,

अरे प्रकट हो त्रिशूलधारी भटकों को समझाओ
परब्रम्हपरमेश्वर,एकाकार एक ही हम बतलाओ,

बाँटते तुझे निज स्वार्थ लिए विभिन्न धर्मों-पंन्थों में
अशांति मचा रखे दहशत फैला मुल्कों-मुल्कों में,

गर नहींं समझें अपना रौद्र ता्डव रूप दिखाओ
जिनके उत्पात से त्रस्त सभी गह के वज्र गिराओ,

बड़ा लिया तूने इम्तिहान और देखा खून खराबा
मची नाम पे तेरे मारकाट तूं बैठा है कौन दुवाबा,

आस्था पे तेरी हम मरते जो मांगें जन्नत का प्यार
बस राम मंदिर बनवा दे उनका प्राण हूरों पे वार ।

                                                 शैल सिंह

ये शब्द



जितने भाव उमड़ते उर में
शब्द  जुबां बन  जाते  हैं
जहाँ अधर नहीं खुल पाते
झट सहगामी बन जाते हैं 
खुद में ढाल जज्बातों को 
मन का सब कह जाते हैं | 

                      शैल सिंह 

Sunday, 23 July 2017

कई दिनों की बारिश से आजिज होने पर


कई दिनों की बारिश से आजिज होने पर,

बन्द करो अब रोना बरखा रानी
बहुत हो गया जल बरसानी
भर गया कोना-कोना पानी ,

नाला उफन घर घुसने को आतुर,
जल भरे खेत लगें भयातुर,
रोमांचित बस मोर,पपिहा,दादुर ,

कितने दिन हो गए घर से निकले
पथ जम गई काई पग हैं फिसले
बन्द करो प्रलाप क्या दूं इसके बदले ,

कितने दिन हो गए सूरज दर्शन
तरसे धूप लिए मन मधुवन
कपड़े ओदे,घर भरा सीलन ,

रस्ता दलदल किचकिच कर दी
मक्खी, मच्छर से घर भर दी
गुमसाईन महके सब हद कर दी ,

जलावतन से बिलें भरीं यकायक
जीव घूम रहे खुलेआम भयानक
जाने कब क्या हो जाए अचानक ,

बहुत हो गई तेरी अति वृष्टि की
बरसो कहीं और जगहें भी सृष्टि की
काबिलियत दिखाओ ऐसी कृति की ।

                          शैल सिंह

Thursday, 20 July 2017

क्रान्तिकारी कविता '' शब्दों की परिमिति लांघी रे बहती स्याही की धार ''

क्रान्तिकारी कविता 

हस्त कलम गहते ही भक-भक लगी उगलने छार
शब्दों की परिमिति लांघी रे बहती स्याही की धार ,
तोड़ के बंधन विविध भीति के की द्विजिहा ने वार 
चल गई खंजर कागज पे दिल ने जो उगली उद्गार |

परिमिति--सीमा      
 भीति--भय,डर                                        
                      शैल सिंह 

क्रमशः--

जब-जब सांप-सपोलों के,फन हमको फुफकारेंगे
ताल ठोंककर कहते जी,हम मौत के घाट उतारेंगे ,

कबतक मलते रहेंगे हाथ वो घात के पांव पसारेंगे
दूध पिलाया ठर्रा तो जूतमपैजारम से भूत उतारेंगे ,

क्या समझे हो मरदूदों जो जी में आएगा बक दोगे
अभिव्यक्ति की आजादी पे थोबड़ा तोड़ भोथारेंगे ,

संपोला शरण में रहने वाला गर ऐसे आँख तरेरेगा
ज़रा ना होगी देर आँख से आग उगल  भक्ष डारेंगे  ,

अगर शहीद की परिभाषा पड़ी तुम्हें समझानी तो
तत्काल स्वर्ग के रस्ते का सरजाम अनेक संवारेंगे ,

क्यों मुल्क से कर बग़ावत तूं दिखलाता तुर्रा तेवर
औक़ात तेरी बतलाने को तुझे धोधो और कचारेंगे ,

जिस थाली खा छेद उसी में पामर,पिशाच करेगा
राग जपे कृतघ्न गैरमुल्क़ का देखो खाल उधारेंगे , 

जयचंदों की मिलीभगत से आज अशान्त वतन है
गद्दार कर्त्तव्यशून्य मतिमंदों को भी खूब निथारेंगे ,

चौकसी में सेना ग्रास बने साजिश की सरहद पे 
जश्न करे तूं कुढ़कुढ़ खून भरी आँखों से निहारेंगे ,

तूने कर्णधारों,शूरवीरों के कुटुम्बों को बिलखाया 
नहीं,तड़-तड़ गोली बौछारों से भेजा तेरा बुहारेंगे ,

नरपिशाचों,भेड़ियों अम्मीयों ने क्या संस्कार दिए
हरा रंग का चढ़ा फितूर रौंद पांव तले ललकारेंगे ,

ऐ शुभचिंतकों आतंकी रहनुमाओं,सरगनाओं के 
देह नोच निर्दयता से अन्तड़ि भी खींच निकारेंगे ,

कलेजा चाक हुआ है देख क्षतविक्षत जवानों को
सर बाँधा कफ़न तेरे ख़ून से माँ का पांव पखारेंगे ,

दीप तेरा भी होगा गुल हनुमनथप्पाओं के बदले 
क्यूँ उकसाते तेरे पुरखों तक का ताबूत उखारेंगे ,

हद हो गई हद से बाहर हम रट अहिंसा त्यागेंगे
प्रण करते हैं बर्बरता से तेरा अंग-अंग चटकारेंगे ,

आहत बार-बार विश्वास हुई बहुत वंश हम खोये 
ऐसे कृत्य पे किस हर्ष से अंश को तेरे पुचकारेंगे ,

वतन लिए फाँसी एक अशफ़ाक़उल्ला झूल गए
तैमूर के ये दुर्दांत कालिख देश के मुँह पोचारेंगे ,

होते खाक तूम विश्वपटल पर देख धमक हमारी
धाक से तेरी जमीं पे जा केसरिया रंग लहकारेंगे ,

अबतक सभा मौन थी तूने देश का चीर खसोटा
चक्र सुदर्शन धार लिये कृष्णा चूलें तेरी खखारेंगे ,

ऐ नाशुक्र,नपुंसक,नाजायज औलादों गजनी की
करो अनेकों अफजल पैदा बाप को भी पछारेंगे ,

तूं कुरान के निर्देशों को कुकर्मों का ढाल बना़ले
हम गीता रामायण के पावन मन्त्रोचार उच्चारेंगे ,

तुम स्वत: जगाओ जज्बा काफिरों देशभक्ति के 
होश में आओगे तब जब रब ही तुझे धिक्कारेंगे ,

हर क्षण प्राण हदस में तुम भी बैरी से मिल जाते 
शहर सैलानि के अकाल यहाँ कैसे दिन गुजारेंगे ,

बनी अखाड़ा रण की कश्मीर की मनोहर घाटी 
कैसे केसर,इत्र की खुश्बू क्षेत्र फिजां में फुहारेंगे ,

बहुत सहे वार पीठ पे अपने दर्द भी खूब दिए हैं
ओ हूरों के आशिक़ भेजेंगे जब भी कब्र पुकारेंगे ,

                                      शैल सिंह